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Tuesday, June 11, 2013

मेमना बने खुद को टाइगर कहने वाले मुख्यमंत्री बहुगुणा


असंतुष्ट कांग्रेसी विधाययकों , सांसदों व तिवारी के प्रहारो से मुख्मंत्री की कुर्सी खतरे में


देहरादून(प्याउ)। लोकतंत्र में भी खुद को टाइगर कहने वाले उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा इन दिनों अपने ही असंतुष्ट कांग्रेसी विधायकों के खुले आम बगावत के कारण मेमना बनना पड रहा है। इन दिनों न केवल अपने ही दल के असंतुष्ट विधायकों से बुरी तरह से घिर गये हैं अपितु अपने सरपरस्त रहे कांग्रेस दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी के वक्रदृष्टि के दंश झेल रहे है। कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी व दिल्ली में अपने कांग्रेसी मठाधीश बने आकाओं से मिले अभयदान के बाबजूद उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की कुर्सी पर खतरा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। लोकशाही में जनसेवक समझे जाने वाले जनप्रतिनिधी द्वारा खुद को टाइगर बताने से साफ हो गया कि उनको न तो लोकशाही से कोई लेना देना नहीं है व नहीं उनके दिलो दिमाग में लोकशाही के प्रति कोई सम्मान ही है। मुख्यमंत्री के टाइगरी तैवरों का माकूल प्रत्युत्तर देते हुए कांग्रसी दिग्गज व केन्द्रीय हरीश रावत ने खुद को हिरन बता कर खुद को जनहितों के लिए प्रदेश सरकार से गुहार लगा रहे पिथौरागढ़ के विधायक हरीश धामी, अल्मोड़ा के विधायक मनोज तिवारी, गंगोलीहाट के विधायक नारायण राम आर्य, कनालीछीना के विधायक मयूख महर व खटीमा के विधायक हेमेश खर्कवाल का खुला समर्थन करके मुख्यमंत्री के जहां पसीने छूडा दिये हैं वहीं टाइगरी पदवी को बौना बना दिया। वहीं कांग्रेस के तेज तरार सांसद प्रदीप टम्टा ने भी मुख्यमंत्री के टाइगरी प्रवृति को ही मुख्यमंत्री के साथ असंतुष्ट विधायकों 10 जून को सचिवालय में होने वाली बैठक न होने का जिम्मेदार बताया। इस टाइगरी पदवी से एक बात साफ हो गयी है कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को न तो प्रदेश की जनभावनाओं का पता है व नहीं यहां के लोगों की प्रवृति का। उत्तराखण्ड की जनता, आम जनमानस के लिए खुद को समर्पित करने वाले नेता को स्वीकार कर सकती है परन्तु खुद को बडा बता कर जनभावनाओं को रौंदने वालों को तुरंत जमीन सुंघाती है। यही नहीं प्रदेश की जनभावनाओं का जरा भी मुख्यमंत्री को भान होता तो वे कभी भी खुद को टाइगर नहीं कहते क्योंकि उत्तराखण्ड की जनता टाइगर से बेहद नापसंद करती है। यहां मनखी बाघ का चारों तरफ आतंक है। वह उनके हितों पर हमेशा बज्रपात करने का पर्याय ही समझा जाता है।
अपनी कुर्सी को बचाने के लिए अपने असंतुष्ट विधायकों को मनाने के लिए मुख्यमंत्री ने 10 जून को देहरादून सचिवालय में जो बैठक रखी थी उसका विधायकों ने मुख्यमंत्री की इसी प्रवृति से ठुकरा दी हैं। इससे पहले सभी असंतुष्ट विधायक जनपद पिथौरागढ़ और चपांवत के प्रभारी मंत्री दिनेश अग्रवाल से वार्ता कर चूके थे। ऐसा नहीं कि केवल ये चार ही विधायक असंतुष्ट है। असंतुष्ट के स्वर जहां टिहरी के विधायक दिनेश धन्नै व शैला रानी रावत के भी यदाकदा सुनाई दे रहे है। इसी को भांपते हुए मुख्यमंत्री ने अन्य विधायकों को हर प्रकार से मना रहे है। वहीं वे विधानसभा चुनाव में हारे हुए कांग्रेसी प्रत्याशियों को भी रिझा रहे है। परन्तु मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की मुश्किल कम होने का नाम ही नहीं ले रही है।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री को पदासीन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तिवारी भी इन दिनों विजय बहुगुणा से बेहद खपा है। उनके गुस्से का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तिवारी को मिलने विगत महिने लखनऊ व दिल्ली में आये विजय बहुगुणा से मिलने से तिवारी ने साफ मना कर दिया। यही नहीं उन्होंने सोनिया गांधी से भी मुख्यमंत्री बहुगुणा की खुली शिकायतें की तथा निकाय चुनाव में मिली असफलता के बाद तिवारी ने सार्वजनिक रूप से उनको मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की मांग भी कर दी। सुत्रों के अनुसार इन दिनों तिवारी अपने घोर विरोधी रहे हरीश रावत व उनके हनुमान समझे जाने वाले सांसद प्रदीप टम्टा से निकटता बन चूकी है। गत सप्ताह जून को सायं उत्तराखण्ड सरकार की सबसे ताकतवर कबीना मंत्री इंदिरा हृदेश से उत्तराखण्ड निवास में हुई मंत्रणा से कांग्रेसी रणनीतिकारों के कान खडे हो गये है। सुत्रों के अनुसार तिवारी कांग्रेस को तो सबक सिखाना ही चाहता है इसके साथ साथ वह विजय बहुगुणा को भी पद से हटाने के लिए अपने दाव इन दिनों चल रहे है।
एक तरफ मनमोहन सरकार के खिलाफ जनता के अंदर भारी आक्रोश है वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस में भारी गुटबाजी। इन दोनों समस्याओं से उबरने के लिए कांग्रेसी मठाधीश सर खपा ही रहे है कि उपर से कांग्रेस के दिग्गज नेता नारायणदत्त तिवारी ने प्रदेश कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को असफल बता कर उनसे इस्तीफा मांग कर न केवल उत्तराखण्ड की राजनीतिज्ञों में हडकंप मचा दिया है अपितु कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व को भी झकझोर कर रख दिया है। कुल मिला कर आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सुफडा प्रदेश से साफ होना निश्चित है। इसकी नींव अगर कोई लिख रहा है तो वह विजय बहुगुणा नहीं अपितु  टिहरी उपचुनाव व निकाय चुनाव में पूरी तरह असफल हुए जनता की नजरों से उतर चूके मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को बनाये रखने की आत्मघाति हटघर्मिता करने वाले कांग्रेस की आलाकमान व दिल्ली में वे कांग्रेसी मठाधीश । देखना यह है कि कांग्रेस न केवल उत्तराखण्ड की 5 लोकसभा सीटों से हाथ धोयेगी अपितु देश की 35 उत्तराखण्डी प्रभावित लोकसभा सीटों से भी हाथ धोने का काम करेगी। 

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