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Tuesday, September 27, 2011

-संसद की चैखट पर 2 अक्टूबर को मनाया जायेगा काला दिवस

-मुजफ्फरनगर काण्ड के अभियुक्तों को द िण्डत न क र पाने से लगा भारतीय व्यवस्था पर सवालिया निशान
-राव मुलायम से बदतर साबित हुए उत्तराखण्डी हुक्मरान
-खण्डूडी क ो 50 हजार मुआवजे व निशंक को आंदोलनकारी तकमा लेने की सुध रही, शहीदों की नहीं
-संसद की चैखट पर 2 अक्टूबर को मनाया जायेगा काला दिवस



मुजफ्फरनगर काण्ड के विरोध मे ं आगामी 2 अक्टूबर को देश विदेश में रहने वाले सवा करोड़ उत्तराखण्डी काला दिवस के रूप में देश की व्यवस्था से 17 साल बाद भी इस काण्ड के दोषियों को सजा न दे पाने के विरोध में मनायेगी। मुख्य समारोह संसद के समक्ष उत्तराखण्ड राज्य गठ न आंदोलनकारी संगठनों द्वारा काला दिवस के रूप में मना कर राष्ट्रपति को रोषयुक्त ज्ञापन सौंपा जायेगा।
ंउत्तराखण्डियों को इस बात से हैरानी है कि प्रदेश के वर्तमान मुख्ंयमंत्री खंडूडी को आंदोलन के दौरान ंमिले 50000 रूपये मुआवजे लेने को तो वे भूल नहीं पाये, परन्तु उनको आंदोलन में प्रदेश के सम्मान व देश की संस्कृति व मानवता को शर्मसार करने वाले मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों क ो दण्डित करने की सुध तक नहीं आयी। वहीं पूर्व मुख्ंयमंत्रीं निशंक ंको खुद को आंदोलनकारी का तकमा हासिल करने की हडबड़ीं ंरही परन्तु उनको उत्तराखण्ड का यह दर्द कहीं नहीं दिखाई दिया। स्वामीं या तिवारी से आश करना भी मूर्खता होगी। परन्तु जो घडियाली आंसू बहा रहे थे उनका राज देख कर एक ही बात लगी कि ये मुलायम व ंराव से बदतर िनकले।
जिस मुजफ्रपफर नगर काण्ड-94 के अभियुक्तों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मावनता व देश की लोकशाही का कातिल बताया, जिस मुजफ्रपफरनगर काण्ड-94 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन केन्द्र सरकार व राज्य सरकार दोनों को दोषी मानते हुए उनके कृत्य को नाजी अत्याचारों के समकक्ष रखा, जिस मुजफ्रपफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को देश की सर्वोच्च जांच ऐजेन्सी सीबीआई, मानवाध्किार आयोग सहित अन्य स्वतंत्रा ऐजेन्सियों ने भी गुनाहगार ठहराया था उस काण्ड के एक भी दोषी को आज इस काण्ड के 17 साल बीत जाने के बाद भी सजा देने में देश की पूरी व्यवस्था अक्षम क्यों हुई। सजा देने की बात तो रही दूर इन अपराध्यिों को देश की व्यवस्था में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन कर के एक प्रकार से सम्मानित करके जहां पीडितों की न्याय की आशाओं का निर्ममता से गला घोंटा वहीं दूसरी तरपफ देश की पूरी व्यवस्था पर ही कालिख पोत दिया।
जिस कौन देगा सवा करोड़ देश भक्त उत्तराखण्डियों के इस सवाल का जवाब । शायद कोई नहीं। गत सोलह साल से 2 अक्टूबर के दिन हर साल उत्तराखण्डी संसद की चैखट जंतर मंतर के आगे इसी सवाल को लेकर देश की व्यवस्था के प्रमुख राष्ट्रपति के समक्ष देश की व्यवस्था द्वारा न्याय का गला घोंटने के विरोध् में काला दिवस मनाते हुए एक ज्ञापन भेंट करते हैं। ज्ञापन में देश के राष्ट्राध्यक्ष से एक ही सवाल पूछा जाता है कि क्यों देश की व्यवस्था मुजफ्रपफरनगर काण्ड-94 के अभियुक्तों को दण्डित देने में अक्षम्य है?
इन सोलह साल से राष्ट्रपति को ज्ञापन देते देते उत्तराखण्डियों की न्याय की आशा भी दम तोड़ चूकी है। इन सोलह सालों के ज्ञापनों का मैं प्रमुखता से साक्षी रहा हॅू। सवा करोड़ उत्तराखण्डियों की तरपफ से देश के राष्ट्राध्यक्ष से न्याय की गुहार लगायी जाती रही। परन्तु क्या मजाल इन सोलह सालों में एक भी ज्ञापन का प्रत्युतर देश के व्यवस्था की तरपफ से हमें मिला हो, जिसमें व्यवस्था द्वारा न्याय देने का वायदा किया हो या न्याय न देने का ऐलान ही किया हो।
आज एक सवाल हर उत्तराखण्डियों के जेहन में ही नहीं अपितु देश के प्रबु(जनों के जेहन में भी रह रह कर उठ रहा होगा कि क्या इस देश में आम आदमियों को कोई न्याय है भी नहीं? क्यों सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी आंखों के आगे घटित हुई इस विभत्स घटना पर न्याय करने का साहस तक नहीं जुटा पाया। क्यों देश की व्यवस्था अपने सवा करोड़ देशभक्तों को न्याय देने में अपने आपको नपुंसक सा पाती है।
