Pages

Monday, September 3, 2012


विफल हो गयी है क्या उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद ?

उत्तराखंड पत्रकार परिषद के चुनाव ’के लिए बढ़ रहा है दवाब 

नई दिल्ली(प्याउ)। देश की राजधानी दिल्ली में देश के पत्रकारों में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले उत्तराखण्ड के पत्रकारों का मजबूत सं
गठन ‘उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद के चुनाव के लिए इसके संस्थापक सदस्यों ने वर्तमान मनोनीत कार्यकारणी पर अपना दवाब बनाना शुरू कर दिया है। इस सप्ताह इस मांग को उस समय और बल मिला जब वर्तमान मनोनीत कार्यकारणी के महत्वपूर्ण सदस्य हरीश लखेड़ा ने फेस बुक में अपने इस विचार को प्रमुखता से लिखा। अपने फेस बुक के पेज में श्री लखेड़ा ने लिखा कि ‘तीन साल पहले हमने उत्तराखंड पत्रकार परिषद को पुनर्गठित व पुनर्जीवित करने की कोशिश शुरू की थी, लेकिन यह प्रयास विफल होता प्रतीत हो रहा है। इसलिए मेरा मानना है कि अब इस संस्था के चुनाव हों और नये लोग सामने आकर इस अधूरे कार्य को आगे बढ़ाएं।’
गौरतलब है कि जबसे हरीश लखेड़ा, रोशन, विजेन्द्र रावत, अवतार नेगी, देवेन्द्र उपाध्याय, सुरेश नोटियाल, व्योमेश जुगरान, खुशहाल जीना, कैलाश धुलिया, श्री जोशी, भूपेनसिंह, देवसिंह रावत आदि वरिष्ठ पत्रकारों की उपस्थिति में उत्तराखण्ड व पत्रकार के हितों की रक्षा देने तथा दिशा देने के लिए एक सशक्त व अनुभवी पत्रकारों के नेतृत्व में एक कार्यकारणी का गठन किया जाय, जो जल्द ही नयी निर्वाचित कार्यकारणी को कार्यभार सोंप देगी। इसके लिए हरीश लखेड़ा आदि पत्रकारों के विशेष प्रयाश से देवेन्द्र उपाध्याय को अध्यक्ष व अवतार नेगी को महासचिव बना कर उनकी एक कार्यकारणी का भी गठन को मंजूरी दे दी। पत्रकार परिषद के गठन के बाद पहला कार्यक्रम उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री निशंक को मुख्य अतिथि वाला कार्यक्रम भारी विरोध की भैंट चढ़ गया। हालांकि इस कार्यक्रम में आध्यात्म गुरू भोले जी महाराज व माता मंगला ने इस पत्रकार परिषद को 5 लाख रूपये का सहयोग देने का ऐलान किया। इसके बाद उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद ने अपनी बैबसाइट का शुभारंभ भी कराया, इसमें जिंदल ग्रुप की कम्पनी के एक वरिष्ट पदाधिकारी ने भी इस संस्था को इतना ही सहयोग देने की बात परिषद के महासचिव ने प्रेस क्लब में एक बातचीत में कही। इसके साथ ही सुत्रों के अनुसार उत्तराखण्ड के एक पत्रकार से एक लाख के करीब सहयोग हासिल किया गया। इस प्रकार से इस परिषद के पास जब लाखों रूपये हो गये तो इस संस्था पर काबिज होने के लिए कई पत्रकारों की सरगर्मिया बढ़ने लगी। पत्रकार परिषद भले ही उत्तराखण्ड के हितों के लिए समाज व नेताओं को सही दिशा देने में भले ही नाकाम रहा हो परन्तु यह परिषद अपने इस चंद सालों के कार्यकाल में इसके कोष में लाखों रूपया इकट्ठा करने के साथ इसकी वैबसाइट बनाने में सफल रही। उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष राजेन्द्र धस्माना इस परिषद के गठन के कुछ महिनों बाद ही इसमें चुनाव कराने की पुरजोर मांग कर चूके है। इस परिषद से नये नोजवान पत्रकारों को जहां ंगहरी निराशा हुई। नये जुझारू पत्रकारों को आशा थी कि यह परिषद उत्तराखण्ड के दिशाहीन, सत्तालोलुपु नेताओं व सामाजिक संगठनों को सही दिशा दे कर उत्तराखण्ड की पथभ्रष्ट हो चूकी राजनीति को हिमाचल की तर्ज पर विकासोनुमुख दिशा दे सकती है।
देखना है कि यह संस्था भी लाखों रूपये इकट्ठा करने के बाद अन्य सामाजिक संगठनों की तरह ही आपसी गुटबाजी का अड्डा बनती है या प्रदेश के लिए दिशा देने वाली एक महत्वपूर्ण स्वस्थ जीवंत संस्था बनती है। गौरतलब है कि वर्तमान अध्यक्ष व महासचिव दो टूक शब्दों में कह रहे हैं कि उनके छोटे से कार्यकाल में जो उपलब्धियां परिषद ने हासिल की वह परिषद के इतिाहास में एक नजीर है।
 

No comments:

Post a Comment