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Wednesday, February 6, 2013


बलात्कारी अपराधियों से अधिक गुनाहगार इस देश को अराजकता की तरफ धकेलने वाले हुक्मरान 


बलात्कारियों व हुक्मरानों ने किया विश्व में भारत को कलंकित

कठोर कानूनों के साथ नैतिक मूल्यों युक्त शिक्षा व नेतृत्व से लग सकेगा अंध उपभोगवादी अराजक माहौल पर अंकुश

भारत में एक तरफ बलात्कारों की बाढ़ सी आ रही है वहीं भारत के हुक्मरान इस विभत्स प्रकरण पर शर्मनाक मौन रखे हुए है।
6 फरवरी को जैसे ही भारत की राजधानी दिल्ली में चीन की एक लडकी के साथ बलात्कार का मामला होजखास थाने में दर्ज हुआ पूरा विश्व भौंचंक्का रह गया कि आखिर हिन्दुस्तान के नाम से भी जाना जाने वाला भारत क्यों बलात्कारस्तान बन गया है। 6 फरवरी को जब मैं जंतर मंतर पर दामिनी को न्याय दो आंदोलन से जुडी एक आंदोलनकारी लडकी जो सर पर 16 दिसम्बर क्रांति का काला पट्टा बांधे हुए थी वह हाथ में एक पोस्टर ले कर प्रदर्शन कर रही थी। जिसमें लिखा था कि ‘हिन्दुस्तान नहीं यह रेपिस्तान है’ । उस समय मै  इस पोस्टर को मन से स्वीकार नहीं कर पाया। परन्तु निरंतर बढ़ रही इस घटना से मुझे भी ऐसा लगा कि इन अपराधियों व देश के नपुंसक बने हुक्मरानों ने कठोर कानून न बना कर तथा कानून व्यवस्था को कारगर न बना कर देश के गौरवशाली इतिहास को कलंकित करने का काम कर रहे है। यहां पर गंदे नाटक, फिल्म व विज्ञापन दिखा कर तथा प्रकाशित कर देश के समाचार पत्र, टीबी चैनल व फिल्मी जगत लोगों को कामूकता की अंधी खाई में धकेल रहे है। इस पर अंकुश लगाने के लिए न तो देश में प्राचीन भारतीय मूल्यों वाली संस्कारित शिक्षा व नहीं देश में नैतिक मूल्यों वाला नेतृत्व ही है। शिक्षा व्यवस्था ही नहीं पूरा समाज आज अंधे उपभोगवादि व्यवस्था के शिकंजे में फंस कर इस प्रकार के कलंकित वातावरण को पैदा कर रहा है। राजनीति के अपराधीकरण के कारण व भ्रष्ट नेतृत्व के कारण देश में कानून व्यवस्था का न तो अपराधियों में खोप ही रहा व नहीं देश की जनता का इस पर अब विश्वास ही रहा। इस व्यवस्था का अदना से उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति जब इस चंगैजी व्यवस्था का पोषक आम आदमी देखता है तो वह अनजाने ही इस अंधी दोड में सम्मलित हो रहा है। इससे इस देश में अबोध बालिकाओं से लेकर 70 साल की बुजुर्ग महिलाओं के साथ भी इस प्रकार के दुराचार हो रहे है। अगर मुजफरनगर काण्ड-94 के अभियुक्तों को सजा देने में देश की सर्वोच्च न्यायालय व हुक्मरान सीबीआई व इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फेसले का सम्मान करते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए इस काण्ड के अभियुक्त पुलिस प्रशासन के उच्चाधिकारी भैडियों को कड़ी सजा देते तो अपराधियों में कानून का भय होता। परन्तु भारतीय संस्कृति को शर्मसार करने वाले मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को देश की सरकारें या उच्च न्यायालय सजा देने के बजाय इस काण्ड के समय सत्तासीन रही सपा, बसपा, कांग्रेस ही नहीं भाजपा सहित तमाम राजनैतिक दलों की शर्मनाक मौन से इस काण्ड के दोषियों को उप्र व केन्द्र में उच्च पदों पर पद्दोन्नतियां दी गयी। जो ऐतिहासिक फेसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मुजफरनगर काण्ड पर दिया था और जो सराहनीय कार्य सीबीआई ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर पुलिस प्रशासन के अपराधियों को कटघरे में रखा था अगर उस पर ही 18 साल बीतने के बाद की कोई सरकार भी अमल करती तो आज यह हालत नहीं होती। परन्तु उप्र ही नहीं उत्तराखण्ड की इन 12 सालों की सरकारे व मुख्यमंत्री रहे मुलायम, माया, राजनाथ, तिवारी, खण्डूडी, निशंक व बहुगुणा जैसे सत्तालोलुपु लोगों के कारण आज ये अपराधी खुले छूट कर देश के कानून व्यवस्था का उपहास उडा रहे हैं।
 चीन की लडकी से हुए इस काण्ड के बलात्कारी को भले ही पुलिस ने दबोच लिया है परन्तु भारत की छवि पूरे विश्व में 16 दिसम्बर को देश की राजधानी दिल्ली में 23 वर्षीया छात्रा के साथ हुए सामुहिक बलात्कार से दागदार हुई थी, अब इसके दो माह अंदर निरंतर हो रहे बलात्कार की घटनाओं के बाद विदेशी लडकी के साथ हुए बलात्कार की घटना ने पूरे विश्व के लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि भारत की सरकार आखिर कर क्या रही है। क्यों सरकार कडे से कडे कदम उठा कर इस प्रवृति को जमीदोज कर रही है। कई देशों से अपने भारत जाने वाले नागरिकों को यहां पर सावधानी बरतने की हिदायत तक जारी कर दी है।
