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Thursday, February 21, 2013


अब रामदेव की तरह चुनौती को स्वीकार करना भी सीखें अरविन्द केजरीवाल 


केजरीवाल जी, पलायनवादी नेतृत्व को कभी स्वीकार नहीं करता है भारतीय जनमानस 

खबरिया चैनलों व मीडिया की अंध व्यवसायिकता कहां ले जायेगी भारतीय लोकशाही को 



21 फरवरी को जंतर मंतर पर इंडिया न्यूज चैनल द्वारा आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल से होने वाली बहस अरविन्द केजरीवाल के न पंहुचने पूरी नहीं हो पायी।  हालांकि इस सीधे प्रसारण में कई  समर्थकों ने दीपक चैरसिया का प्रखर विरोध किया। इस खुली बहस की चुनौती  अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास व संजय सिंह से हुई इंडिया न्यूज के दीपक चैरसिया से हुई अलग अलग तीखी बहस के बाद चुनौती के रूप में निश्चित किया गया था। अरविन्द केजरीवाल के न आने से यह कार्यक्रम चला पर इसके लिए उत्सुक लोगों को निराशा ही हाथ लगी। गौरतलब है कि इंडिया न्यूज टीबी चैनल पर विगत कई दिनों से अन्ना को मोहरा बना कर व्यवस्था से आक्रोशित जनभावनाओं की आड में अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के लिए दुरप्रयोग किया। आम लोगों को विश्वास था का अरविन्द केजरीवाल इस सीधी बहस की चुनौती को स्वीकार करके अपने पर लगे तमाम आरोपों का बहादूरी से मुकाबला करेंगे। परन्तु अरविन्द के न आने से इस मामले पर लगा प्रश्न और गहरे हो गये। हालांकि कई लोग इसको दिल्ली में अरविन्द की पार्टी के बढ़ते हुए जनाधार से परेशान कांग्रेस व भाजपा की आड में केजरीवाल की पार्टी को बदनाम करने का सांझा षडयंत्र करार दे रहे हैं, तो कई लोग इसको इंडिया न्यूज व केजरीवाल दोनों का अंदरखाने के प्रचार का छदम युद्ध बता रहे है। सच्चाई क्या है यह तो दीपक चैरसिया ही जाने परन्तु जनता में इन दिनों फिर केजरीवाल व इडिया टीबी पर लोगों का ध्यान केन्द्रीत हो गया है। प्रचार की दुनिया के विशेषज्ञ इसे प्रचार का हथकण्डा भी मान रहे है। आज की दुनिया में लोग इस धारणा में भी विश्वास करते हैं बदनाम हुए तो क्या हुआ प्रचार तो हुआ। एक कांग्रेसी नेता जो किसी महिला के यौन शोषण के आरोप से बरी हुए। उन पर भी मीडिया ने काफी प्रहार किये, उनका मामला पूरे देश में गूंजा। एक बार जब वे मिले तो अपने कमरे में बता रहे थे कि भाई मैं मंत्री रहा अध्यक्ष रहा पर मुझे देश भर में इतनी पहचान नहीं मिली जितनी पहचान मुझे इस प्रकरण के बाद मिली। अधिकांश प्रबुद्ध लोग जान गये कि मै कौन हॅू और मुझे झूठा फंसाया जा रहा था।
अरविन्द केजरीवाल व उनकी आम आदमी पार्टी पर जो आरोप इन दिनों लग रहे हैं उसके पीछे लोगों को कांग्रेस व भाजपा सहित तमाम उन दलों का भी हाथ लग रहा है जो केजरीवाल के आरोपों व उसकी पार्टी के अंदर ही अंदर हो रहे विस्तार से भयभीत हैं। नहीं तो इंडिया टीबी जैसे चैनल को इस प्रकरण के एक साल गुजरने के बाद यकायक आज कल दीपक चैरसिया द्वारा इंडिया टीबी की कमान संभालने के बाद ही क्यों याद आया? यह शायद इस चैलन द्वारा अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का भी एक हथकण्डा भी हो । हालांकि अण्णा के जनांदोलन में उमड़े हुए लोगो के दिलों में भी यह सवाल कचैट रहा है क्यों अण्णा व अरविन्द की राहें अलग अलग हुई। अधिकांश लोग आज भी अण्णा के साथ हैं वे अरविन्द से खपा भी हैं पर फिर भी अरविन्द को अण्णा का कुशल सेनापति
भी मानते है। हालांकि उत्तराखण्ड के कमजोर लोकायुक्त को मजबूत बता कर अण्णा व देश को गुमराह करने के प्रकरण, आंतरिक लोकपाल बना कर अपने साथी प्रशांत भूषण आदि साथियों पर लग रहे आरोपों की अभी तक जांच नहीं करा पाने, एक मुद्दे को उठा कर उसको मुकाम पर पंहुचाने से पहले ही उसे छोड़ दूसरा मुद्दा उठाने की प्रवृति व अपने की वचनों पर खरा न उतरने व अपने संगठन में पारदर्शिता खुद न अपनाने के कारण आंदोलन के साथी ही नही उनकी तरफ आशा भरी नजरों से अरविन्द केजरीवाल को देखने वाले जनमानस को भी निराशा ही हाथ लगी। जहां तक टीबी चैनलों व मीडिया वालों का उन पर व्यवसायिकता के भूत उनके सर कितना चढ़ा होता है। नहीं तो देश में वर्तमान राजैतिक दलों के कुशासन में भ्रष्टाचार, मंहगाई, आतंकबाद व अराजकता आदि गंभीर विषयों को छोड़ कर गडे हुए मुर्दे उखाडने की मीडिया की प्रवृति अंधी व्यवसायिकता का पागलपन नहीं तो और क्या है?
यह इस छदम् प्रकरण से जग जाहिर हो गया। इसके बाबजूद भारतीय जनमानस के मन में एक ठीस है कि अरविन्द केजरीवाल ने दीपक चैरसिया की जंतर मंतर पर बहस करने की खुली चुनौती स्वीकार करनी चाहिए थी। वहां पर आंदोलनकारी जनता भी उनका साथ देने के लिए बैताब थी। भारतीय जनमानस चुनौती को स्वीकार करने वाले को ही महानायक के रूप में स्वीकार करती है। बाबा रामदेव का रामलीला मैदान से हजारों की जनता को छोड कर चुपचाप जाते हुए पुलिस द्वारा पकडे  जाने को लोगों ने स्वीकार नहीं किया। जनता चाहती कि बाबा रामदेव पुलिसिया दमन के आगे जनता को असहास छोड कर खुद को निकलने के बजाय पुलिस को उनको गिरफतार करने की चुनौती दे कर गिरफतारी देते। इस प्रकरण से जहां पूरे भारत में कांग्रेस की थू थू हुई थी वहीं जनता बाबा रामदेव के बच कर निकलने के प्रकरण से नाराज थी। अपनी इसी भूल को  बाबा ने उसके बाद के प्रदर्शनों में सुधारा जिसको जनता ने खुले दिल से सराहा। इस तरह अरविन्द को भी अपनी भूलें सुधार कर वर्तमान राजनैतिक दलों के चंगैजशाही से देश को बचाने के लिए आगे आ कर हर चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए। तभी देश की जनता उनका साथ देगी।

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