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Saturday, March 16, 2013


हथनी कुण्ड से यमुना मुक्ति के लिए जंतर मंतर पर आमरण अनशन जारी 


यमुना मुक्तिकरण समझोते के विरोध में व हथनी कुण्ड से यमुना को मुक्त करने के लिए 




नई दिल्ली 17 मार्च ।
भले ही सरकार ने मथुरा से दिल्ली कूच करने वाले हजारों यमुना भक्तों को समझोते का झुनझुना पकडा कर केन्द्र सरकार ने इस आंदोलन से लोगों को वापस मथुरा अपने घर भिजवाने में सफलता हासिल कर इसका श्रेय हासिल करने के कसीदे पढ़ रहा हो परन्तु इस समझोते को इस आंदोलन से विश्वासघात बताते हुए यमुना मुक्ति आंदोलनकारियों ने जंतर मंतर पर 15 मार्च आमरण अनशन शुरू कर दिया है। यमुना मुक्ति अभियान के बैनर तले जंतर मंतर पर चल रहे इस आंदोलन के संयोजक मथुरा के अग्रणी समाजसेवी चिंतक श्रीओम ने प्यारा उत्तराखण्ड के सम्पादक देवसिंह रावत को जंतर मंतर पर बताया कि जिस हथनी कुण्ड सेे यमुना को मुक्ति दिलाने के लिए हजारों यमुना भक्तों ने मथुरा से दिल्ली के लिए कूच किया था, सरकार से हुआ तथाकथित समझोता यमुना भक्तों की मांग को कहीं दूर-दूर तक पूरा नहीं करता है। यमुना नदी को बचाने व देश को न्याय दिलाने के लिए जंतर मंतर पर आंदोलन शुरू किया है। यमुना मुक्ति के लिए अनशन में बेठे लोगों में प्रबल प्रताप, श्याम, राम शंकर व स्वयं इस आंदोलन के संयोजक श्रीओम है। वहीं इस आंदोलन को सफल बनाने में गुलशन आनन्द, धनंजयसिंह, अश्वनी, गणेश गौतम, कल्पना भारद्वाज, सुश्री मोहनी, चतुर्वेदी, विनोद कुमार शर्मा उर्फ वालिया व रामकुमार अत्री सहित अनैक समाजसेवी दिन रात जुटे हुए है। इन आंदोलनकारियों ने 16 मार्च की सांयकाल इस समझोते के विरोध में पुतला दहन भी किया।
इस आंदोलन से हुए समझोते से न केवल जंतर मंतर पर अनशन व आंदोलन कर रहे यमुना मुक्ति के आंदोलनकारी ही नहीं कर रहे हैं अपितु देश के अधिकांश लोग भौचंक्के थे कि केन्द्र सरकार हथनीकुण्ड में रोकी गयी यमुना के जल की बहने वाली 70 प्रतिशत पानी यमुना जी में छोडने पर कोई कैसे संतोषजनक मान कर अपनी सफलता पर मिठाइयां बांटी जा रही है। सरकार देश के व्यापक हित में न्याय करते हुए हथनी कुण्ड में यमुना के अधिकांश जल पर कुण्डली मारने की हरियाणा की तानाशाही से मुक्त कराने के बजाय इसमें किसी नहर से गंगा का पानी डालने या का टोटके को समाधान के नाम पर परोस रही है।   इस समझोते के तहत सरकार ने यमुना के दोनों तरफ दिल्ली आदि तटवर्ती नगरों से निकलने वाले गंदे नालों का पानी यमुना न जा पाये इसके लिए बनाया जायेगा। इसके साथ एक समिति बनायी जायेगी जो इस समस्या का समाधान सुझायेगी। परन्तु शर्मनाक बात यह है कि सरकार इस समस्या का मूल विन्दू ‘हथनीकुण्ड’ में रोका हुआ यमुना को मुक्त करना तो दूर रहा इस पर चर्चा करने से भी बचती रही। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय में सरकार ने दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिनिधियों के साथ तीन दौर की बैठक हुई। इसमें हरियाणा के प्रतिनिधियों ने यमुना अकॉर्ड- 1994 का हवाला देकर साफ कह दिया कि हथनी कुण्ड से और पानी नहीं छोड सकता । हरियाणा का दावा रहा कि वे इस समझौते के मुताबिक पानी पहले से ही छोड़ा जा रहा है। वहीं आंदोलनकारी ही नहीं आम जनता भी जानती है कि हथनी कुण्ड में यमुना का अधिकांश पानी हरियाणा ने रोका हुआ है। इसी कारण यह समस्या उत्पन्न हुई। आंदोलनकारी व देश की आम जनता इस बात से हैरान है कि कैसे सरकार ने 1994 को यमुना समझौता-1994 करके यमुना का अधिकांश जल पर हरियाणा को अधिकार दे दिया जबकि यमुना के तटवर्ती क्षेत्रों के अन्य राज्यों के करोड़ों लोगों के मूलभूत अधिकार को नजरांदाज किया गया।
गौरतलब है कि बुधवार 13 मार्च  की रात यमुना आंदोलनकारी और केंद्र सरकार के बीच सहमति बन गई। इसके तहत केंद्र सरकार ने यमुना में दिल्ली का गंदा पानी मिलने से रोकने के लिए इसके समानांतर नाला बनाने का वादा किया है। नदी का प्रवाह बढ़ाने के विकल्प मिलकर तलाशने की बात पर यमुना आंदोलनकारी भी सहमत हो गए हैं। आंदोलनकारियों व सरकार के बीच हुए समझौते के अनुसार कि दिल्ली में यमुना में गिरने वाले गंदे नालों को अलग रखने के लिए यमुना के समांतर एक नाला बनाया जाएगा। इसका पूरा खर्च केंद्र सरकार देगी। इसी तरह इसकी योजना ढाई महीने के अंदर तैयार कर ली जाएगी। योजना बनाने वाली समिति में यमुना रक्षक दल के भी दो प्रतिनिधि शामिल होंगे। इसी तरह यमुना में स्वच्छ जल के प्रवाह को बढ़ाने के लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर विकल्पों को तलाशा जाएगा। हथिनी कुंड से जल छोड़े जाने के मुद्दे पर हरियाणा से बातचीत होती रहेगी। भले  ही इस समझोते को यमुना रक्षक दल के अध्यक्ष जय कृष्ण दास अपनी आंशिक उपलब्धी बताते हुए अपना आंदोलन स्थगित कर दिया। जो यमुना भक्त दिल्ली आने के लिए मथुरा से चले थे वे दिल्ली के बदरपुर के गांव आली में डाले डेरा से ही वापस अपने घरों को चले गयें। इससे एक बडा आंदोलन को कुंद करने में सरकार ने सफलता हासिल की उससे देश हित में लगे लोग चिंतित है।  वहीं इस प्रकरण से इस आंदोलन के नेतृत्व मान मंदिर बरसाना के रमेश बाबा, यमुना रक्षक दल के प्रमुख जय कृष्ण  दास के नेतृत्व पर भी आंदोलनकारी आज प्रश्न उठा रहे है। जंतर मंतर पर आंदोलनकारी ही नहीं यमुना रक्षक दल के राष्ट्रीय सलाहकार उदयन शर्मा, गुजराती पुष्टि मार्गी सम्प्रदाय, चतुर्वेदी समाज ही नहीं सम्पूर्ण ब्रजवासी भी अपने आप को ठगे महसूस कर रहे हैं। सबसे हैरानी की बात है जिस उत्तराखण्ड से यमुना नदी निकलती है वो हथनीकुण्ड पर जिस प्रकार से यमुना के जल पर हरियाणा अधिकार जता रहा है उस प्रकार का कहीं अधिकार उत्तराखण्ड ने जता दिया तो कैसे देश चलेगा? इसलिए अन्तरराष्ट्रीय नदी जल वंटवारे के मानको के अनुसार ही इस समस्या का समाधान होना चाहिए।

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