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Tuesday, March 12, 2013

जनांकांक्षाओं को रौंदने वाले सतांधों को जनता देगी दण्ड 



विश्वासघात से कम नहीं रहा विजय बहुगुणा की ताजपोशी का एक साल 

कांग्रेस के अघोषित नये आला कमान राहुल गांधी के देहरादून दौरे के बाद अनुशासन के नाम पर जो हंटर कार्यकत्र्ताओं पर चला कर कांग्रेसी नेतृत्व भले ही कुछ समय चैन की नींद सो ले परन्तु जनता कांग्रेस के कुशासन से उसी प्रकार आक्रोशित है जिस प्रकार वह प्रदेश की जनांकांक्षाओं का अपने कुशासन से गला घोंटने वाले तिवारी, खण्डूडी व निशंक की सरकारों से त्रस्त थे। भले ही कांग्रेस अलाकमान व उसके सिपाहे सलार भूल गये होगें कि एक साल पहले प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने भाजपा के निशव व खण्डूडी के कुशासन से छुटकारा पाने के लिए अन्य मजबूत विकल्प न होने के कारण कांग्रेस को इस आशा से सौंपी की वे जनांकांक्षाओं को साकार करेगी। परन्तु सत्ता हासिल होते ही कांग्रेसी नेतृत्व यह भूल गया कि प्रदेश की जनता ने रामदेव व अण्णा हजारे की टीम की लाख गुहार को ठुकराते हुए कांग्रेस का सत्तासीन सौंपा था। कांग्रेस नेतृत्व ने जनादेश का सम्मान करने के बजाय विजय बहुगुणा जैसे नेता को दिल्ली से जबरन प्रदेश के अधिकांश विधायकों के विरोध के बाबजूद थोपा। जो जनता ने किसी विश्वासघात से कम नहीं माना। केवल विधानसभा भवन गैरसैंण में आधे अधूरे मन से बनाने का ऐलान करने के अलावा कोई एक काम भी प्रदेश के मुख्यमंत्री ने ऐसा नहीं किया जिस पर जनता के जख्मों को एक प्रकार से मरहम माना जा सके। प्रदेश की जनांकांक्षाओं को पूरा करना तो रहा दूर प्रदेश के मुख्यमंत्री का आये दिन दिल्ली में डेरा जमाये रहना और मंत्रियों का विदेश दौरे पर चक्कर लगाना प्रदेश के प्रति उनके लगाव को खुद ही बेनकाब करता है। 13 मार्च को मुख्यमंत्री ने प्रदेश सरकार की बागडोर संभाली। इस दौरान उनके प्रति जनता का क्या नजरिया है यह उनके द्वारा रिक्त की गयी टिहरी संसदीय सीट पर अपने मुख्यमंत्री रहते हुए अपने बेटे को न जीता पाने से ही साफ हो जाता है। मुख्यमंत्री बनने के बाबजूद उनकी नजर में न तो पार्टी का कोई महत्व है व नहीं प्रदेश की उस जनता का जिसने प्रदेश गठन के लिए अपनी शहादते दी और लम्बा संघर्ष किया। विजय बहुगुणा के नजर में केवल खुद अपना पद व अपना परिवार तक ही सीमित है। किस प्रकार के लोगों को उन्होंने प्रदेश के महत्वपूर्ण संस्थानों में आसीन किये हैं इसका नमुना उनकी पसंद को देख कर साफ हो जाता है। जिस प्रकार से वे मुलायम से लेकर उनके प्यादों के साथ गलबहियां करते नजर आते है उससे उत्तराखण्ड की उस जनता के दिलों में क्या गुजरती होगी जिन्होंने मुजफरनगर काण्ड के जख्मों को अपने सीने में संजोया है। उन लोगों को प्रदेश के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करने को जनता कैसे भूल सकती जिन्होंने मुजफरनगर काण्ड के गुनाहगारों को बचाने के लिए कानून का ही गला घोंटा। इन 12 सालों में जनता ने देखा की सरकारें चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की प्रदेश की जनांकाक्षाओं को पूरा करने के बजाय इन सरकारों ने इनका गला घोंटने का ही काम किया। राज्य गठन के समय से ही जो मुद्दे थे वे आज भी मुद्दे बन कर ही रह गये। किसी सरकार ने प्रदेश की राजधानी गैरसैंण बनाने की ईमानदारी से पहल नहीं की अपितु देहरादून में ही राजधानी थोपने का काम किया। प्रदेश के मान सम्मान को रौंदने वाले मुजफरनगर काण्ड सहित तमाम पुलिसिया दमन के प्रकरणों में न्याय के लिए अभी भी प्रदेश तरस रहा है। प्रदेश के जल, भूमि व जंगल सहित तमाम संसाधनों की बंदरबांट को रोकने के बजाय सरकारें इसको अपने निहित स्वार्थ के लिए और तेजी से विकास के नाम पर बांट रही है। इसके साथ ही प्रदेश में मूल निवास से लेकर जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन को थोप कर प्रदेश के हितों को रौंदने का काम किया जा रहा है। यही नहीं प्रदेश में सुशासन की नींव रखने के बजाय जातिवादी, क्षेत्रवादी व भ्रष्टाचारी कुशासन के गर्त में धकेलने का काम किया जा रहा है। प्रदेश के महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर प्रदेश की प्रतिभाओं को आसीन करने के बजाय प्रदेश के बाहर के नेताओं के प्यादों को यहां पर आसीन करके प्रदेश के पूरे तंत्र को पंगू किया जा रहा है।