दामिनी प्रकरण से जो जनाक्रोश पूरे देश में उमडा था उसके बाद भी  इसके दोषियों को सजा देने में देश के हुक्मरान कितने अनमने ढंग से काम कर रहे है। कभी अपराधी को उम्र की ढाल तो कभी मानवाधिकार वाली ढाल का प्रयोग करके देश की जनता का आक्रोश बढा रहे है।  अगर यहां कानून व्यवस्था कडी होती तो 6 फरवरी को रेप के लिए कुख्यात  हो चूके हौजखास इलाके में 23 साल की चीन की लड़की के साथ पार्टी ऑर्गेनाइजर तारिक शेख करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता व नहीं   दिल्ली में 4 फरवरी को लाजपत नगर के समीप जलविहार में एक 24 वर्षीय युवती से बलात्कार की कोशिश करने में नकाम रहने पर अपराधी ने उसके गले में लोहे की राड ही डाल कर गंभीर रूप से घायल करने की हिम्मत ही जुटाता।  3 फरवरी को उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर जिले के काशीपुर में 20 साल की एक युवती को उसके मकान मालिक के बेटे व उसके दो साथियों ने धोखे से नशीला पदार्थ खिलाकर तीन युवकों द्वारा गैंग रेप किया।
यही नहीं 26 जनवरी की परेड़ में सम्मलित होने आये पूर्वोत्तर की छात्राओं से जिस प्रकार से संपर्क क्रांति एक्सप्रेस से गुवाहाटी जाते समय सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) जवानों पर छेड़छाड़ किया। इन 9 आरोपी जवानों को मुगलसराय स्टेशन पर गिरफ्तार किया गया। यही नहीं केवल आम युवक या सामान्य लोग ही इस मामले में जिम्मेदार है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी यानी आईएएस शशिभूषण जो उप्र सरकार के विशेष सचिव (तकनीकी शिक्षा) पर पर आसीन थे उन्होंने अक्टूबर 2012 में  गाजियाबाद से लखनऊ समय लखनऊ मेल में सफर कर रही एक युवती से साथ दुष्कर्म की कोशिश जिसको रेल में सुरक्षा बल ने पकडा उसके बाद उसे े जेल भेजा गया।  यही नहीं नवम्बर 2012 में भिवानी से कानपुर जाने वाली कालिंदी एक्सप्रेस ट्रेन के एसी कोच में कानपुर के सेशन जज की पुत्री अपने पति के साथ कानपुर जा रही थी। उसके साथ शिकोहाबाद व मैनपुरी के बीच फतेहगढ़ के मेजर एसडी सिंह मेडिकल काजेल के प्रोफेसर डॉ. जय किशन ने छेड़छाड़ करने के आरोप में फर्रूखाबाद जीआपी थाने में मामला दर्ज किया गया। ऐसे मामले में नेता से लेकर बडे अधिकारी लिप्त होने की खबरे आये दिन समाचार पत्रों में प्रकाशित होने पर भारत में कानून व्यवस्था की स्थिति जगजाहिर हो जाती है। दामिनी जैसा विभत्स मामला राजस्थान मे एक लडकी के साथ हुआ बलात्कार का मामला भी समाज में पनप रहे राक्षसों के चेहरों को ही बेनकाब करता है। भारतीय संस्कृति को ही नहीं  अपितु स्वतंत्र भारत की पूरी व्यवस्था को कटघरे में खडे करके बेनकाब करने वाले 1 अक्टूबर 1994 की रात को घटित हुआ मुजफरनगर काण्ड जिसमें दर्जनों महिलाओं के साथ उप्र के पुलिस प्रशासन के भैडियों ने किया। ये महिलायें हजारों आंदोलनकारियों के साथ गांधी जयंती के दिन दिल्ली के लाल किले में ‘उत्तराखण्ड राज्य गठन रेली में भाग लेने आ रही थी। इस कांड के दोषियों को सीबीआई ने ही नहीं अपितु इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी दोषी ठहराया परन्तु आज 18 साल गुजर जाने के बाद भी इस काण्ड के अपराधियों को सजा देने में देश की व्यवस्था असफल रहती है। इसके विरोध में व्यवस्था को धिक्कारने के लिए उत्तराखण्डी आंदंोलनकारी हर साल संसद की चैखट पर 2 अक्टूबर को काला दिवस रूपि धरना दे कर राष्ट्रपति को ज्ञापन देते है। यह सामान्य कानून व्यवस्था का मामला नहीं अपितु यह देश की पूरी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न चिन्ह है। जब तक नैतिक मूल्यों वाली शिक्षा, संस्कार के साथ नैतिक मूल्यों वाली व्यवस्था नहीं होगी तब तक ऐसे कुव्यवस्था को पटरी पर नहीं लौटाया जा सकता। जरूरत है संसद का विशेष सत्र बुला कर इस पर गंभीर रास्ता खोजने  की। नहीं तो देश को नहीं बचाया जा सकता। यह केवल कानून व्यवस्था  का प्रश्न नहीं अपितु यहां पूरी व्यवस्था दम तोड रही है। इसके लिए बलात्कारी अपराधियों से अधिक गुनाहगार इस देश को अराजकता की तरफ धकेलने वाले हुक्मरान है।

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