भारतीय संस्कृति का परम मर्म

भारतीय संस्कृति का परम मर्म
भारतीय संस्कृति संस्कारवान बनाती है, जिस व्यक्ति को सत् व असत् को परखने की बुद्वि, अन्याय का विरोध करने का साहस न हो,  अपने से बड़े लोगों से बात करने की तहजीब न हो उनको भारतीय कहलाने का कोई हक नहीं। रही बात हमारी संस्कृति में जो भी द्वंद हुए चाहे वह महाभारत का हो या रावण राम संग्राम हो दोनों में स्व व पर के आधार पर नहीं अपितु धर्म व अधर्म के आधार पर लड़ा गया। हमारी संस्कृति में न्यायार्थ निज बंधु को भी दण्ड देना धर्म है व अयम् निज परोवेती .......’ का अमर संदेष को आत्मसात करने की सीख दी जाती है। यही नहीं प्रकृति भी स्व व पर पर नहीं अपितु गुण दोश के आधार पर ग्रहण करने की इजाजत देती है।  मरी हुई लांष लोग अपने प्रिय परिजन की भी हो उसका अंतिम संस्कार कर देते है और मल अपने उदर में भी हो उसका विसर्जन किया जाना चाहिए। जो इस गुढ़ रहस्य को आत्मसात न करके जाति, धर्म, क्षेत्र, भाशा, लिंग या नस्ल के नाम कर किसी का विरोध, षोशण, समर्थन व न्याय करता है वह न केवल भारतीय संस्कृति अपितु परमात्मा का भी गुनाहगार होता है। उसको प्रकृति अपने ढ़ग से दण्ड देती है। www.rawatdevsingh.blogspot.com

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