केवल अज्ञानी व स्वार्थी आदमी ही झूठ बोलता व दूसरे का अहित करता है : देवसिंह रावत 


क्या आदमी खुद अपने आप से झूठ बोल सकता है? नहीं कभी नहीं। तो वह केवल देह दृष्टि से अलग प्रतीत हो रहे स्व आत्म स्वरूप से झूठ क्यों बोले ?
जीवन में कभी असत्य नहीं बोलना चाहिए। आखिर असत्य किससे? और क्यों ? जो लोग अज्ञानी होते है, वे ही जीवन में झूठ बोल कर अपना अहं तुष्ट करते है और दूसरों को अंधेरे में रखते हैं या हानि पंहुचाते है। परन्तु जो लोग जानते हैं कि भगवान इस सृष्टि के कण -कण में विद्यमान है । हर चर-अचर, जीव जन्तु, में विद्यमान है। फिर परमात्मा स्वरूपि किसी देह से झूठ क्यों? हम अपनी अज्ञानता से या स्वार्थवश झूठ बोल कर अपने पांवों पर ही कुल्हाडी मारते है। अपनी की शक्ति का क्षरण करते है। अपने सतकर्मो का ह्रास करते है। परमात्मा सर्वव्यापी है, सबमें है। हम सब एक ही परमात्मा के श्री स्वरूप है फिर झूठ, फरेब, राग द्वेष व हिंसा क्यों? किससे?
भगवान श्रीकृष्ण ने इसी लिए कहा कि ‘नासते विद्यते भावो, नाभावो विद्यते सत’ यानी असत् की कभी अस्तित्व नहीं होती और सत्य तीनो कालों में विद्यमान होता है।

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