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Thursday, September 13, 2012


रूद्रप्रयाग में 13 सितम्बर को बादल फटने से मची तबाही, 29की मौत 20 से अधिक लापता 

बागेश्वर में 12 के बाद 13 सितम्बर को भी बादल फटने से 5 की मौत

बादल फटने की घटनाओं में बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार हैं प्रदेश में बड़ी संख्या में बनाये गये बांध





चमोली के श्रीगढ़ क्षेत्र में 13 सितम्बर को बादल फटने से मची तबाही 

उत्तराखण्ड में विते दिनों में बागेश्वर व रूद्रप्रयाग जनपदों में बादल फटने से प्रभावित क्षेत्रों में भारी तबाही मची है। लोग इस बात से परेशान है कि कुछ ही सालों में पर्वतीय क्षेत्र में बादल फटने की घटना में यकायक भारी बढोतरी क्यों हुई। मौसम वैज्ञानिक भले ही बादल फटने को पानी वाले बादलों की राह में कोई बाधा उत्पन्न होने को कारण मान रहे हैं परन्तु हिमालयी पर्यावरण के चिंतक इसके लिए यहां पर प्रकृति से खिलवाड करके बनाये गये बडी संख्या में बांधों को ही इस विनाश का मुख्य कारण मान रहे है। इस सप्ताह रूद्रप्रयाग में 13 सितम्बर की रात 12 बजे को ऊखीमठ विकासखण्ड के चुन्नी मंगोली, ब्राताणखोली, प्रेमनगर, किमाणा (जुआ) आदि गांवों में बादल फटने से भारी तबाही मच गयी। यहां पर 29 आदमी के मरने व 31 से अधिक लोगों के लापता होने की खबर है। सबसे ज्यादा तबाही चुन्नी गांव में 18 , किमाणा (जुआ) में 11,डंगवाड़ी में 4, ब्राताणखोली में 4, गिरिया में 3 व एक गोदाम के 4नेपाली मजदूरों सहित कुल 49 लोग अकाल काल के गाल में समा गये। इसके अलावा 50 से अधिक पशु भी गौशालाओं में ही जमीदोज हो गये। यहां पर चारों तरफ तबाही का दृश्य देख कर हर आदमी प्रकृति के इस तांडव देख कर सहमा हुआ है। गंभीर रूप से घायल हुए 9 से अधिक लोगों को हेलीकप्टर से श्रीनगर के बेस चिकित्सालय में भर्ती किया गया है। इस भारी त्रासदी में राहत कार्य में स्थानीय शासन के साथ सेना, पुलिस, आईटीबीपी, आपदा प्रबंधन दल के अलावा स्थानीय लोग भी बड़ी संख्या में राहत तथा बचाव कार्य में दिन रात लगे हुए है। इसके अलावा दिल्ली से नेशनल डिजास्टर रिलीफ फोर्स (एनडीआरएफ) की 45 सदस्यीय टीम पीडि़त क्षेत्र में राहत कार्य में भेजी गयी है। इसके साथ चमोली के श्रीगढ़ क्षेत्र में भी बादल फटने से क्षेत्र में खेत खलिहान व मार्ग क्षतिग्रस्त हो गये है। बड़कोट सहित उत्तरकाशी में हुई मूसलाधार वर्षा से भारी नुकसान होने की खबरें हैं। 
वहीं दूसरी तरफ बागेश्वर जनपद के कफकोट तहसील में जहां 12 सितम्बर को बादल फटने से 1 बालक की दर्दनाक मौत व मकान, गौशाला, खेत खलिहान आदि को भारी नुकसान हुआ था। इसके एक दिन बाद ही ं 13 सितम्बर बृहस्पति को कफकोट के चिरपतकोट क्षेत्र में ही फिर बादल फटने व मूसलाधार वर्षा से उफान पर आए नदी व गाड़ गदेरों ने पांच लोगों को बहा कर मौत की नींद सुला दिया। इनमें घराट गैंहॅू पीसने के लिए गये । इसके अलावा जगथाना की युवती नीमा ,खर्कुकानातोली के मोहन चन्द्र ,गैनाड़ के डुंगर सिंह भी उनफती गाड गदेरे व नदी में बह गए हैं। इसके साथ कई मकान, खेत आदि ढ़ह गये। 
इससे पहले बागेश्वर में 12 सितम्बर को बादल फटने से पोथिंग गांव निवासी बिशन सिंह (50) पुत्र खीम सिंह व उनकी 45 वर्षीय पत्नी मधुली देवी गदेरा पार करते हुए बह गयी। इसके अलावा यहां खेत खलिहान तबाह हो गये है। स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन ने सेना को राहत कार्यो के लगाने की मांग की है। इस क्षेत्र में हो रही मूसलाधार वर्षा से भिन्डी में सडक में मलवा आने से रिषीकेश केदारनाथ राजमार्ग बंद हो गया है। क्षेत्र का सम्पर्क शेष जनपद से कट गया है। 
