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Monday, August 8, 2011

विश्व लोकशाही को रौदने के बुश के पापों ने निकला महाशक्ति अमेरिका का दंभ

विश्व लोकशाही को रौदने के बुश के पापों ने निकला महाशक्ति अमेरिका का दंभ
विश्व को आगोश में लेगा अमेरिका का अर्थ संकट



नई दिल्ली (प्याउ)। रेत की महल की तरह मंदी के सुनामी से थर थर कांप रही अमेरिका अर्थव्यवस्था को देख कर पूरा विश्व सत्ब्ध है। इसके कई कारण बताये जा रहे हैं अमेरिकी जहां इस प्रकरण में एसएंडपी को पानी पी पी कर कोस रहे हों परन्तु इकका एक ही महत्वपूर्ण कारण है जिससे अमेरिकी मंुह नही मोड़ सकते हैं। वह है अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश के शासनकाल में पूरे विश्व की लोकशाही को रौंदने का जो कुकृत्य अमेरिका ने किया, उसका ही दण्ड अमेरिका आज भोग रहा है। अपनी महाशक्ति के दंभ पर व पूरे विश्व जनमत को रौंद कर अफगानिस्तान व इराक पर बलात कब्जा कर, हजारों लोगों का कत्लेआम करके अगर अमे रिका को कुछ मिला तो वह है वर्तमान आर्थिक भूचाल। अपनी वादशाहत कायम रखने के लिए पूरे विश्व को रौंदने के इस हिमालयी भूल के लिए अमेरिका को लाखों करोड़ का आर्थिक भार उठाना पड़ा। महाशक्ति के दंभ ने जहां अमेरिकियों का जमीनी वास्तविक हालत से दूर रखा वहीं उनकी पूरी अर्थव्यवस्था अनावश्यक अर्थभार से डगमगाने लग कर रेत के महल की तरह ढहने लगी। जब अमेरिकियों की आंख खुली तो उनकी व्यवस्था चीन के 1.2 ट्रिविलियन डालर के कर्ज सहित अनैक देशों के कर्ज के नीचे दम तोड रही थी। इस स्थिति से बचने के लिए अमेरिकियों को वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा को कटघरे में रखने के बजाय जार्ज बुश को कट घरे में खडा करना चाहिए। जिसने अपनी संकीर्ण सोच के लिए अमेरिका सहित पूरे विश्व का अमन चैन छीन लिया है।
भले ही भारतीय हुक्मरान अमेरिकी अर्थ संकट से भारतीय व्यवस्था को सुरक्षित रहने का दावा कर रहे है ं परन्तु अमेरिका में आये इस अर्थ भूचाल से पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था थरथरा रही है। इसके प्रभाव से पूरा विश्व अछूता नही ं रहेगा। गौरतलब है कि अमेरिका सरकार की साख का दर्जा घटाने से विश्व भर के बाजारों में फैली गंभीर आशंकाओं के बीच रेटिंग करने वाली क्रेडिट रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) ने कहा है कि भारत, मलेशिया और जापान सहित कई अन्य देशों की साख का स्तर भी नीचे किया जा सकता है। ये देश 2008 की महामंदी के प्रभावों से अभी तक पूरी तरह नहीं उबर सके हैं। एशिया प्रशांत क्षेत्र की सरकारों पर अपनी ताजा रपट में एसएंडपी ने कहा है कि इस क्षेत्र के देशों की साख कम होने का कुप्रभाव इस बार पहले से कहीं ज्यादा होगा। रपट में कहा गया है कि एशिया प्रशांत में सरकारों की ऋण संबंधी साख पर प्रभाव पहले की तुलना में अधिक होगा और इस सिलसिले में तमाम नकारात्मक कदम उठ सकते हैं।
1917 से ही क्रेडिट रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) के अब तक के सफर में अमेरिका को एएए की सर्वश्रेष्ठ स्थान मिला हुआ था। परन्तु वर्तमान स्थिति को देखते हुए अमेरिका को एएए के दर्जे को अवमूलन करते हुए उसे एए प्लस का दर्जा प्रदान किया। इसी को देखते हुए पूरे विश्व में अमेरिका की हालत पतली हो गयी। 95 साल के मिले दर्जे के हटते ही अमेरिकी व्यवस्था में मानों भूकम्प ही आ गया। इस संस्था के विषलेषण में साफ कहा गया है कि जापान, भारत, मलेशिया, ताइवान और न्यूजीलैंड की सरकारों की वित्तीय हालत पतली हुई है। इन देशों की वित्तीय दशा को 2008 के संकट के पहले की स्थिति की तुलना में खराब बताया गया है।
एसएंडपी का यह भी कहना है कि इन देशों की सरकारों को अपनी अर्थव्यवस्थाओं और बैंकों आदि को संभालने के लिए एक बार फिर सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। रपट के अनुसार, यदि आर्थिक वृद्धि की रफ्तार एक बार फिर गिरना शुरू हो गयी तो इसका और गहरा तथा लंबा प्रभाव पड़ेगा। भारतीय सहित विश्व के हुक्मरानों को इस समस्या से गंभीरता से निपटने के लिए मंत्रियों व नौकरशाही के भारी खर्चो में भारी कटोती करनी चाहिए। देश में सरकारी कर्मचारियों वेतनमानों में किसी भी स्थिति में 5 गुना से अधिक अंतर नहीं होना चाहिए। देश में काले धन व जमाखोरों के साथ साथ अवैध धन्धों पर अंकुश लगाने के लिए सरकारों को तत्काल कड़े कदम उठाने चाहिए। देश में आर्थिक आपादकाल की घोषणा करके तमाम खेल तमाशों के बड़े आयोजन व सरकारी समारोहों में पानी की तरह बहाये जाने वाले अनावश्यक खर्चो को बंद कर देना चाहिए। यही नहीं सरकार तमाम विज्ञापन आदि को भी बंद कर देना चाहिए। वहंी अमेरिका को चाहिए कि वह विश्व शांति को ग्रहण लगाने वाले अपने नापाक आतंक प्रसार कुकृत्यों पर अंकुश लगाये। अभी भी विश्व के 75 देशों में अमेरिकी सेना अपनी थानेदारी झाड रही है। इसी कारण अमेरिका की व्यवस्था पर भारी भार पड़ रहा है। अमेरिका के सह पर पाक जो आज भारत सहित विश्व के कई देशों में आतंक का तांडव मचा रहा है उस पर भी अंकुश खुद ही लगाना चाहिए। नहीं तो समय दूर नहीं अमेरिका की अर्थव्यवस्था पूरे विश्व की अर्थव्यवस्थाओं पर ग्रहण लगाने वाला ताबूत की कील बन जायेगी। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि औम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

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