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Tuesday, August 2, 2011

.देश के पतन पर नहीं अपितु क्रिकेट की हार से दुखी हैं भारतीय

.देश के पतन पर नहीं अपितु क्रिकेट की हार से दुखी हैं भारतीय/
-खेल भावना की कमी है भारतीयों में/

जैसे ही भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लेण्ड के े खिलाफ दूसरे क्रिकेट टेस्ट मैच में सोमवार को मिली 319 रनों की करारी शिकस्त के बाद चार टेस्ट की सीरीज में 0-2 से पिछड़ी तो पूरे देश में शोक की लहर ही छा गयी। क्या राजनेता क्या मीडिया क्या आम आदमी सभी एक स्वर मेें ऐसे चिंतित थे कि मानों देश का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया होगा। मानों देश में कोई बड़ी समस्या या त्रासदी इससे बड़ कर नहीं है।
देश मंहगाई, आतंकवाद व भ्रष्टाचार से तबाह है परन्तु क्या मजाल की देश में कहीं ऐसा सदमा या आक्रोश देखने को मिले जो क्रिकेट पर हुई हार पर देखने को मिल रहा है। यह सामान्य खेल न हो कर युद्व से बढ़ कर त्रासदी सी प्रतीत हो रही है। जिसे देखो वहीं स्यापा कर रहा है। सब गमगीन है। मंहगाई से देश के करोड़ों लोगों कां जीना हराम है किसी को कोई गम नही। भ्रष्टाचार व सरकार के अत्याचार से देश तबाही की तरफ ंधकेला जा रहा है परन्तु क्या मजाल देश की जनता व मीडिया ऐसा शोक मनाये जो क्रिकेट पर मनाया जा रहा है । मानों क्रिकेट की देश की साम मान व आन का प्रतीक हो।
मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि हम भारतीय आखिर कब खेल को खेल समझेंगे। खेल को युद्व व युद्व को खेल समझ लेते है। जिस समस्याओं का निदान के लिए देश के हुक्मरानों, मीडिया व आम जनता ने चिंतित होना चाहिए था उस तरफ सभी मूक रखते है। जिसे स्वप्नवत समझ कर खेल का आंनन्द लेना चाहिये था उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना देते हैं। यही हमारे पतन व पिछडेपन का मूल कारण है।
भारतीय टीम अब तक सीरीज भी हार जाते हैं तो र्कोइं आसमान नहीं टूट पड़ता। हमेशा हम ही प्रथम रहे, हम ही जीते यह विचार व प्रवृति ही अमानवीय व अलोकशाही है । जो अच्छा खेला वो जीते। यही खेल भावना है। जीत का स्वागत व हार से सबक लेना चाहिए। देश के आमूल विकास में समर्पित हो कर जो चिंता करनी चाहिए थ ी वह चिंता त ो क्रि केट के लिए ही की जा रही ह ै। देश के विकास व देश के आम लोगों का जीवन स्तर सुधारने के लिए जो चिंतन व काम किया जाना चाहिए थ ा उसका नितांत अ भाव है। यह ी देश क े पतन का कार ण बन गया है ।

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