इस काण्ड का दण्ड सर्वोच्च सत्ता ने ऐसा दिया कि इसके बाद देश में राजनैतिक अस्थिरता का माहौल ही छा गया। जनता की नजर में इस काण्ड के दोनों खलनायकों राव व मुलायम पूरी तरह से बेनकाब हो गये। राव का भले ही देहान्त हो गया हो परन्तु आज भी उनके कुकृत्यों से आम उत्तराखण्डी उनके नाम से भी ध्ृणा करता है। मुलायम पर तो महाकाल की वक्रदृष्टि ऐसी पड़ी है की उनको समझ में ही नहीं आ रहा है। वाजपेयी ने राज्य का गठन तो किया परन्तु इसका नाम, राजधनी, क्षेत्रा इत्यादि में ऐसा मक्कड़ जाल बुना की उत्तराखण्ड की आत्मा आज भी उनके इस दंश से व्यथित है, उनकी दशा आज खुद क्या हे। उत्तराखण्ड द्रोह करने की सजा नारायणदत्त तिवारी को इस उम्र में कैसे भोगनी पड़ रही है इसका बखान क्या करें सबको मालुम है। खंडूडी जी को अवसर मिला उन्होंने भी तिवारी की राह पर चल कर उत्तराखण्ड के हितों का गला ही घोंटा, अपने शासनकाल में उन्होंने मुजफ्रपफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित करने के लिए कोई ठोस पहल तक नहीं की, यही नहीं उनके शासनकाल में इस काण्ड का एक खलनायक को उत्तराखण्ड की ध्रती पर उनके प्रशासन ने लाल कालीन बिछा कर स्वागत करने का दुशाहस किया। उसका दण्ड उनको भोगना पड़ा। जिस राज्य का गठन लोगों ने अपनी शहादतें दे कर किया उस राज्य की राजनैतिक भविष्य को जनसंख्या पर आधारित विधनसभाई परिसीमन को मूक रह कर स्वीकार करने तथा प्रदेश की स्थाई राजधनी गैरसैंण बनाने के बजाय देहरादून बनाने के षडयंत्रा को खंडूडी जी विपफल नहीं कर पाये। कुल मिला कर उनके शासन में उत्तराखण्ड की उन आशाओं पर बज्रपात हुआ जिसके लिए उत्तराखण्ड राज्य का गठन किया गया। उसके बाद अब निशंक मुख्यमंत्राी बने। उनमें को गंभीरता कहीं दूर-दूर तक दिखाई ही नहीं दे रही है। उनसे मैने खुद मुजफ्रपफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित करने के लिए 84 के सिख दंगों व गुजरात में पफर्जी मुठभेड़ जैसे मामलों में नये सिरे से बने जांच आयोग का गठन करने की मांग की। परन्तु मुझे बहुत ही दुख के साथ यह मालुम हो गया कि उत्तराखण्ड के किसी भी मुख्यमंत्राी को उत्तराखण्ड के मान सम्मान व यहां की जनांकांक्षाओं की कहीं दूर-दूर तक ललक नहीं है। अगर इनमें जरा सा भी जमीर होता तो वे आठ साल तक मुजफ्रपफरनगर काण्ड के अंभियुक्तों को सलाखों की पीछे लाने के लिए दिन रात एक कर दिये होते। परन्तु ये सभी सत्ता के भूखे हैं। सत्ता ही इनके लिए सबकुछ है। इन्हीे के कारण आज उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों के हत्यारे को कांग्रेस में ससम्मान सम्मलित किया है व भाजपा सरकार ने मुजफ्रपफरनगर काण्ड के दोषियों को कानूनी संरक्षण देने के लिए न्याय का गला घोंटने वाले को महत्वपूर्ण पद पर आसीन किया हुआ है।
परन्तु ये सभी लोग भूल जाते हैं कि दुनिया की अदालतों के उपर भी एक बड़ी अदालत होती है। जहां हर गुनाहगार को सजा मिलती है। इस अदालत में न तो किसी गवाह व न किसी सबूत की बेसाखियों की जरूरत होती है। इसलिए मुझे विश्वास है कि भले ही ये अपराध्ी दुनिया की इन कमजोर अदालतों की आंखों में ध्ूल झोक कर स्वतंत्रा सा घूम लें परन्तु काल की अदालत में इनको हर हाल में दण्ड मिलेगा। कुछ को मिल रहा है व कुछ को मिलने वाला है। परन्तु सत्तामद में इन्सान को इन्सान न समझने वाले ये हुक्मरान भले ही सत्तामद में कितने ही प्रपंच क्यों न करलें परन्तु इनके पापों का घड़ा अब भर चूका है, इनको इनके गुनाहों की सजा हर हाल में मिलगी। मैने वर्तमान मुख्यमंत्राी निशंक से भी यही सलाह दी है कि भगवान बदरीनाथ अंध्े नहीं है। वे न्याय करते हैं व करेंगे। उनके दर पर न देर है व नहीं अंध्ेर। अपने महान शहीद साथियों की पावन स्मृति को शत् शत् नमन् करते हुए सभी पीड़ितों को एक ही आश्वासन देता हॅू कि महाकाल ही सदा न्याय करता है। इस काण्ड में भी कर रहा है व भविष्य में भी करेगा। एक भी दोषी उसके न्याय से बच नहीं पायेंगे। दोषी ही नहीं जनांकांक्षाओं को रौंदने वाले उत्तराखण्ड के हर हुक्मरान भी महाकाल की अदालत में गुनाहगार हो कर अपनी सजा की याचना करेंगे।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ऊँ तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

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