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Sunday, February 17, 2013


बसंत मिले या पतझड जिन्दगी की राह में




बसंत मिले या पतझड जिन्दगी की राह में
नादान बन कर फिर दिल न लगाना कभी।।
चाहे स्वागत करो या विलाप करो तुम
दुनिया से एक दिनसबको जाना होगा।
बसंत को भी पतझड की तरह जग से
यहां आकर जाना है सबको मेरे साथी।।
सब अपने ही समय में यहां आते जाते
फिर क्यों किसी का यहां दिल दुखाते।।
सृष्टि के इस सुन्दर उपवन में देखों
फूल खिले है रंग विरंगे जड़ चेतन के ।
जीवन के इस अनन्त सफर में देखो
जग बगिया में हम ही हैं फूल व कांटे।
हम सबके भी हैं अपने शूल और फूल
खिलता वही जिसको खिलाता है माली।
नहीं तो कांटों की सेज सुलाता है माली
जीवन में भी बसंत-पतझड दिखाता माली।
किसे ताज तो किसे रात दिखाता माली
जिंदगी के इस सफर में सबको साथी।
इन हसीन व
खौपनाक राहों में भी जीकर
दुनिया को छोड घर अपने जाना ही होगा।
न रखो राग द्वेष किसी से भी यहां साथी
हम सब हैं इस जीवन पथ के राही साथी।।
जिन्दगी हे अमानत इस बाग के माली की 
इसलिए मिल जुल कर जीना सीख लो।।
बसंत मिले या पतझड जिन्दगी की राह में
नादान बन कर फिर दिल न लगाना कभी।।
-देवसिंह रावत 
(रविवार 17 फरवरी दोपहर सवा एक बजे)
 

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