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Sunday, February 3, 2013


पुत्रदान नहीं तो कन्यादान क्यों?


शादी के समय लडकी का कन्यादान ही क्यों? लडके का क्यों पुत्रदान नहीं कहते ?


दामिनी को न्याय दो आंदोलन ने जंतर मंतर पर अनैक पीडि़त महिलाओं ने जलायी संघर्ष की मशाल


एक तरफ केन्द्र सरकार द्वारा महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए बनाये गये कठोर अध्यादेश पर राष्ट्रपति हस्ताक्षर कर रहे थे उसी दिन 3 फरवरी को राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर एक बालिका ने ‘24 दिसम्बर से यहां पर महिलाओं से हो रहे बलात्कार सहित तमाम अत्चाचारों पर अंकुश लगाने चलाये जा रहे ‘16 दिसम्बर क्रांति’ की सभा को संबोधित करते हुए प्रश्न किया कि क्यों लडकी की शादी पर कन्यादान क्यों कहा जाता है जबकि लडके की शादी पर कोई इसे पुत्रदान नहीं कहते? जबकि हमारे शास्त्रों में इसे पाणिग्रहण कहते है। कन्या से जन्म से पहले से मरने तो इस समाज में हो रहे लैंगिक भेदभाव से मुक्त करने का खुला आवाहन करते हुए महिला विरोधी मानसिकता को कटघरे में खडा किया। इस बालिका के इस बेबाक प्रश्न पर से उपस्थित आंदोलनकारी भी हक्के बक्के रह गये?
 जंतर मंतर पर महिलाओं से हो रहे अत्याचार के खिलाफ यहां पर निरंतर पीडि़तायें भी न्याय की आश लिये जंतर मंतर पर न्याय के लिए डेरा डाले हुए हैं। पंजाब से आयी युवती जो चण्डीगढ़ के एसएसपी पर उसका यौन शोषण व उत्पीडन का आरोप लगाते हुए यहां पर कई दिनों तक अनशन रखने के बाद अब धरना दे रही है। पीडि़त युवती का यही मामला चण्डीगढ़  हाई कोर्ट में भी चल रहा है। परन्तु युवती का आरोप है कि पंजाब व चण्डीगढ़ में आरोपी पूरे मामले को पूरी तरह से प्रभावित कर रहा है। तीन सालों से उसको न्याय मिलने के बजाय उसका निरंतर उत्पीड़न हो रहा है।
 इसके अलावा इसी धरना स्थल पर दिल्ली के बेगमपुरी की श्रीमती वीरमती के साथ सामुहिक बलात्कार के दोषियों को सजा देने की मांग को लेकर जंतर मंतर पर फर्रूखाबाद उप्र के निवासी बाबू सिंह व पीडि़ता के पति सूबेसिंह 23 जनवरी से यहां पर निरंतर आमरण अनशन पर बैठे है।
यहीं धरना स्थल जंतर मंतर पर दिल्ली के शालीमार बाग से अपने पडोसी द्वारा लगातार उत्पीड़न से एक पीडि़ता व उसकी बेटी भी न्याय की गुहार लगाने के लिए जंतर मंतर पर कई दिनों से धरना दे रही हैं।
यही नहीं इस आंदोलन में कई युवतियां व महिलायें ही नहीं बुजुर्ग, प्रोफेसर, पत्रकार, चिकित्सक, अधिवक्ता, समाजसेवी सहित सभी वर्ग के लोग समर्पित भाव से इस आंदोलन को मजबूती दे रहे है। वहीं इस आंदोलन में निरंतर यहां पर पूरे जोश व खरोस के साथ  सम्मलित होने वालों मे साउथ एक्स दिल्ली से आने वाला विकलांग युवक मुकेश के औजस्वी भाषण से सैकडों लोग इस आंदोलन में सम्मलित होने के लिए विवश हो जाते है। अपने विकलांग वाहन में अपने हाथों में ‘मै तो विकलांग नहीं हॅू पर आप है?’ का पोस्टर लिये यहां पर आंदोलन के समर्थन में बैठे देखा जा सकता है।
हर रोज सांय यहां पर आरके परासर द्वारा लिखिल ‘भगत सिंह लोट के आ, पुकारे देश तेरा’ के गायन के बाद 6 बजे के करीब यहां पर मोमबत्तियां जला कर जंतर मंतर पर मार्च निकाला जाता है। इसके बाद यहां पर 23 दिसम्बर को दिल्ली में सामुहिक बलात्कार की शिकार हुइ्र दामिनी को एक मिनट की मौन श्रद्धांजलि अर्पित भी की जाती है। हर रोज यही क्रम से विगत डेढ़ महिने से यहां पर दामिनी को न्याय दो का आंदोलन जारी है।

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