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Monday, January 2, 2012

खंडूडी व कोश्यारी पर भारी पडे निशंक


खंडूडी व कोश्यारी पर भारी पडे निशंक/
चोधरी महेन्द्रसिंह की उपेक्षा से आहत है कांग्रेस से डोईवाला के लोग
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सोमवार की रात को भाजपा के 48 प्रत्याशियों की सूची जारी होने पर एक बात साफ हो गया कि खण्डूडी व कोश्यारी की तमाम कोशिशों के बाबजूद भी निशंक मजबूत बन कर उभरे, वे अपनी पसंद की डोईवाला सीट पर चुनाव लड़ने की अपनी मुराद पूरी करने में सफल रहे। हालांकि उनके दलीय प्रतिद्वंदियों ने उनको उनकी परंपरागत सीट श्रीनगर भेजने की हर संभव कोशिश की परन्तु इस कोशिश में खंडूडी व कोश्यारी को मुंह की खानी पड़ी। गौरतलब है कि निशंक को श्रीनगर से चुनाव लड़ कर विधानसभा का चुनाव जीतने का विश्वास नहीं जुटा पा रहे थे। वहां से उनके प्रबल प्रतिद्वंदी  कांग्रेसी प्रत्याशी गणेश गोदियाल के चुनाव लड़ने के कारण निशंक उनका सामना करने की साहस नहीं जुटा पा रहे है। सुत्रों के अनुसार उन्हें श्रीनगर में केवल कांग्रेसी प्रतिद्वदी के अलावा अपने दलीय विरोधियों से भी मुकाबला करना पड़ता। खासकर श्रीनगर सीट पर भाजपा के वर्तमान मुख्यमंत्री खंडूडी का भी काफी प्रभाव है, निशंक को भय था कि उनको श्रीनगर चुनाव लडाने के पीछे उनको वहां से विधानसभा चुनाव में हराने का षडयंत्र रचा जा रहा है। गौरतलब है कि श्रीनगर से पहले इस सीट का नाम थेलीसेण था जिसमें वे अपने कांग्रेसी प्रतिद्वंदी गोदियाल से करारी हार का दंश झेल चूके है। इसी कारण व अपने दलीय प्रतिद्वदियों के रणनीति को भांप कर निशंक अपने दिल्ली आकाओं के समर्थन के बल पर श्रीनगर वाले जाल में फंसने से बच कर अपनी मनपसंद सीट डोईवाला हासिल कर ही गये। वहीं डोईवाले से उन्हें श्रीनगर भेजने के पीछे डोईवाला सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता हरक सिंह रावत का चुनावी ताल ठोकना भी माना जा रहा है। हालांकि हरक सिंह रावत का भी डोईवाला सीट पर भारी विरोध हो रहा है। उनकी जगह डोईवाला सीट पर 15 साल तक देहरादून जनपद के अध्यक्ष रहे जमीनी व पाक साफ छवि के दिग्गज नेता चोधरी महेन्द्र सिंह को बनाने की क्षेत्रवासियों की पुरजोर मांग भी चल रही है। डा हरक सिंह रावत के खिलाफ यहां पर भारी असंतोष है। चोधरी महेन्द्रसिंह की पहली विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने टिकट दे कर वापस ले लिया था। बार बार टिकट मिलने के बाद छले जाने से चोधरी महेन्द्र सिंह के साथ क्षेत्र की जनता भी आक्रोशित है। इसी असंतोष को देखते हुए शायद डा निशंक को अपनी सीट यहां पर सुरक्षित नजर आ रही हो। हालांकि उनको यहां पर भी अपने दलीय प्रतिद्वदियों द्वारा भीतरघात की आशंका सता रही है परन्तु इस सीट पर अपने अनकुल बनाने में उन्होंने अपने मुख्यमंत्री काल से ही काफी मेहनत की थी। वेसे इसी आशंका को देखते हुए उन्होंने यमुनोत्री व श्रीगनर से भी मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव लड़ने का मन बनाया हुआ था। इसी रणनीति के तहत उन्होंने यमुनोत्री जनपद का भी गठन किया था।  अगर निशंक मुख्यमंत्री के पद पर रहते तो हो सकता है कि वे यमुनोत्री या श्रीनगर से ताल ठोक लेते। परन्तु अब वे किसी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहते। वे चुनाव जीत कर विधानसभा में अगर भाजपा विजय होती है तो फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने के सपनों को पंख लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगे। इसमें उनके दिल्ली आकाओं जिनको अपने मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जी भरके उपकृृत किया है, के दम पर अगर फिर से मुख्यमंत्री बन जांय तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। अपने सपने को फिर से साकार करने की दिशा में अपनी पसंद की सीट को चुनाव लड़ने के लिए हाशिल करके निशंक ने अपने दलीय प्रतिद्वदियों को परास्त कर दिया है। देखना है शह ओर मात की यह सत्ता संघर्ष आगे क्या रंग लाती है।

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