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Tuesday, August 2, 2011

विकास के नाम पर देश को भूखमरी के गर्त में धकेलने का बहुराष्ट्रीय कंपनियों का षडयंत्र

-विकास के नाम पर देश को भूखमरी के गर्त में धकेलने का बहुराष्ट्रीय कंपनियों का षडयंत्र/
- औघोगिक विकास के लिए गैर कृषि भूमि के बजाय कृषि योग्य भूमि को क्यों किया जा रहा है अधिग्रहण/


नोएड़ा व ग्रेटर नोयडा में सरकार द्वारा किये गये भूमि अधिकरण विवाद पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फेसले के बाद एक बात साफ हो गयी है कि अन्न उत्पादन के नाम पर आत्मनिर्भर हुए भारत की कृषि योग्य भूमि को विकास के नाम पर किसानों से मिट्टी के मोल लेकर भवन निर्माताओं आदि को देकर सरकार एक प्रकार से अपना जनकल्याण के मूल दायित्व को छोड़ कर दलाली के कार्य में जुटी हुई है। सरकार के इस आत्मघाति कृत्यों से देश पर अन्न उत्पादन के क्षेत्र में काफी हद तक मिली आत्मनिर्भरता पर पूरी तरह से ग्रहण लग जायेगा तथा देश फिर अमेरिका नेतृत्व वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दर पर कटोरा लेकर याचकों की तरह खड़े होने के लिए विवश होंगे। सरकार को चाहिए था कि वह औघोगिक व अन्य विकास के लिए किसी भी सूरत पर कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण करने की इजाजत न दे। इसके साथ ही औद्योगिक घरानों को भी केवल उनके लिए जरूरत के हिसाब से गैर कृषि योग्य भूमि को ही प्रदान करे तथा इसका उपयोग वह किसी अन्य गतिविधियों के लिए न कर सके।
देश में कृषि भूमि के अधिग्रहण को लेकर मची अफरा तफरी के बीच प्रमुख किसान प्रतिनिधियों और सांसदों ने विकास कार्यों के लिए कृषि भूमि के अधिग्रहण को अनुचित बताया। ऐसा केवल उप्र में ही नहीं हो रहा है अपितु पूरे देश में हो रहा है। विशेष औद्योगिक क्षेत्र के नाम पर पूंजीपतियों को गरीब किसानों व सरकारी जमीनें जरूरत से कई गुना अधिक कोड़ियों के भाव में लुटवायी जा रही है। यह सब कृषि योग्य भूमि में ऐसा बंदरबांट की जा रही है। बड़े बड़े औद्योगिक घरानों ने तो इस मामलों में ऐसी निर्ममता से एक प्रकार की सरकार से मिल कर मचाई हुई है, अगर इसको निष्पक्ष जांच के बाद उजागर किया जाय तो सरकार व औद्योगिक घराने के तथाकथित विकास के दावे खुद ंही बेनकाब हो जायेंगे। ममला चाहे बंगाल सरकार की सिंगूर प्रकरण हो या उप्र की माया या मुलायम सरकारों द्वारा किये गये अधिग्रहण का मामला या महाराष्ट्र सरकार तथा उड़ीसा सरकार के भूमि अधिग्रहण के मामले हो, सरकारें इन राज्यों में चाहे किसी भी दल की रही हो परन्तु सभी सरकारें देश की अन्न उत्पादन के मामले में जिस कृषि भूमि में भारी कृषि उत्पादन से हासिल हुई उस भूमि को तबाह करने में सभी एकजुट है। उन्हें अपने इस कदम से इतना भी भान नही है कि इस से देश एक बार भूखमरी के कगार पर पंहुच सकता है। देश बहुराष्ट्रीय अनाज उत्पादक कम्पनियों के शिकंजे में पूरी तरह से फंस जायेगा। गौरतलब है कि ये कम्पनियों की नजर कई दशकों से भारत पर लगी हुई है। वे यहा ं पर जहां अपना पांव पसारने के लिए बैचेन है। परन्तु उनके मार्ग में भारत के किसान व उनकी कृषि या ेग्य भूमि है। इसी कारण उनकी दाल इस देश में नयी गल पा रही है। इसी वाधा को दूर करने के लिए वे अब हर हाल में देश की कृषि योग्य भूमि को विकास के नाम पर समाप्त करना चाहते है। उनके इस षड़यंत्र में सरकार भी एक मोहरा बन गयी है।
