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Tuesday, June 4, 2013


मनमोहन जैसे जनता से कटे नेताओं के हाथों सरकार व संगठन की कमान सौंपने से देश व कांग्रेस की हो रही है दुर्दशा


कब टूटेगी सोनिया गांधी की कुम्भकर्णी नींद


आज देश में आम जनता मनमोहन सरकार के कुशासन से खून के आंसू बहा रहा है। मंहगाई, आतंकवाद व भ्रष्टाचार ने आम आदमी का जीना दूश्वार कर रखा है। कांग्रेस से तेलंगाना क्षेत्र के कांग्रेसी सांसद इस्तीफा दे चूके हैं। परन्तु कांग्रेस आलाकमान की कुम्भकर्णी नींद टूटने का नाम नहीं ले रही है। देश की आजादी के 65 साल बाद अधिकांश सालों तक देश में राज करने वाली कांग्रेस पार्टी ने अपने कृत्यों से अपनी दुर्दशा तो कर ही ली परन्तु इस देश को भी बेहद कमजोर बना कर रख दिया है। चीन न केवल हमारे स्वाभिमान व अखण्डता को सीमा पर कब्जा करके आये दिन रौंद रहा है वहीं अपने उत्पादों से भारत के बाजार पर कब्जा करके देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ समझी जाने वाले भारतीय उद्योग जगत को भी मरणासन कर दिया है। नक्सली 200 के करीब जिलों में पांव पसार चूके है। अमेरिका की सह पर पाकिस्तान भारत को आतंक से तबाह कर रहा है। परन्तु कांग्रे्रस पार्टी की प्रमुख सोनिया गांधी मनमोहन सिंह व उनकी सरकार को देश के हित में काम करा पा रही है व नहीं वह कांग्रेस पार्टी के हित में ही काम करा पा रही है। इसका मुख्य कारण है देश व कांग्रेस संगठन की कमान आज ऐसे नेताओं के हाथों में है जिनका राजनैतिक कार्यकत्र्ता बनने का एक साल का भी अनुभव नहीं है। नेताओं की कृपा से सरकार व संगठन के सर्वेसर्वा बने लोगों की अक्षमता से देश व कांग्रेस संगठन को भी भुकतना पड रहा है।
जनता से कटे हुए नेताओं को देश की हुकुमत देने व उनको अपना सलाहकार बनाने से  किस प्रकार बडे से बडे देश व दल भी बेहद कमजोर हो जाते है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है मनमोहन सिंह को कांग्रेस आला कमान द्वारा देश का प्रधानमंत्री बनाना व जनता से कटे हुए निहित स्वार्थी लोगों को कांग्रेस पार्टी का मुख्य सलाहकार व संगठन में महत्वपूर्ण स्थानों में आसीन करना। आज कांग्रेस पार्टी की दुर्गति के साथ साथ देश की भी जो दुर्गति हो रही है उसका एक ही कारण है कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी द्वारा देश व सरकार के साथ साथ कांग्रेस पार्टी की कमान ऐसे लोगों को सोंपना जिनका जनता के सरोकारों व जनसेवा का कहीं दूर दूर तक अनुभव नहीं है। आज कांग्रेस पार्टी की सरकार में प्रधानमंत्र.ी मनमोहन सिंह जो विगत 9 सालों से देश के प्रधानमंत्री के रूप में कांग्रेस प्रमुखा ने थोपे रखे है उनमें इतना नैतिक साहस भी नहीं है कि लोकशाही का सम्मान करते हुए देश के किसी भी एक संसदीय सीट से जनादेश ले कर सर्वोच्च सदन का सदस्य बने। यही हाल कांग्रेस की इस सरकार का है अधिकांश बडे मंत्रालय में वे प्यादों  को बडे मंत्रालय दिये गये है जो जन सेवा से नहीं अपितु नेताओं के कंधों पर चढ़ कर यकायक नेता बन गये। मोंटेक सिंह आलुवालिया हो या कपिल सिब्बल या अन्य बडे मंत्रालयों के मंत्री मनमोहन की तरह कभी राजनैतिक कार्यकत्र्ता बन कर जनसेवा का इनका कहीं दूर दूर तक का सम्बंध तक नहीं रहा।
ऐसा ही शर्मनाक हालत कांग्रेस संगठन की भी है। कांग्रेस संगठन में आज सर्वशक्तिमान बने अहमद पटेल हो या जर्नादन द्विवेदी या वी जार्ज आदि इनका जनता से कहीं दूर दूर तक सरोकार न पहले था व नहीं अब है। आज हालत यह हो गयी है कि न तो कांग्रेस आलाकमान के आंख नाक व दिमाग बने सरकार व संगठन के ये लोग न तो उनका देश व आम जनता की सही तस्वीर बता सकते है व नहीं सही सलाह दे सकते है। उनका एक ही काम है अपने निहित स्वार्थ के हितों के लिए सरकार व संगठन का दोहन। इसी कारण आज जहां देश में मंहगाई, भ्रष्टाचार, आतंकबाद आदि से देश की जनता का जीना दूश्वार हो रखा है वहीं कांग्रेस के आम कार्यकत्र्ता क्या सांसद तक अपनी बात सोनिया गांधी तक नहीं रख सकता है। इसी कारण आज तेलांगना के कांग्रेसी सांसदों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस अपना वायदा करके अपने हित में काम करने के लिए तैयार नहीं तो वह जनहित या राष्ट्रहित में क्या काम करेगी। आज जनता ही नहीं कांग्रेस पार्टी का आम कार्यकत्र्ता पार्टी के कारनामों से नाखुश है। चारों तरफ जनता से जुडे ईमानदार नेताओं की कहीं सुनवायी नहीं है। समर्पित कार्यकत्र्ता अपने आप को अपमानित महसूस कर रहा है। देश को एक तरफ चीन रौंद रहा है, वहीं पाकिस्तान आतंक से तबाह कर रहा है। परन्तु मनमोहन सरकार ने शर्मनाक चुप्पी साधी है। लोकसभा चुनाव को चंद महिने रह गये अपने गलत निर्णयों से कांग्रेस आज जनता से ही नहीं अपने कार्यकत्र्ताओं से दूर हो गयी है। इसका खमियाजा देश की एकता अखण्डता व स्वाभिमान के साथ विकास को चुकाना पड रहा है।  देश की लोकशाही में राजनैतिक दल एक प्रकार से लोकशाही रूपि गाड़ी के चालक होते हैं। अगर चालक ही दिशाहीन व अनुभवहिन हो तो लोकशाही न तो मजबूत होगी व नहीं देश । लगता है सोनिया की इस कुम्भकर्णी नींद आगामी लोकसभा चुनाव में करारी पराजय के बाद भी टूट पायेगी या नहीं?

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