राहुल के दौरे के बाद निकाले गये तीन कांग्रेसी नेताओं का विवाद से प्रदेश कांग्रेस के अनुशासन की कलई खुल गयी। कांग्रेस प्रवक्ता धीरेन्द्र प्रताप द्वारा जारी किये गये वक्तव्य के अनुसार प्रदेश के तीन कांग्रेस नेताओं को राहुल गांधी के कार्यक्रम के दौरान हुडदंग करना व प्रांतीय प्रभारी चैधरी वीरेंद्र से भिड़ने के कारण प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने ऐसे तीन नेताओं रामकुमार वालिया, राव अफाक व नईम कुरैशी को अनुशासनहीनता के आरोप में निष्कासित कर दिया है। इसके अलावा पांच को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। राहुल गांधी के आने पर धरना देने के कारण इन तीनों की प्राथमिक सदस्यता समाप्त करते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया गया है। अन्य मामलों में पूर्व उपाध्यक्ष चैधरी सुरेन्द्र सिंह, प्रमोद कपरवाण, वेदपाल सैनी, गुलजार अहमद को पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाये जाने पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। वहीं इस अनुशासन के हेटर से भी कांग्रेस में आपसी गुटबाजी थमने का नाम नहीं ले रही है। सुत्रों के अनुसार यह हंटर प्रदेश अध्यक्ष के संभावित ताजपोशी में कोई बडा विवाद खडा न करने की चेतावनी के रूप में कांग्रेसी गुटबाज नेताओं पर अंकुश लगाने के लिए किया गया। गौरतलब है कि प्रदेश में गुटबाजी को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व प्रदेश अध्यक्ष के नाम की घोषणा चाह कर भी नहीं कर पा रही है। जहां तक प्रांतीय प्रभारी चैधरी को बनाये रखने के कारण कांग्रेस की छवि पूरे प्रदेश में ही नहीं देश में भी लोगों के नजरों से उतर रही है। वहीं लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को मजबूत बनाने के उदेश्य से यहां पर सक्षम व साफ छवि का अध्यक्ष बनाने की कांग्रेस नेतृत्व की मुहिम का एक अंग के रूप में अनुशासन का यह हंटर माना जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष के पद के लिए सबसे आगे प्रदीप टम्टा, सतपाल महाराज, हीरासिंह बिष्ट व महेन्द्र पाल के नामों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इस मामले में कांग्रेस के खेमबाजी को कांग्रेस की मजबूती पर सबसे बडा ग्रहण माना जा रहा है। सुत्रों के अनुसार नेताओं की दृष्टि से कांग्रेस सभी दलों से 21 नजर आ रही है परन्तु कांग्रेस क्षत्रपों में ही नहीं आम जनता में भी इस बात का आक्रोश है कि जनाधार वाले नेताओं को नजरांदाज करके बहुगुणा जैसे नेता को यहां पर थोप कर खुद कांग्रेस नेतृत्व ने जनता के साथ साथ कांग्रेसी कार्यकत्र्ताओं की भी आशाओं पर वज्रपात ही किया। हालांकि प्रदेश के अधिकांश नेताओं से प्रदेश की जनता को कोई ऐसी आशा नहीं है कि वे पूर्ववर्ती सरकार से हट कर कुछ नया काम करते। परन्तु जिस बेशर्मी व निर्मता से बहुगुणा सरकार प्रदेश की जनांकांक्षाओं को रौंद कर प्रदेश के संसाधनों को निहित स्वार्थी तत्वों के साथ मिल कर प्रदेश को पतन के गर्त में धकेला जा रहा है वह बेहद ही चिंता का विषय है।
खासकर जिस प्रकार से विजय बहुगुणा ने अपनी विधानसभा सीट जीतने के लिए सितारगंज में पट्टे धारियों को मालिकाना अधिकार दिया। जिस प्रकार से मूल निवास प्रमाण पत्र वाले मामले में उदासीनता दिखा कर प्रदेश के हितों को रौदंा, जिस प्रकार से सिडकुल सहित प्रदेश के जमीनों का व्यवसायीकरण किया जा रहा रहा है। देवभूमि उत्तराखण्ड में शराब की त्रासदी से आम जनता को उबारने के लिए मजबूत कदम उठाने की जगह यहां पर शराब का गटर ही बनाने की योजना प्रदेश को कहां पंहुचायेगी यह आने वाला समय ही बतायेगा। यहां पर भू माफियाओं व शराब माफियाओं का जो शिकंजां पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में कसा था वह कम होने के बजाय और मजबूत हो रहा है। इस प्रकार कांग्रेस नेतृत्व को एक बात समझ लेना चाहिए कि जो जनता प्रदेश का गठन करने वाले भाजपा की उत्तराखण्ड विरोधी सोच के कारण लोकसभा व विधानसभा चुनाव मे ंसफाया कर सकती है तो वह ऐसे जनविरोधी सरकारों को क्यों छाती में मूंग दलने की इजाजत देगी। कभी नहीं। शेष श्रीकृष्णाय् नमो। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय नमो।

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