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Saturday, September 22, 2012



ऊखीमठ त्रासदी के लिए प्रशासन जिम्मेदार 

-ऊखीमठ क्षेत्र के  मंगोली गांव के ऊपर के पहाड़ पर हो रहे विनाशकारी साबित हुए भूस्खलन का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने व इसका ट्रीटमेंट कराने की जिलाधिकारी, मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री से  2002 से मंगोली गांव के मूल निवासी ख्यातिप्राप्त भू वैज्ञानिक बलबीर सिंह धर्मवान की निरंतर पुरजोर मांग को  प्रशासन द्वारा घोर उपेक्षा करने के कारण  13 सितम्बर को हुई इस त्रासदी के लिए प्रशासन को ही एकमात्र जिम्मेदार मानते है।

अगर शासन प्रशासन ने ऊखीमठ क्षेत्र में विनासकारी साबित हुए मंगोली गांव के ऊपर पर्वत श्रृखला के भूस्खलंन का भूसर्वेक्षण व ट्रीटमेंट कराने की 2002 से जिला अधिकारी, मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री से भू गर्भ वैज्ञानिक बलबीर धर्मवान की लगातार लगायी जा रही गुहार को समय पर सुना होता तो आज 13 सितम्बर की रात आयी इस क्षेत्र में विनासकारी तबाही से हुए 60 से अधिक लोगों की मौत, 70 से अधिक तबाह हुए मकानों, अरबों रूपये मूल्य की खेत खलिहानों आदि की तबाही से बचा जा सकता था। 

