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Tuesday, June 18, 2013

भाषा आंदोलन को रौंदने का दण्ड भोग रहे हैं अटल व आडवाणी


सत्तासीन हो कर भाषा के लिए अटल आडवाणी ने किये दो कार्य
1-संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी बोल कर, भारत में हिन्दी की जडों को काटने का काम
2-भाषा आंदोलन को कुचलने जैसे जघन्य कार्य

नई दिल्ली (प्याउ)। सत्तामद में चूर हो कर भाषा आांदोलन को रौंदने के अभिशाप का दण्ड भोग रहे हैं अटल व लालकृष्ण आडवाणी’ । जैसे ही संसद की चैखट पर चल रहे भारतीय भाषा आंदोलन में भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चोहान ने आडवाणी की दयनीय स्थिति पर हो रही चर्चा पर यह दो टूक बात कही तो एक पल के लिए आंदोलनकारी सन्न रह गये। सन्न रहना भी था क्योंकि अटल व लालकृष्ण आडवाणी की ही नहीं भारतीय जनता पार्टी की छवि भारतीय भाषा व संस्कृति के मूल्यों के लिए संघर्ष करने वाले राष्ट्रवादी नेताओं की दशकों से बनी हुई है। श्री चैहान ने कहा कि कांग्रेस सहित अन्य दलों की सरकारों ने तो भारतीय भाषाओं की जडों में मट्ठा तो डालने का काम तो किया ही लेकिन भारतीय भाषाओं व राष्ट्रवाद के पुरोधा बन कर जो दो काम अटल व आडवाणी ने किये उससे आज भी देश स्तब्ध है। राजग गठबंधन में सत्तासीन होते ही अटल आडवाणी की सरकार ने भाषा के लिए अब तक दो किये दो महत्वपूर्ण कार्य पहला -संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी बोल कर,भारत में हिन्दी की जडों को काटने का काम करना तथा दूसरा -भाषा आंदोलन को कुचलने जैसे जघन्य कार्य करा प्रमुख है। श्री चैहान ने कहा कि सत्तासीन होते ही अटल व आडवाणी की सरकार को भारतीय भाषाओं में नहीं अपितु अंग्रेजी में ही इंडिया इज राइजिंग नाउ और साइनिंग नाउ का खुमार चढ़ा हुआ था। इसी सत्तामद में चूर हो कर भारतीय भाषाओं के ऐतिहासिक आंदोलन को कुचलने का निकृष्ठ काम करके अटल-आडवाने ने राष्ट्र के साथ अक्षम्य अपराध किया और यही कृत्य उनकी वर्तमान दुर्दशा व शर्मनाक पतन का प्रमुख कारण है।

