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Saturday, August 27, 2011

सत्तांधों को लोकशाही का ऐेतिहासिक सबक सिखाने वाले जननायक अण्णा हजारे को शतः शतः नमन्

सत्तांधों को लोकशाही का ऐेतिहासिक सबक सिखाने वाले जननायक अण्णा हजारे को शतः शतः नमन्/
मनमोहन व देशमुख व एनजीओ प्रकरण द्वारा लगाये ग्रहण से उठे कई सवाल/


फिरंगियों से आजादी के जीत के महाजननायक महात्मा गांधी के बाद भ्रष्टाचार से त्रस्त मृतप्राय भारत की आत्मा को अपने विश्वविख्यात जनांदोलन से जागृत करने वाले दूसरे गांधी के नाम से विश्वविख्यात हुए अण्णा हजारे के 16 अगस्त 2011 से विश्व को झकझोरने वाले आमरण अनशन को 27 अगस्त को संसद द्वारा स्वीकार करने पर अण्णा हजारे ने अपना आमरण अनशन को 28 अगस्त 2011की सुबह 10.30 बजे समापन कर अपने संघर्ष को कानून बनाने तक जारी रखने का ऐलान किया। क्योंकि उनकी लोकपाल में तीनों मांगों को सम्मलित करने के प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से पारित करते हुए अण्णा हजारे से अपना आमरण अनशन समाप्त करने की पुरजोर अपील की थी। संसद की भावनाओं का सम्मान करते हुए अण्णा हजारे ने अपना आमरण अनशन 28 अगस्त को 10 बजे किया। क्योंकि अण्णा हजारे सांय सूर्यास्त के बाद अपना अनशन कभी नहीं तोड़ते। 27 अगस्त को जब संसद का सांझी अपील की थी तब तक सूर्यास्त हो गया था, इसी कारण अण्णा ने अपना आमरण अनशन 28 अगस्त 2011 को प्रातः 10.30 बजे खचाखच भरे विशाल जनसमुद्र की जयजयकार के बीच तोडा। अण्णा के इस आंदोलन के अंतिम दिनों में अण्णा के इस आंदोलन के प्रमुख सेना नायकों में अग्रणी रहे स्वामी अग्निवेश की अनुपस्थिति निरंतर आंदोलन पर बारीकी नजर रखने वालों को खल रही थी ।
इस ऐतिहासिक अवसर पर मैं पूर्व दिनों की तरह इस आंदोलन में भागेदारी निभाने के लिए रामलीला मैदान में मेडिकल कैम्प के समीप मस्जिद के समीप सुबह पौने दस बजे से ही ग्यारह बजे समापन समारोह में सहभागी रहा। हालांकि 30 अगस्त तक जनलोकपाल बनाओं या जाओ’ की हुंकार संसद के इस प्रस्ताव की गूंज के नीचे न जाने कहां दब कर रह गयी। परन्तु देश का आम अवाम भी अण्णा हजारे का आमरण अनशन तुडवा कर अण्णा हजारे के नेतृत्व में देश में व्यवस्था परिवर्तन के संघर्ष के सपने को पूरा करना चाहता है। देश के अधिकांश बच्चे, बुढ़े, जवान व स्त्री पुरूष सभी घरों में बंद लोगों को देश को बचाने वाले अपने आंदोलन में न केवल सम्मलित कराने में सफलता हासिल की अपितु सभी धर्मो व जातिपाति का भेदभाव भुला कर पूरे देश को अण्णा मय ही बना दिया। देश विदेश में 25000 से अधिक स्थानों में हुए जनांदोलन ने कुम्भकर्ण बने जनप्रतिनिधियों को ही नहीं अपितु जनता को भी लोकशाही का ऐसा सबक सिखाया कि पूरा देश ही अण्णामय हो गया। भले ही अण्णा हजारे इस जीत को आधी जीत बता रहे हैं परन्तु उन्होने अपने ऐतिहासिक संघर्ष से पूरे विश्व में लोकशाही की जो अहिंसक पताका फेहरायी उससे हिंसा से ग्रसित विश्व को अमन शांति का एक नई राह मिली है।