यह नहीं कि इस मामले में देश के प्रबुद्व लोग चिंतित नहीं हैं। परन्तु जनकल्याणकारी दायित्व को भूल कर व्यापारी बनी सरकार लाठी गोली के बल पर देश के भविष्य को तबाह करने को उतारू है। इस मामले में पूरे देश के जमीनी नेताओ, बुद्विजीवियों व किसानों में गंभीर चिंता प्रकट रहे हैं। देश में हर जगह लाठी गोली के बल पर किसानों से जमीन छिन कर तथाकथित विकास के नाम पर औद्योगिक घरानों, बिल्डरों को कोड़ियों के भाव लुटायी जा रही है।
भारतीय कृषक समाज के अध्यक्ष डा कृष्णबीर चैधरी ने विकास कार्यों के लिए गैर-कृषि भूमि के उपयोग की वकालत करते हुए चीन का उदाहरण दिया जहां समुद्र के किनारे गैर-कृषि भूमि पर विशेष आर्थिक क्षेत्र निर्मित किए गए है उन्होंने इसे देश की खाद्यान्न सुरक्षा के साथ किसी भी तरह के खिलवाड़ को अनुचित बताया। भारतीय जनमानस की पीड़ा को समझने वाले कांग्रेस महासचिव और सांसद आस्कर फर्नाडिस ने किसानों की प्रमुख संस्था भारत कृषक समाज द्वारा भूमि अधिग्रहण और बीज विधेयक पर आयोजित एक बैठक में कहा कि संप्रग सरकार भूमि अधिग्रहण कानून बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार किसानों के साथ न्याय करने की पक्षधर है तथा देश के समक्ष खाद्यान्न सुरक्षा की प्राथमिकता को देखते हुए विकास कार्यों के लिए गैर-कृषि भूमि के उपयोग को तवज्जो दी जानी चाहिए। उनका कहना है कि खाद्यान्न सुरक्षा की प्राथमिकता को देखते हुए कृषि भूमि के अधिग्रहण के बजाय विकास कार्यों के लिए गैर कृषि भूमि को उपयोग में लाया जाना चाहिए।
वही ं दूसरी तरफ उत्तराखण्ड में सरकारों 60 प्रतिशत भू भाग पर वनाछादित प्रदेश की कृषि योग्य भूमि पर औद्योगिक विकास के नाम पर औद्योगिक घरानों व अपने चेहतों को लुटा रही है। प्रदेश की कृषि योग्य भूमि को इस प्रकार लुटाने पर प्रदेश से सांसद सतपाल महाराज भी नाखुश है। उन्होनें अब तक की तमाम सरकारों को सुझाव दिया था कि यहां पर कृषि योग्य भूमि के बजाय बंजर भूमि को इस प्रकार के कार्यो के लिए दिया जाना चाहिए। हालत यह है कि प्रदेश की कृषि भूमि को बर्बाद ही की जा रही है। वहीं अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के अध्यक्ष व उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के सांसद पीएल पूनिया ने सुझाव दिया कि कृषि भूमि से पारंपरिक तौर पर जुड़े भूमि जोतने वालों को भी मुआवजे का कुछ हिस्सा दिया जाना चाहिए और व्यावसायिक उपयोग के लिए अधिगृहित भूमि के एवज में रोजगार दिया जाना चाहिए।
देश में सरकारों की इस चंगेजी प्रवृति से देश एक गंभीर संकट में धकेला जा रहा है। अन्न उत्पादन के रूप में आत्म निर्भर सा हो चूके भारत को एक बार फिर भूखमरी व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की गर्त में धकेलने का षडयंत्र विकास के नाम पर कृषि योग्य भूमि को अधिग्रहण करके किया जा रहा है। देश के लोगों को इस गंभीर समस् या से देश को बचाने के लिए आगे आना चाहिए।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। श्रीकृष्णाय् नमो। हरि ओम तत्सत्।

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