अपने इस रहस्य को खुद ही खोलते हुए भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान ने कहा कि भाजपा के शीर्ष नेता अटल व लालकृष्ण आडवाणी दोनों ने जिस शर्मनाक ढ़ग से राजग शासनकाल में सत्तासीन होते ही 1988 से संघ लोकसेवा आयोग के द्वार पर 14 साल से चल रहे भारतीय भाषाओं के उस आंदोलन को रौंदने का काम किया, जिसमें खुद अटल बिहारी वाजपेयी व लालकृष्ण आडवाणी समर्थक बन कर प्रमुखता से इसमें सम्मलित हुए थे और संसद से लेकर सड़क में इस आंदोलन का खुला समर्थन करते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी व उप प्रधानमंत्री -गृहमंत्री बनने के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने देश से अंग्रेजी की गुलामी को दूर करते हुए पूरे तंत्र में हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं को स्थापित करने के बजाय सन्2002 में भारतीय भाषाओं के आंदोलन को ही सत्तामद में चूर हो कर पुलिसिया दमन से उखाड़ फेंकने का शर्मनाक कृत्य किया। इस पर भारतीय भाषा आांदोलनकारियों ने जब संघ लोक सेवा आयोग के द्वार के समीप ही धरना दिया तो इसमें सम्मलित पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी से जब उनके इस आंदोलन में भाग लेने की याद दिलाते हुए इस धरना स्थल को पुलिसिया दमन से तबाह करने पर प्रश्न किया तो वाजपेयी निरूत्तर हो गये। यह अलग बात है कि स्वयं विश्वनाथ प्रताप सिंह भी प्रधानमंत्री बनने से पहले इस आंदोलन स्थल में इस आंदोलन मे बेठे थे परन्तु प्रधानमंत्री होने पर वे भी इस मामले को नजरांदाज कर गये। भाषा आंदोलन के लिए संसद से लेकर सडक तक ऐतिहासिक संघर्ष करने वाले भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान ने बेहद दुखी मन से कहा कि कि संघ लोकसेवा आयोग के द्वार पर 1988 से 2002 तक चलने वाला आंदोलन यह सामान्य धरना या आंदोलन स्थल नहीं था। यह देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने का एक जीवंत तपस्थली रही। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह के संरक्षण में चले इस आंदोलन में यहां पर स्वयं वाजपेयी व आडवाणी ही नहीं अपितु पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह, वीपीसिंह, देवीलाल, चतुरानन्द मिश्रा, पासवान,मदन लाल खुराना सहित 40 से अधिक सांसद व कई पूर्व राज्यपाल, साहित्यकार, समाजसेवी, सक्रिय रूप से भाग लेेते थे। यही नहीं यहां पर देश के अग्रणी सम्पादकों ने भी भी इस आंदोलन के समर्थन में यहां पर धरने में बेठे थे। यह धरना आजादी के बाद सभी वरिष्ट राजनेताओं, वरिष्ठ पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों के लिए देश से अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने का प्रेरणा ज्योति बन चूका था। राष्ट्रवाद के इस प्रखर आंदोलन की मांग को स्वीकार करने के बजाय अटल व आडवाणी ने सत्तामद में चूर हो कर 2002 में तपस्थली को पुलिसिया दमन से रौंदवा कर राष्ट्र की लोकशाही, स्वाभिमान व मूल्यों पर अक्षम्य कुठाराघात किया।
भाषा आंदोलन के पुरोधा चैहान के तर्को में मुझे सच्चाई नजर आयी। क्योंकि जिस भारतीय संस्कृति के स्वयं भू ध्वजवाहक होने का दम्भ संघ पोषित भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता अटल व आडवाणी सत्तासीन होने से पहले सड़कों से लेकर संसद में करते थे, उसी भारतीय संस्कृति की संवाहिका हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को देश के शासन प्रशासन तंत्र में स्थान दिलाने के लिए 1988 से संघ लोकसेवा आयोग पर चलाये ऐतिहासिक आंदोलन को पूरी तरह से तबाह कर दिया था।
हालांकि मेरे मन में डेढ़ दशक पहले ही इनकी पदलोलुप छवि बेनकाब हो चूकी थी। मुझे भाषा आंदोलन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान के कथन पर सच्चाई नजर आयी। वेसे मेरे मन में पहले से थाा कि अटल व आडवाणी की जो वर्तमान दयनीय हालत है उसके लिए भगवान राम व गो द्रोह के साथ साथ कश्मीर व आतंकी पाक पर अपने राष्ट्र को दिये गये वचनों को रौंदना प्रमुख है। यही नहीं संसद हमला, कंधार, कारगिल व एफबीआई प्रकरण का दंश देश के विश्वास पर कुठाराघात करते रहे। जिस प्रकार से भारत के वाल्कों सहित नवरत्न उद्यमों को औने पौने दामों पर निजी क्षेत्र के हाथों में सौंपने, ताबूत घोटाला, बंगारू घूस प्रकरण व रक्षा मंत्री को अमेरिका द्वारा अपमानित करने वाले शार्मनाक प्रकरण पर अटल आडवाणी का शर्मनाक मौन रखने से भी जनता के विश्वास को अटल व आडवाणी की राजग सरकर के कृत्यों ने पूरी तरह से हिला दिया।
श्री चैहान के इस कथन में सत प्रतिशत सच्चाई है। हालांकि अटल व आडवाणी के नेतृत्व में दोनों ने जमीनी राष्ट्र समर्पित बलराज माधोक, गोविन्दाचार्य, कल्याणसिंह, उमा भारती, मदन लाल खुराना जैसे दिग्गज जननेताओं को अपनी पदलोलुपता व संकीर्ण स्वार्थ के लिए हाशिये में धकेलने तथा सुषमा, जेटली, अनन्त, नायडू, जैसे नेताओं को पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर थोप कर जनता से पार्टीी को दूर कराने का काम किया। वहीं आडवाणी ने भारत विभाजन के दोषी जिन्ना की स्तुति कर अपनी अवसरवादिता को खुद ही बेनकाब किया। कुल मिला कर भाजपा को भी कांग्रेस की तरह ही देश की जनता की आशाओं में वज्रपात करने का गुनाहगार बनाया तो अटल आडवाणी ने अपने शासनकाल में।
इस प्रकरण पर मुझे याद आते हैं महान रहस्यमयी शक्तियों के स्वामी काला बाबा का कथन कि काल की लाठी में कभी आवाज नहीं होती और काल कभी लाठी उठा कर किसी को मारने नहीं आता। गौरतलब है कि कभी इंदिरा, अटल, वीपी व नरसिंह राव जिन काला बाबा के दर पर उनके आशीर्वाद लेते थे और जो अपनी रहस्मय विलक्षण शक्तियों से देश के हुक्मरानों व आम जनमानस को अचम्भित करने वाले काला बाबा के कथन व उनका दिव्य चेहरा मुझे बार-बार अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने की नयी ऊर्जा व शक्ति प्रदान करता है।

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