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Friday, February 1, 2013


दमतोड़ चूकी व्यवस्था व मनमोहनी कुशासन सें जनता ही नहीं गांधी, भगतसिंह व कबीर भी हैं दुखी 


मनमोहनसिंह की सरकार के कुशासन से देश की आम जनता चारों तरफ त्राही-त्राही कर रही है। आम आदमी का मंहगाई, भ्रटाचार, आतंकवाद व कुशासन से जीना दूश्वार हो रखा है। भले ही सत्तांध कांग्रेस व भाजपा सहित तमाम राजनेतिक दलों के मठाधीशों व चंगैजी नौकरशाह सहित इस व्यवस्था के कर्णधारों को जनता का दुख दर्द दिखाई न दे रहा हो परन्तु पिछले सप्ताह जो मेने देखा व समझा मुझे लगा कि देश की आम जनता ही नहीं गांधी, भगतसिंह व कबीर भी वर्तमान मनमोहनी कु,शासन से बेहद दुखी है।  30 जनवरी को  मुझे संसद की समीप  राष्ट्रीय धरना स्थल-जतंर मंतर पर जहां ‘दामिनी को न्याय दो-बलात्कारियों को फांसी दो’ के लिए 24 दिसम्बर से निरंतर जनांदोलन को संबोधित करते हुए गांधी जी इस कुव्यवस्था को समूल जड से उखाड फेंकने का आवाहन करते हुए नजर आये। सांयकाल में मुझे यहीं पर भगतसिंह भी दहाडते नजर आये। उसके बाद जब सांय 7 बजे के करीब संसद भवन के करीब  कांस्टीटयूशन क्लब के बाहर बस स्टेण्ड के पास मुझे आज की दयनीय व्यवस्था को अपने दर्द को एकतारे के स्वर से गॅूंजायमान करके कटघरे में रखते नजर आये।
शायद आप सोच रहे होंगे की रावत जी मजाक कर रहे हैं। भाई मैं कभी असत्य बातें न तो लिखता हॅू व नहीं कभी बोलता हॅू। 30 जनवरी को जंतर मंतर राष्ट्रीय धरना स्थल पर बिलकुल गांधी की जी भेषभूषा में उनकी ही कदकाठी का एक बुजुर्ग यहां धरने पर आया और उन्होंने वहां पर आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि मौजूदा व्यवस्था ने देश की आम जनता की जो दुर्दशा की है वह गुलामी के दिनों में भी नहीं थी। अब इस जनविरोधी व्यवस्था को जड़ से उखाडने के लिए वे 2013 में व्यापक जनजागरण अभियान चला रहे है। यह वे ही महानुभाव हैं जो गांधी की भेषभूषा में अण्णा से लेकर रामदेव व केजरीवाल सहित तमाम आंदोलनों में प्रमुखता से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे। जब भी जंतर मंतर में ही नहीं रामलीला मैदान में बडे जनांदोलन हाल के वर्षो में हुए उनमें अधिकांश आंदोलनों में मैने इन महाशय जी को गांधी के रूप में देखा। हूबहू गांधी जैसे लगने वाले इन महाशय को आयोजक ही नहीं मीडिया भी प्रमुखता से स्वागत करती है। इसके बाद सांयकाल 6 बजे के लगभग दामिनी को न्याय दो के लिए 16 दिसम्बर क्रांति के नाम से चल रहे आंदोलन में जब मै ‘भगतसिंह तू लोट के आ, पुकारे देश तेरा नामक गीत का करतल ध्वनि के साथ ऊंचे स्वर में सामुहिक गान सुना तो मुझे लगता कि भगतसिंह भी आज दुखी है। यहां पर आंदोलन कर रहे लोगों का ही नहीं अपितु देश के आम आदमियों का भी देश में काबिज कुशासन से मोह भंग हो चूका है। यहां पर इस गीत को हर सांयकाल दिल्ली विकासपुरी से आने वाले बुजुर्ग आर के पराशर की स्वरचित कविता ने यहां के तमाम आंदोलनकारियों का दिल ऐसे जीत लिया कि आंदोलनकारी हमेशा उनसे इस गीत को सांयकाल मोमवती मार्च से पहले गाने का अनुरोध करते है।
इसके बाद में काॅंस्टीटयूशन क्लब वाले बस स्टेण्ड पर पंहुचा तो वहां पर लोगों की भीड़ देख कर मैने सोचा कि कोई शराबी नौटंकी कर रहा होगा। परन्तु जब मैं वहां पर पंहुचा तो वहां पर देश के वरिठ पत्रकार बनारसी सिंह जी व आंदोलन के साथी जगदीश भट्ट को भी उत्सुकता से उस मजमें में खडा देख कर जैसे ही मैने सबकी निगाहों की दिशा में देखा तो एक दुबला पतला आदमी श्वेत वत्र पहने वहां पर एकतारा बजाते हुए कबीर के ‘कोड़ी-कोड़ी जोड़ कर बना हजारी,.........अंत समय जब जायेगा जैसे भिखारी ’दोहे गा रहा है। एकतारा बजाते हुए वर्तमान दिशाहीन समाज को सही दिशा दिखाते हुए कबीर को देख कर मुझे दशकों पुरानी यादें ताजा हो गयी जब हमारे गांवों में साधुओं की टोली भगवान बदरीनाथ यात्रा के दौरान आती थी। ये साधु संत इसी इकतारे के माध्यम से आम जनता में जनजागरण करते थे। उप्र के महुवा मूल के निवासी ये सज्जन इकतारे की धुनों से कबीर के दोहों को गुनगुना रहा था। इनके गीतों व इकतारे  की ध्वनि में इतना सम्मोहन व दिल को छू लेने वाले बोल थे कि कई लोगों ने अपनी बसों को ही छोड़ दिया। ये रामकृष्णपुरम में कुष्ट आश्रम के समीप जा रहे थे। इसी बीच मेरी बस आयी, खचाखच भरी बस में जैसे तेसे अंदर घुसने के बाद मैं सोचता रहा कि आखिर कई शताब्दियों की गुलामी की त्रासदी से उबरने के बाद भी अगर भारत अपने ही देश के चंगैजों की चुंगुल में बुरी तरह से फंस गया है। आखिर अपने ही पदलोलुपु चंगैजों के चुंगल में फंसे भारत को राष्ट्रभक्त नेतृत्व कब मिलेगा?

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