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Tuesday, March 5, 2013

दामिनी को पुरस्कार से नवाज कर अमेरिका ने मारा भारतीय हुक्मरानों को करारा तमाचा 


सोनिया व शीला सरकार को तो भी जल विहार की बहादूर बेटी की सुध लेने की फुर्सत तक नहीं


16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली में सामुहिक बलात्कार का शिकार हुई 23 वर्षीया पेरामेडिकल की छात्रा दामिनी की बहादूरी को संसार के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका ने सम्मानित करने का ऐलान करके जहां मृतका दामिनी के बलात्कारियों से अंतिम सांस तक मुकाबला करने के साहस का सम्मान किया वहीं अमेरिका ने अपने दायित्व को नजरांदाज करने वाले सत्तांध भारतीय हुक्मरानों हुक्मरानों को करारा तमाचा मार कर इन्हें एक शासक के दायित्व का पाठ पढ़ाने का सराहनीय कार्य भी किया। जो काम भारत के हुक्मरान मनमोहन सिंह व सोनिया गांधी को करना चाहिए था वह काम सात समुद्र पार का देश अमेरिका कर रहा है। नहीं तो भारत की हुक्मरान बनी सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की संवेदनहीनता इतनी दम तोड़ चूकी कि उनको इस घटना के कुछ दिन बाद ही घटित दिल्ली की जलविहार की जांबाज दामिनी जिसने बलात्कार करने के लिए उतारू दरिंदे का डट कर मुकाबला करके न केवल अपनी आबरू बचायी, इससे आक्रोशित हो कर इस दरिंदें ने इस 16 साल की कक्षा 11वीं में पढ़ रही गरीब व अनाथ परिवार की दामिनी के मुंह में राड डाल कर जानलेवा हमला किया। यह जांबाज दामिनी का इलाज एक सप्ताह तक एम्स में हुआ परन्तु क्या मजाल की दिल्ली की सोनिया, मनमोहन तो रहे दूर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को इस बहादूर बेटी की सुध लेने की फुर्सत ही नहीं मिली। इस जांबाज गरीब बेटी को बहादूरी का गीता चैपडा पुरस्कार से नवाजने का काम सरकार को करना चाहिए था परन्तु इन हुक्मरानों को फुर्सत ही नहीं। केवल जब उत्तराखण्डी संस्थाओं ने उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पर बडा दवाब बनाया तो उन्होंने अधूरे मन से केवल 2 लाख रूपये की सहायता देने का काम किया। जबकि इस पीडि़त बच्ची को उत्तराखण्डी समाज कम से कम दामिनी की तरह 5 लाख रूपये की सहायता देने की आशा प्रदेश के मुख्यमंत्री से कर रहा था। परन्तु सामाजिक संस्थायें जो लाखों करोड़ों रूपये समाजसेवा व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में खर्च कर देते हैं उनको भी इस गरीब बहादूर बेटी के इस साहसिक कार्य को नवाजने की सुध तक नहीं आयी। इनको लगता है सांप ही सुघ गया है।

भारतीय हुक्मरानों को आम भारतीयों से न तो लगाव है व नहीं उनमें इनको कुछ प्रतिभा ही दिखाइ्र देती है। हालत इतनी बदतर है कि देश के प्रधानमंत्री सहित यहां के नौकरशाही को आम भारतीयों का दुख दर्द या प्रतिभा तब तक दिखाई नहीं देती जब तक अमेरिका या पश्चिमी देश इसको स्वीकार न करे। दामिनी प्रकरण में मनमोहन व सोनिया की अचम्भित सक्रियता तभी दिखी जब हजारों की संख्या में आम जनता ने राष्ट्रपति भवन से लेकर इण्डिया गेट तक घेर लिया था और इस पर अमेरिका सहित संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव ने त्वरित प्रतिक्रिया प्रकट की और विश्व मीडिया ने इसको प्रमुखता से प्रसारित किया। इससे भौचंक्के भारतीय हुक्मरानों ने न केवल अंतिम सांसे ले रही दामिनी को उसकी जान को खतरे में डाल कर सिंगापुर में हवाई जहाज से भेजने की अक्ष्मय खतरनाक भूल तक कर डाली। यही नहीं जब उसका शव भारत लाया गया तो देर रात दिल्ली हवाई अड्डे पर मनमोहन व सोनिया गांधी हवाइ्र अड्डे पर जा कर जनाक्रोश को थामने की दृष्टि से गये। परन्तु इसकी मौत पर उसके घर तक जाने वाली सोनिया गांधी व राहुल गांधी को इतनी सुध नहीं रही कि इसको बहादूरी के लिए सम्मानित किया जाय।
यह पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर दामिनी सहित विश्व की 10 साहसिक महिलाओं को सम्मानित किया जायेगा। यह सम्मान 8 मार्चा को अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा और अमेरिकी विदेश मंत्री जान केरी प्रदान करेंगे। दामिनी को मरणोपरांत दिया जाने वाला यह पुरस्कार की शुरूआत अमेरिका ने विश्व की साहसिक महिलाओं को सम्मानित करने के लिए किया गया। अब तक 100 से अधिक साहसिक महिलाओं को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जा चूका है। अमेरिका द्वारा दामिनी को इस पुरस्कार के लिए चयनित करके भारतीय हुक्मरानों को एक प्रकार से सबक भी सिखाने का सराहनीय कार्य भी है कि अपने जांबाज, देशभक्तों व प्रतिभाओं का सम्मान करने एवम देशद्रोहियों, गुनाहगारों व अपराधियों को दण्डित करने का काम जो व्यवस्था नहीं करती वह किसी भी सूरत में न तो लम्बे समय तक जीवंत रहती व नहीं सराहनीय मानी जा सकती हे।

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