27 अगस्त को दिन भर इस आंदोलन में अपने मजदूरों व नदिनपा के कर्मचारियों के हितों के लिए कई सालों से निरंतर संघर्ष कर रहे कर्मचारी नेता हरिओम तिवारी के साथ सम्मलित होने के बाद में जब में घर पंहुचा तो टीबी पर मेने इस विश्व विख्यात आंदोलन का ऐतिहासिक सफलता को देख कर महानायक अण्णा हजारे व उन तमाम देशवासियों ने जो इस आंदोलन में सम्मलित रहे व जिन्होने इसको समर्थन दिया उनको शत शत नमन् करता हॅू। इस आंदोलन में मैं अपने भाषा आंदोलन के अग्रणी पुरोधा राजकरण सिंह व समाजसेवी साथी मोहन सिंह रावत के साथ हर रोज भागेदारी निभाता ही रहा।
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जनलोकपाल कानून बनाने के लिए 16 अगस्त 2011 से आमरण अनशन कर रहे गांधी के बाद अहिंसा के रास्ते में विश्वलोकशाही के जननायक बन कर उभरे अन्ना हजारे के पावन आंदोलन का जहां एक तरह मनमोहनसिंह की सरकार सहित तमाम राजनैतिक दलों ने इसे तत्काल संसद के इसी सत्र में पारित करने के बजाय केवल बिना समय अवधि निर्धारित किये हुए ऐसा कानून बनाने का संकल्प लेने का केवल प्रस्ताव ही पारित किया। वह भी अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ विश्वव्यापी जनांदोलन की पावनता का सम्मान करते हुए अण्णा हजारे के सम्मुख प्रधानमंत्री ने अपने पाक साफ छवि के किसी मंत्री भेजने के बजाय भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे देशमुख को भेजा जो एक प्रकार से अण्णा के आंदोलन का अपमान ही माना जायेगा। भले की इस विन्दू पर न अण्णा व नहीं उनकी टीम के किसी सदस्य ने प्रश्न न उठा कर कई सवाल खडे कर दिये हैं।
इससे बड़ा इस आंदोलन का दूसरा क्या हो सकता है कि देशमुख जैसे राजनेता जो भ्रष्टाचारों के आरोपों में घिरे है की मध्यस्थता करने से हुआ। जिस पावन मंच पर अण्णा हजारे राजनेताओं से दूर रखते (अण्णा के जनलोकपाल कानून बनाने के मांग के लिए जंतर मंतर पर चले आमरण अनशन में सम्मलित होने को पधारी उमा भारती जैसे राष्ट्रवादी नेत्री व हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चोटाला को जिस प्रकार से अपमानित सा करके अण्णा के स्वयं सेवकों ने अनशन स्थल से बाहर जाने के लिए विवश किया। वहीं इस बार के आमरण अनशन के दौरान भाजपा के सांसद वरूण गांधी को भी अण्णा के मंच में नहीं मंच के नीचे लोगों के बीच में बैठना पड़ा।) उस पावन मंच पर देशमुख जैसे भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेता व कांग्रेसी सांसद संदीप दीक्षित ससम्मान मंचासीन होते देख कर भ्रष्टाचार के खिलाफ सतत संघर्ष करने वाले मेरे जैसे असंख्य लोगों का सर शर्म से झुक गया। इस आंदोलन में देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जहां प्रधानमंत्री से न्यायपालिका को भी इसके दायरे में रखने के लिए सारा जोर लगाया जा रहा है परन्तु सबसे हस्तप्रद करने वाली बात यह है कि देश व समाज को भ्रष्टाचार से रसातल में धकेलने के लिए कुख्यात हो चुके अधिकांश गैरसरकारी स्वयं सेवी संगठनों(एनजीओ) को इसके दायरे से बाहर रखा गया। इसका एक ही कारण है कि कांग्रेस व भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सहित अधिकांश राजनेताओं, नौकरशाहों, समाजसेवियों, पत्रकारों, कलाकारों व प्रबुद्व जनों आदि के देश से ही नहीं विदेशों से लाखों नहीं करोड़ों करोड़ का