वहीं दूसरी तरफ 12 सितम्बर बुद्धबार की रात बागेश्वर के कफकोट क्षेत्र में चिरपतकोट पहाडी पर बादल फटने व मूसलाधार वर्षा से स्थानीय गाड़ गदेरे व सरयू नदी के उफान से से इसके समीपवर्ती गांव पौथिंग ग्राम सभा के उच्छात तोक, आदि नुकसान हुआ। इस कफकोट क्षेत्र में बड़ेत, हरसिंग्याबगड़, सीरी, परमटी, चीराबगड़, बमसेरा, खाईबगड़, कपकोट, गैरखेत, रैथल, गोलना, असौं ,दुबटिया तोक में कलमठ,चीराबगड़ व परमटी, हिचैड़ी भराड़ी व गांसू सहित अनैक गांवों इस दिनं कई मकान, गौशालायें व खेत खलिहान तबाह हो गये वहीं पौलिंग ग्राम सभा के उच्छात तोक निवासी पुरूषोत्तम जोशी का 14 वर्षीय बेटा मकान के ध्वस्थ होने से मलवे में दब कर दम तोड़ गया और उसका भाई दीप गंभीर रूप से घायल हो गया। इसी गांव में 15 पशु भी गोशाला में जमीदोज हो गये। 
प्रदेश में इसी दो महिनों के अंदर बादल फटने की घटनाओं में अचानक बढोतरी होने से पूरे प्रदेश के लोग सहमें हुए है। मौसम वैज्ञानिकों की जहां धारणा है कि जब वर्षा वाले बादलों की राह में कोई बाधा उत्पन्न होती है तो उनमें तेज गति से आपस में टकराव होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार जब किसी सीमित क्षेत्र में प्रति घंटे एक सौ मिलीमीटर या उससे अधिक बारिश हो तो उसे बादल फटना कहा जाता है। इससे ऐसी बारिश होती है कि मानों किसी ने उपर से पानी का तेज गति का झरना ही छोड़ दिया हो। यह भले ही कम समय के लिए हो परन्तु पर्वतीय क्षेत्र में चट्टाने कमजोर होने के कारण इस अप्रत्याशित जल की प्रबल वेगधारा को सहन नहीं कर पाते है और उसके रास्ते में छोटे पहाड़, मकान, खेत खलिहान जो भी आाते हैं बहा कर तहस नहस हो जाता है। वैज्ञानिक भले ही इसे बादल फटने का नाम देते हों परन्तु आम लोग इसे जल प्रलय ही मानते हैं। 
पर्यावरणविद इसे इस संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बड़ी संख्या में बनाये जा रहे बांधों से हो रहे यहां के पर्यावरण से खिलवाड को ही जिम्मेदार मान रहे है। बांधों के बनाये जाने से यहां की जलवायु में जो कृतिम परिवर्तन करके यहां पर विशाल बांध रूपि झीलों का बलात निर्माण किया गया, वह यहां के पर्वतीय जलवायु के अनुकुल नहीं है। इन बांधों से बनने वाले पानी के बादलों से ही यह तबाही मच रही है। क्योंकि प्रकृति ने जो यहां पर गाड गदेरों व नदियों की रचना की उसके अनकुल यहां के परिवेश है। परन्तु जो बलात विशाल झीलें यहां पर बना कर प्रकृति से गंभीर खिलवाड़ किया जा रहा है वह इस हिमालयी क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा बन गया है। इन बांधों के निर्माण से पहले इस हिमालयी क्षेत्र में पहले वर्षो में कभी बादल फटने की घटना सुनाई देती थी परन्तु विगत दो माह में उत्तरकाशी, चमोली, टिहरी के बाद अब बागेश्वर व रूद्रप्रयाग जनपद में बादल फटने से तबाही मची हुई है उससे न केवल प्रदेश के लोग हैरान हैं अपितु पर्यावरणविद भी परेशान है। परन्तु सरकार को इस दिशा में सोचने की फुर्सत ही नहीं क्योंकि उनको जनहित व प्रदेश के हित से अधिक इन बांधों के निर्माण से मिलने वाले करोड़ों करोड़ रूपये की रिश्वत डकारने की ज्यादा चिंता रहती है। जनहितांें के लिए हमेशा मूक रहने वाले ये जनप्रतिनिधि व शासक इन बांधों के निर्माण के लिए प्रधानमंत्री से लेकर जनता तक सबसे गुहार लगाते नजर आते है।

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