ऊखीमठ में इसी माह बादल फटने के बाद हुए भूस्खलन से जो विनासकारी तबाही हुई उसके लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो यहां का बेहद उदासीन व भ्रष्ट प्रशासन। जिसने उनके 2002 से उनके द्वारा लगातार इस भूस्खलन के लिए जिम्मेदार पर्वत श्रृखला का सर्वेक्षण कराने की मांग को नजरांदाज किया। निकम्मे प्रशासन ने न तो इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया व नहीं यहां हो रहे भूस्खलन का ट्रीटमेंट। इसी पर्वत से हुई भूस्खलन के कारण मंगोली ग्रामसभा में 28 लोगों व समीपवर्ती क्षेत्र में 32 अन्य लोगो ंकी मौत हुई।‘ यह टूक आरोप 13 सितम्बर को ऊखीमठ क्षेत्र के तबाह हुए गांवों की विनाशकारी हालत को देख कर दिल्ली लोटे भू वैज्ञानिक बलबीरसिंह धर्मवान ने प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र से व्यथित होकर कही।
उन्होने दो टूक शब्दों में कहा कि जितना धन राजनेता व नौकरशाह अब ऊखीमठ क्षेत्र में 13 सितम्बर की रात को भूस्खलन से हुई त्रासदी के बाद यहां पीडि़तों के झूठे हमदर्द बन कर घडियाली आंसू बहाने के नाटक करने के लिए हेलीकाॅप्टर से यात्रा करने आदि में लगा रहे है, उससे कम खर्च में इस तबाही का कारण बने मंगोली गांव के ऊपर की वर्षो से भूस्खलन हो रही पर्वत श्रृंखला का भूगर्भीय सर्वेक्षण व ट्रीटमेंट कराकर 13 सितम्बर की रात आयी इस क्षेत्र में विनासकारी तबाही से हुए 60 से अधिक लोगों की मौत, 70 तबाह हुए मकानों, अरबों रूपये मूल्य की खेत खलिहानों आदि की तबाही से बचा जा सकता था। उन्होने अफसोस प्रकट किया कि यहां शासन प्रशासन में बैठे लोगों को न तो आम लोगों की जानमाल की चिंता है व नहीं अपने दायित्व का भान। यही नहीं वे जनहित के किसी भी संवेदनशील कार्य तक करने के लिए समय पर कहीं तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि शासन प्रशासन में आसीन लोगों का ध्यान अपने दायित्व के निर्वहन से अधिक अब प्राकृतिक आपदा के धनराशि की बंदरबांट पर है। अगर प्रशासन ने उनकी गुहार समय पर सुन ली होती तो आज इस लोगों को यह बुरे दिन नहीं देखने पड़ते। इसमें रूद्रप्रयाग पीडब्ल्यूडी विभाग ने जो यहां पर भूस्खलन क्षेत्र का ट्रीटमेंट करने का जो अपने दायित्व नहीं निभाकर अक्षम्य अपराध किया, उसका खमियाजा यहां की जनता व प्रशासन आज भूगत रहा है।
 उन्होंने कहा आज इस त्रासदी के बाद जिलाधिकारी व प्रशासन भारतीय भूगर्भ विभाग से सर्वेक्षण कराने की बात कह रहे हैं क्यों प्रशासन के पास इस बात का कोई जवाब हे कि विगत दस सालों से इसकी मांग को उन्होंने क्यों ठुकरा कर पाच दर्जन से अधिक लोगों को मौत के मुंह धकेला।
13 सितम्बर की रात को आये विनाश के बाद इस क्षेत्र में जब वे गये तो राहत के नाम पर राजनेताओं व नौकरशाही की हवाई पिकनिक से पीडि़त जनता काफी परेशान ही नहीं दुखी भी है। जिस प्रकार से मुख्यमंत्री विजय, सांसद सतपाल महाराज व प्रदेश के आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य ने हेलीकाॅप्टर से रा.इंटर कालेज के मैदान में बने हेलीपेड़ में उतर कर त्रासदी से तबाह गांवों का जायजा लेने के बजाय मात्र 100 मीटर की दूरी पर वहां पर तमाम पीडि़त, घायलों आदि को शासन प्रशासन द्वारा बुलवा कर अपना कत्र्तव्य इति समझा। हाॅं भाजपा के तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों भगतसिंह कोश्यारी, भुवनचंद खण्डूडी व रमेश पोखरियाल निशंक ने अलग अलग तबाह हुए क्षेत्र में जा कर वहां का जायजा लिया। देखा तो यह जा रहा है कि प्रायः नेता या अधिकारी जो भी लोगों का दुख दर्द लेने के नाम पर यहां पर आ रहा है वह अपने साथ किसी फोटोग्राफर को ला कर लोगों के साथ अपनी फोटो खिंचवा कर अपना दायित्व पूरा कर रहा है। यही नहीं उत्तरकाशी में प्राकृतिक आपदा के पीडि़त लोगों को उचित राहत देने के नाम पर ‘भजन आदि करने की सलाह देने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री को अपने बेटे को चुनाव लड़ाने में भारी व्यवस्तता के कारण यहां लोगों की सुध लेने का समय है ही कहां। हाॅं ऊखीमठ त्रासदी के पीडि़तों को सरकार से अधिक शांतिकुज का दिन रात चलने वाला लंगर अधिक राहत पंहुचा रहा है। जो सरकारी खाना हेलीकाप्टर द्वारा लाया जा रहा है उसको आदमी क्या कुत्ते तक बदबू मारने के लिए खाने के लिए तैयार नहीं है।
