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Saturday, September 1, 2012



उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन में खटीमा काण्ड की 18 वीं बरसी पर अमर शहीदों को शतः शतः नमन्

उत्तराखंड राज्य गठन जनांदोलन में 1सितम्बर 1994 को तत्कालीन उप्र मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की पुलिस द्वारा खटीमा में शांतिपूर्ण ढ़ग से आंदोलनकर रहे राज्य आंदोलनकारियों को गोलियांे से भूना गया, उस काण्ड की 18 वीं बरसी पर सभी शहीदों की पावन स्मृति को शतः शतः नमन्। एक सितम्बर 1994 को खटीमा क्षेत्र के हजारों लोग जब शांतिपूर्ण ढंग से जुलूस निकालकर पृथक राज्य की मांग कर रहे थे तभी मुख्य चैराहे पर तत्कालीन थानाध्यक्ष डीके केन ने शांतिपूर्ण आंदोलनकर रहे आंदोलनकारियों को पुलिसिया दमन से चूप कराना चाहा। जिसका आंदोलनकारियों ने पुरजोर विरोध किया। इस पुलिसिया हनक में लोकशाही को रौंदने वाले गुनाहगार ने जलियांवाला बाग की तर्ज पर पुलिस गोलियां से आंदोलनकारियों को छलनी कर दिया। इसमें सात आन्दोलनकारी शहीद हो गये।
अमर शहीद स्व० भगवान सिंह सिरौला, ग्राम श्रीपुर बिछुवा, खटीमा।
अमर शहीद स्व० प्रताप सिंह, खटीमा।
अमर शहीद स्व० सलीम अहमद, खटीमा।
अमर शहीद स्व० गोपीचन्द, ग्राम-रतनपुर फुलैया, खटीमा।
अमर शहीद स्व० धर्मानन्द भट्ट, ग्राम-अमरकलां, खटीमा
अमर शहीद स्व० परमजीत सिंह, राजीवनगर, खटीमा।
अमर शहीद स्व० रामपाल, निवासी-बरेली।
अमर शहीद स्व० श्री भगवान सिंह सिरोला।
इस पुलिस फायरिंग में बिचपुरी निवासी श्री बहादुर सिंह, श्रीपुर बिछुवा के पूरन चन्द्र भी गंभीर रुप से घायल हुये थे।..राज्य गठन के बाद प्रदेश के हुक्मरानों को न तो राज्य गठन के शहीदों की शहादत का ही भान रहा व नहीं जनांदोलनों -बलिदानों से  पुलिसिया अमानवीय दमनों को सह कर भी  गठित इस राज्य की जनांकांक्षाओं का ही कहीं दूर-दूर तक भान रहा। हालत इतनी शर्मनाक हो गयी है कि जिन्होने उत्तराखण्ड राज्य गठन का पुरजोर विरोध किया था उन तिवारी जैसे विरोधी नेता को मुख्यमंत्री के रूप में थोप कर शहीदों की शहादत व राज्य गठन के आंदोलनकारियों के सपनों को जहां रोंदा गया वहीं प्रदेश में राव-मुलायम के अमानवीय दमन के कहारों व दलालों को यहां पर सत्तासीन कांग्रेस भाजपा की सरकारों ने शर्मनाक संरक्षण दे कर प्रदेश के स्वाभिमान व हितों को जनंसख्या पर आधारित परिसीमन, गैरसैंण राजधानी बनाने से रोंकने, मुजफरनगरकाण्ड-94 के अभियुक्तों को संरक्षण देने, प्रदेश के संसाधनों को प्यादों को लुटवाने, प्रदेश में बाहर के बंगलादेशी घुसपेटियों को बसा कर इसको कश्मीर व असम की तरह बर्बाद करने का कृत्य करना, प्रदेश में भाजपा व कांग्रेस के दिल्ली आाकाओं ने जातिवादी व भ्रष्टाचारी मानसिकता से ग्रसित हो कर यहां  पर अपने प्यादों को मुख्यमंत्री के रूप में थोप उत्तराखण्ड में लोकशाही का निर्ममता से गला घोंटने का कृत्य किया। ऐसे थोपशाही के प्यादों तिवारी, खण्डूडी, निशंक के बाद अब विजय बहुगुणा जैसे नेता को प्रदेश की कमान कांग्रेसी आला कमान ने सोंपी। जो प्रदेश के संसााधनों की बंदरबांट करने में तुला है। जिनको मुलायम सिंह व उनके प्यादों के साथ बेशर्मी से खडा होने में जरा सी भी प्रदेश के राज्य गठन के शहीदों की चित्कार व धिक्कार तक नहीं सुनाई देती। जिनको प्रदेश की चीनी मिलों  को लुटवाने में अपने प्रदेश की जनता व अपने पार्टी के सांसदों व विधायकों का विरोध तक नहीं सुनाई देता। जो लोग राज्य गठन जनांदोलन के शहीदों व आंदोलनकारियों के कातिलांे को संरक्षण देने वालों को महत्वपूर्ण संवेंधानिक पदों पर आसीन करने में तनिक सा भी शर्म महसूस नहीं करते ऐसे हुक्मरानों से प्रदेश के विकास व प्रदेश के सम्मान की क्या आश जनता लगायेगी। प्रदेश के मुख्यमंत्री को दिल्ली जा कर प्रदेश के हितो ं को रौंदने के अलावा इस बात का भी भान नहीं रहा कि 1 सिंतम्बर को खटीमा के शहीदों की शहादत का मर्म क्या है? मसूरी, देहरादून मुजफरनगर काण्ड सहित प्रदेश में शहीद हुए आंदोलनकारियों की शहादत का अर्थ क्या है? आज सवाल केवल विजय बहुगुणा या तिवारी जैसे सत्तांध उत्तराखण्ड विरोध नेताओं का ही सवाल नहीं है अपितु आज प्रदेश के अधिकाांश विधायक व सांसदों को इसका कहीं दूर दूर तक भान नहीं है। केवल घडियाली आंसू बहाने के लिए कभी कभार ये आंदोलनकारी शहीदों को याद करते हैं नहीं तो अगर इनके दिल में कहीं दर्द रहता तो ये एक दिन भी प्रदेश की सत्ता में आसीन हो कर या जनप्रतिनिधि बनने के बाद उस शासक व प्रशासन में कैसे अपने छाती पर मूंग दलने देते जिनके हाथ मुलायम के कहारों व शहीदों के हत्यारों को संरक्षण देने वाले गुनाहगारों के साथ है। गोलीकांड के शहीदों की याद में यहां की जनता हर साल सर्वदलीय सभा खटीमा की तहसील परिसर सहित प्रदेश व देश के विभिन्न शहरों में आयोजित करती है।

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