वारे न्यारे हर साल किये जा रहे हैं भारतीय व्यवस्था को भ्रष्टाचार के गर्त में धकेलने वालों की तरफ आंख उठा कर देखने वाला आज भारत में कोई नहीं है। अण्णा हजारे के आमरण अनशन को संसद या सरकार के आश्वासन के तहत समाप्त कराने के लिए सरकार तमाम तंत्र झोंक रही है। वहीं जबरन पुलिस से उठाने का भी तानाबाना भी पूरा कर दिया गया। अपने आमरण अनशन से पूरे देश को जागृत करने का ऐतिहासिक कार्य करने वाले महानायक बन कर उभरे अण्णा हजारे ने अपने दृढ़ निश्चय व साफ छवि से जहां देश के पूरे राजनेताओं को बेनकाब करने मे ं सफल रहे वहीं उन्होने देश में लोकशाही पर ग्रहण लगा रहे भ्रष्टाचार पर पूरे देश को लामंबद कर दिया है। अण्णा हजारे का आमरण अनशन चाहे सरकार पुलिसिया तंत्र के हाथों करने की आत्मघाति धृष्ठता करता है तो यह कांग्रेस की जड़ों में मठ्ठा डालने वाला ही काम होगा। परन्तु जनता का जागृत करके अण्णा हजारे ने ऐतिहासिक कार्य किया, उनको पूरा देश उनको नमन् करता है। सरकार को यह भी समझ लेना चाहिए कि अण्णा हजारे का आमरण अनशन को तोड़ने के बाद भी अण्णा का आंदोलन दम तोड़ने वाला नहीं अपितु निरंतर तेज होगा। कांग्रेस को मनमोहन सिंह, अपने राजनैतिक आका रहे नरसिंह राव की तरह अपनी पदलोलुपता व अकर्मण्यता के कारण बहुत ही आत्मघाति होगा। 25 अगस्त 2011 को सांय सात बजे में अण्णा के आंदोलन स्थल से अपने साथी मोहन सिंह रंावत के साथ वापस आया तो मुझे यह लगा कि अण्णा के इस पावन आंदोलन पर देशमुख व एनजीओ भी मनमोहन सिंह के साथ ग्रहण लगा रहे हैं। इसके साथ पहले की तरफ फिर इस बार भी अण्णा के आमरण अनशन को अपने झूठे आश्वासन से तुडवाने का तानाबाना बुन चूकी थी। वहीं दूसरी तरफ पूरे अनशन स्थल पर पुलिसिया शिकंजे के यकायक बढ़ जाने से साफ लगता था कि सरकार अण्णा के अनशन को जबरन अस्पताल में ले जाकर तुडवाने के लिए तानाबाना बुन चूकी थी। लोग आशंकित थे कि सरकार क्या फिर बाबा रामदेव के आमरण अनशन को तुड़वाने की तरह पूरे संसार में थू थू तो कराने की हिमालयी भूल तो नहीं करेगी। इस आंदोलन में सरकार द्वारा पोषित व संरक्षित भ्रष्टाचार पर गहरा कटाक्ष करते हुए अण्णा ने साफ कहा कि अब देश में ‘माल खाये मदारी व नाच करे बंदर’ नहीं चलेगा। उन्होंने आमरण अनशन के बीच में सरकार पर विश्वासघात का कड़ा आरोप लगाया। उन्होंने पूरी संसद की उनके स्वास्थ्य के बारे मेें चिंता करने पर कटाक्ष करते हुए कहा भी था कि देश के सांसदों व नेताओं को उनकी नहीं उनके मुद्दों के बारे में चिंता करो, देश के बारे में चिंता करनी चाहिए। उन्होंने स्थिति को भांपते हुए पहले ही ऐलान कर दिया थी कि वे सरकारी आश्वासन के बाद अनशन भले ही समाप्त कर देंगे परन्तु रामलीला मैदान से तब तक नहीं हटेंगे जब तक यह विधेयक पारित नहीं हो जाता है। अण्णा हजारे को पूरे विश्व में मिल रहे जनसमर्थन के बाबजूद भारतीय हुक्मरानों की कुम्भकर्णी नींद का ना खुलना अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है। आखिर इन जनविरोधी नेताओं को देश हित की सोच कब आयेगी। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

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