रूद्रप्रयाग जिला मुख्यालय से 45 किमी दूरी पर स्थित ऊखीमठ के समीपवर्ती क्षेत्र में 13 सितम्बर हो बादल फटने व भूस्खलन से भारी तबाही हुई।  इसके कारण गिरीया मनसूना  में 3, मंगोली में 10, चुन्नी में 18, ब्राह्मण खोली 4, राशन डिप्पो में 4 नेपाली मजदूर,बोधे 4, जुजा 12, व प्रेम नगर 5 लोक 13 सितम्बर को आयी प्राकृतिक त्रासदी में कालकल्वित हो गये। यह सब ऊखीमठ-मनसूना मोटर मार्ग में मंगोली गांव के ऊपर के कई सालो ंसे पहाड़ टूटने व उससे हो रहे भूस्खलन का समय पर ट्रीटमेंट न किये जाने के कारण हुआ। भू वैज्ञानिक व मंगोली गांव के समाज सेवी ने शासन प्रशासन को इससे आगाह किया। उनकी इस चेतावनी को 14 नवम्बर 2002 को अमर उजाला में वर्षा से मंगोली गांव में भूस्खलन के खतरे व  25नवम्बर 2002 में दैनिक जागरण में मंगोली गांव इस भूस्खलन से होने वाले खतरे की खबरे प्रकाशित करके जनता व प्रशासन को आगाह किया। यही नहीं  5 फरवरी 2005 को भू बैज्ञानिक बलबीर धर्मवान ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व  जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग को पत्र लिख कर किया आगाह कि प्रशासन 12-13 नवम्बर 2002 की रात्रि को आये मंगोली गांव के ऊपरी पहाड पर हुए भूस्खलन की अनदेखी कर रहा है। 6 फरवरी 2005 को भू वैज्ञानिक की 2 साल बाद भी इस पहाड पर हो रहे भूस्खलन की उपेक्षा करने की खबर को दैनिक जागरण व अमर उजाला ने प्रकाशित की।  14 नवम्बर 2007 को भू वैज्ञानिक बलबीर धर्मवान ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सरकारी तंत्र द्वारा आपदा प्रबंधन के कार्य के प्रति बेहद उदासीन होने का आरोप लगाया।  30 मई 2008 जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग द्वारा भू वैज्ञानिक बलबीर धर्मवान को उनके प्रधानमंत्री को प्रशासन द्वारा मंगोली गांव के ऊपर स्थित पर्वत पर हो रहे भूस्खलन की उपेक्षा करने वाले  पत्र का जवाब ( संख्या 2852/41-02(2007-2008) दिनाॅंक 30 मई 2008) दिया। 10 जून 2010 को इस क्षेत्र का भू सर्वेक्षण कराने की मांग को लेकर भू वैज्ञानिक धर्मवान का जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग को प्रार्थना पत्र लिखा।
20-6-2010 को अमर उजाला समाचार पत्र ने प्रमुखता से मंगोली गांव के भूगर्भीय सर्वेक्षण कराने की वैज्ञानिक धर्मवान की बात को प्रकाशित किया।  25 अक्टूबर 2010 को भू वैज्ञानिक बलबीर सिंह धर्मवान ने फिर जिलाधिकारी को मंगोली गांव के ऊपर स्थित भूस्खलन हो रहे पर्वत से उत्पन्न खतरे के निदान हेतु पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने की मांग के प्रति शासन प्रशासन की उदासीनता से खिन्न हो कर 28 जनवरी 2011 से आमरण अनशन की चेतावनी युक्त पत्र दिया।
जब प्रशासन द्वारा 2002 से उनके आग्रहों को नजरांदाज करने का का कृत्य किया और उससे 13 सितम्बर को ऊखीमठ क्षेत्र में भारी तबाही हुई। इससे व्यथित हो कर भू वैज्ञानिक श्री धर्मवान ने 19 सितम्बर 2012 को 13 सितम्बर की रात को आयी इस क्षेत्र में भारी प्राकृतिक त्रासदी में 60 लोगों के भूस्खलन में मारे जाने के बाद पुन्न इस क्षेत्र में भूस्खलन का वैज्ञानिक व इंजीनियरिग ट्रीटमेंट करने की अपनी दस साल पुरानी मांग को दोहराते हुए जिला अधिकारी रूद्रप्रयाग को फिर पत्र लिखा।

सरकार ने इस त्रासदी के पीडि़त परिवारों को जहां 5400 रूपये वर्तन खाने के लिए दिये। वहीं  एक लाख मकान क्षतिग्रस्त होने पर व 3 लाख मृतक आश्रित को देने का ऐलान किया। यहां पर इस त्रासदी से 70 परिवार बेघर हुए , करीब 400 लोग सुरक्षित ठिकाने की तलास में ,107 परिवार को मदद की जरूरत है। वैज्ञानिक धर्मवान के अनुसार अधिकांश त्रासदी इस क्षेत्र में जुलाई माह में नहीं अपितु अगस्त सितम्बर में होती है।


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