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Sunday, March 31, 2013


भारतीय भाषाओं में भी न्याय के लिए सोनिया गांधी के मुख्यालय पर धरने के 118वें दिन जोरदार प्रदर्शन 


सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय में भारतीय भाषा में न्याय देने की मांग को लेकर चल रहे श्यामरूद्र पाठक के आंदोलन के 118वें दिन अग्रणी भाषा आंदोलनकारियों ने किया प्रदर्शन


नई दिल्ली 31 मार्च ।
सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में न्याय की भाषा के रूप में भारतीय भाषाओं को स्थापित करने की मांग को लेकर सप्रंग सरकार की मुखिया सोनिया गांधी के 24 अकबर रोड दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय पर, 4 दिसम्बर से निरंतर धरना प्रदर्शन कर रहे  न्याय एवं विकास अभियान के संयोजक श्री श्याम रूद्र पाठक के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के 118 वें दिन, 31 मार्च को संघ  लोकसेवा आयोग पर भारतीय भाषाओं के लिए 14 साल का एतिहासिक धरना  देने वाले पुष्पेन्द्र चैहान, देश के अग्रणी पत्रकार राहुल देव, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानन्द मिश्र व हबीब अख्तर के साथ अग्रणी भारतीय भाषाओं के समर्थकों ने धरना दिया। धरने के समापन के अवसर पर आंदोलनकारियों ने देश में भारतीय भाषाओं में न्याय देने की मांग व अंग्रेजी की गुलामी थोपने के खिलाफ गगनभेदी नारों से कांग्रेस मुख्यालय व सोनिया का आवास गूंजायमान कर दिया।
गौरतलब है कि दिल्ली आईआईटी में हिन्दी के लिए ऐतिहासिक सफल संघर्ष करने वाले श्यामरूद्र पाठक के नेतृत्व में न्याय एवं विकास अभियान की गीता मिश्रा, विनोद कुमार पाण्डेय, राकेश कुमार पाठक, व कुंवर प्रमोद बिहारी आदि आंदोलनकारी 4 दिसम्बर से निरंतर सप्रंग सरकार की मुखिया सोनिया गांधी के मुख्यालय 24 अकबर रोड़ दिल्ली पर अपनी एक सुत्री मांग को लेकर 4 दिसम्बर से निरंतर धरना दे रहे है। इस अनवरत धरने के 118 दिन 24  अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय के दर पर देश के अग्रणी भाषा आंदोलनकारियों ने समर्थन में धरना प्रदर्शन करके राष्ट्रहित में अविलम्ब न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में न्याय देने की मांग को स्वीकार करने की पुरजोर मांग की।
31 मार्च रविवार को  धरने में समर्थन देने आये आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए श्यामरूद्र पाठक ने बताया कि वे व उनके साथ सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में न्याय दिलाने की मांग को लेकर संविधान के अनुच्छेद ३४८ में संशोधन की मांग कर रहे है । श्यामरूद्र  ने कहा कि मात्र अंग्रेजी भाषा में न्याय होने से जहां भारतीय लोकशाही के साथ साथ न्याय का भी घोर अपमान हो रहा है। जबतक हमारे देश की जनता को भारतीय भाषा में भी न्याय प्राप्त न हो तब तक वे इस आंदोलन को जारी रखेंगे। उन्होंने आम भारतीय जनमानस से इस महत्वपूर्ण आंदोलन से जुड़ कर देश में न्याय का द्वार आम जनमानस के लिए खोलने में अपने दायित्व का निर्वहन करे। उन्होंने जोर दे कर कहा कि तमिलनाडू में तमिल में, हिन्दी राज्यों में हिन्दी, कर्नाटक में कन्नड, उड़िसा में उडिया, बंगाल में बंगाली , गुजरात में गुजराती सहित तमाम राज्यों में अपने राज्य की भाषा में न्याय मिलेगा तो यह देश में न्याय के साथ साथ लोकशाही भी मजबूत होगी।
आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए  वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि आज इस मुद्दे को रोजगार से जोड़ते हुए युवाओं को जोड़ कर ही इसे व्यापक जनांदोलन बनाया जा सकता है। वहीं पूर्व कुलपति वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि इससे देश के अधिवक्ताओं व बार कोेंसिलों को जोड कर व्यापक बनाना चाहिए। अपने संबोधन में भारतीय मुक्ति सेना के प्रमुख देवसिंह रावत ने कहा कि इस देश में जानबुझ कर अंग्रेजी की गुलामी थोपी हुई है ।यह मात्र न्यायालय या संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता की ही समस्या नहीं अपितु यह देश की लोकशाही, आत्मसम्मान व न्याय का गलाघोंटने का खतरनाक देशद्रोही षडयंत्र है। इससे मुक्ति तभी मिलेगी जब तक इसे दामिनी आंदोलन की तरह व्यापक व प्रचण्ड न बना दिया जाय। इसके लिए लोगों के दिलों में फिर से राष्ट्र भक्ति का जज्बा पैदा करना होगा।
 संघ लोकसेवा आयोग  पर भारतीय भाषाओं के लिए चैदह सालों से धरना देने का ऐतिहासिक कार्य करने वाले पुष्पेन्द्र चोहान ने कहा कि अब हमें आंदोलन के साथ साथ देश के वरिष्ठ नेताओं का घेराव करके आंदोलन को तेज करना होगा। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ बलदेव वंशी ने अफसोस प्रकट किया कि देश पर अंग्रेजी की गुलामी इस कदर जकड़ी हुई है कि संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भारतीय भाषायें लागू करने व अंग्रेजी की अनिवार्यता को रद्द करने के लिए संसद ने दो दो बार संकल्प पारित किया है और पौने चार सौ के लगभग सांसदों ने हस्ताक्षर युक्त प्रस्ताव इस मांग के समर्थन में दिया हुआ है परन्तु आश्चर्य है कि इस देश की 65 साल की कोई सरकारें अभी तक देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति नहीं दिला पायी।
सभा को संबोधित करते हुए शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव अतुल कोठारी ने सुझाव दिया कि हमें पूरे देश की बार कोंसिलों को इस आंदोलन से जोड़ने के साथ साथ आम आदमियों को भी इससे जोड़ना चाहिए। धरने को संबोधित करते हुए यमुना आंदोलन के नेता श्रीओम ने कहा कि हमें इसे जनांदोलन बनाने के साथ साथ हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं के सरलीकरण करना चाहिए। इसके साथ कानून, इंजीनियरिग, चिकित्सा शास्त्र की किताबों को क्लिष्ट भाषा के बजाय सरल व सहज भाषा में बनानी चाहिए। इस धरने को संबोधित करते हुए इंजीनियर विनोद गौतम ने आंदोलनकारियों से अपने अहं से उपर उठ कर मुद्दे के लिए ईमानदारी से एकजूट हो कर कार्य करने की अपील की। वहीं इस आंदोलन से जुड़े दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक विनोद कुमार पाण्डे ने बताया कि देश तमाम अग्रणी नेता आस्कर फर्नाडिस, दिग्विजय सिंह, मोतीलाल वोरा, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह व राम विलास पासवान सहित अनैक वरिष्ठ राजनेता इस मुद्दे का खुले मन से इस मुद्दे समर्थन कर रहे हैं परन्तु आखिर वह कौन सी मजबूरी है जो यह मांग को पूरी करने में सरकार ही नहीं तमाम राजनैतिक दल बगले झांक रहे हैं। वहीं 118 दिन से इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाली एकमात्र महिला आंदोलनकारी गीता मिश्रा ने सभी आंदोलनकारियों से इस आंदोलन को जनांदोलन बनाने में अपना सहयोग देने की अपील की।
सभा का संचालन हरपाल राणा ने किया। आंदोलन में वरिष्ट पत्रकार हबीब अख्तर की धर्मपत्नी, रमेश कुमार आर्य, चैतन्य चन्दन, हरीश चैधरी, श्याम जी भट्, लोकहित मोर्चे के अध्यक्ष ईश्वर भारद्वाज, पूर्व निदेशक भाषा-नाहर सिंह वर्मा, नरेश शांडिल्य, महावीर शास्त्री, संजीव शर्मा, शमशेर नहरा, हरीश कुमार चैधरी, जगवीरसिंह राठोर, श्री कृष्ण, श्री विश्नोई व शशिकांत आदि भाषा समर्थकों ने भाग लिया।

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