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Wednesday, September 14, 2011

निशंक की विदाई की खबरों से प्रफुल्लित उत्तराखण्डियों की खुशियों पर लगा जातिवादी ग्रहण

बार-बार क्यों चढ़ाई जा रही है जातिवादी काठ की हांडियां?
-निशंक की विदाई की खबरों से प्रफुल्लित उत्तराखण्डियों की खुशियों पर लगा जातिवादी ग्रहण/


आखिर 10 सितम्बर को निशंक की विदाई की बेला जो खबरिया चैनलों से छन छन कर आ रही थी वह प्रदेश के मुख्यमंत्री निशंक द्वारा राज्यपाल को अपना इस्तीफा सोंपने के बाद व पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी द्वारा सांय शपथ ग्रहण करने के बाद साकार हो सकी। निशंक विदाई का प्रदेश की जनता बहुत ही बेसब्री से इंतजार कर रही थी। परन्तु निशंक को बदल कर दो साल पहले ही हटाये गये पूर्व मेजर जनरल खंडूडी को फिर से आसीन किये जाने का भाजपा के आला नेतृत्व का निर्णय, प्रदेश की जनता के गले ही नहीं उतर रहा है। काठ की हांडी बार बार नहीं चढाई जा सकती परन्तु उत्तराखण्ड में भाजपा नेतृत्व बार बार जातिवाद की उस हांडी को चढ़ाने की धृष्ठता कर उत्तराखण्ड में लोकशाही का गला ही घोंट रहा है जिसे प्रदेश की जनता ने ठुकरा दिया है। खासकर खंडूडी पर मुख्यमंत्री के रूप में जातिवाद -क्षेत्रवाद व अलोकशाही के आरोप लगे थे। इसी कारण प्रदेश की जनता ने लोकसभा चुनाव में पूरी तरह से सफाया ही कर दिया था। क्या खंडूडी को सत्तासीन करने के भाजपा नेतृत्व का दाव, जातिवाद -क्षेत्रवाद व भ्रष्टाचार से बुरी तरह से आहत प्रदेश की जनता के जख्मों को कुरेदने वाला आत्मघाति कृत्य ही साबित होगा। प्रदेश में ईमानदार जननेता के नाम से ख्यातिप्राप्त कोश्यारी, वरिष्ठ भाजपा नेता केदार सिंह फोनिया आदि नेताओं को नजरांदाज करके फिर से खंडूडी को ही मुख्यमंत्री बनाने का भाजपा का दाव, प्रदेश में होने वाले विधानसभाई चुनाव में लोकसभा की तरह पूरी तरह आत्मघाति ही साबित होगा। प्रदेश की जनता किसी भी कीमत पर जातिवादी, भ्रष्टाचारी व क्षेत्रवादी नेता के बजाय विकासोनुमुख साफ छवि का जमीनी पकड़ वाला मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं। प्रदेश की राजनीति में भाजपा की जातिवादी व थोकशाही उत्तराखण्ड की लोकशाही पर एक प्रकार का ग्रहण ही साबित हो रही है।
गौरतलब है कि मण्डल कमीशन के लागू होने के बाद पूरे भारत में एकमात्र उत्तराखण्ड ही देश का एक राज्य है जहां बहुसंख्यक समाज शासन प्रशासन से षडयंत्र के तहत बलात दूर रखा गया। इसके लिए प्रदेश की जनता को कांग्रेस व भाजपा दोनों ही गुनाहगार नजर आती है। क्योंकि जिस प्रकार से कांग्रेस ने उत्तराखण्ड विरोधी रहे नारायणदत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनाया, जबकि उस समय अधिकांश जनता तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हरीश रावत को प्रदेश का मुख्यमंत्री देखना पसंद कर रही थी। तिवारी के कुशासन को सबक सिखाते हुए प्रदेश की जनता ने जब कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंका तो भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष भगतसिंह कोश्यारी को प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाने के लिए भाजपा के अधिकांश विधायकों की पहली पंसद होने के बाबजूद जिस प्रकार से भाजपा नेतृत्व ने खंडूडी जी को ईमानदार व कुशल प्रशासक के नाम पर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन किया , तो जनता अपने आप को ठगी सी महसूस करने लगी। उसके बाद प्रदेश के मंत्रीमण्डल गठन से लेकर शासन प्रशासन में खंडूडी जी ने प्रदेश के ईमानदार वरिष्ठ भाजपा नेता केदारसिंह फोनिया व जमीनी नेता मोहनसिंह ग्रामवासी व मुन्ना सिंह चोहान आदि को नजरांदाज किया, उससे प्रदेश की जनता में राष्ट्रवाद के नाम पर भाजपा का घिन्नौना जातिवादी चैहरा देख कर भौचंक्के से रह गये। उनके अलोकशाही प्रवृति से न केवल आम जनता अपितु भाजपा के कार्यकत्र्ता ही नहीं विधायक व उनके मंत्रीमण्डल के साथी भी बेहद आहत थे। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के नाम पर प्रदेश में भाजपा के उप प्रभारी व सारंगी के गठजोड़ ने राजनीति में उनके कट्टर समर्थकों का भी खंडूरी से मोह भंग हो गया। उनको बदलने के अधिकांश विधायकों की पुरजोर मांग को दर किनारा करते देख कर प्रदेश की जनता ने लोगसभा चुनाव में भाजपा का पूरा सफाया ही कर दिया। उसके बाद जनभावनाओं को सम्मान करने की गुहरा लगाते हुए जब विधायकों की फरियाद को भाजपा आला नेतृत्व ने दरकिनारे कर दिया तो मजबूरी में कोश्यारी ने राज्यसभा की सांसदी से इस्तीफा दे डाला , जिससे मजबूरी में भाजपा नेतृत्व ने खंण्डूडी को तो प्रदेश के ताज से बेताज कर दिया परन्तु जननेता व साफ छवि के भगतसिंह कोश्यारी को, (जो संघ के सबसे वरिष्ठ समर्पित स्वयंसेवक भी हैं,) अपमानित व दण्डित करने के लिए जनता की नजरों में पहले से दूर हुए निशंक को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना कर उत्तराखण्डियों को अचम्भित सा कर दिया। प्रदेश की जनता निशंक के तमाम तिकडमों के बाबजूद उनको किसी भी रूप में मुख्यमंत्री के रूप में दिल से स्वीकार नहीं कर पाये।
शायद भाजपा में निशंक के संरक्षक बने भाजपा के आला नेताओं को आगामी विधानसभा चुनाव में निशंक की सरपरस्ती में पार्टी का लोकसभा की तरह सफाया होने की आशंका सत्ता ही रही थी कि उस आशंका को पार्टी द्वारा गुपचुप कराये गये सर्वेक्षण ने तो उनकी नींद ही उडा दी। जैसे ही निशंक सरकार में हो रहे भ्रष्टाचार पर केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा मूक समर्थन देने के कारण इस पूर्व सैनिक बाहुल्य प्रदेश में भाजपा के पूर्व सांसद ले. जनरल टीपीएस रावत ने पार्टी से इस्तीफा देकर पूरे प्रदेश में भाजपा का मुखोटा पूरी तरह से बेनकाब कर दिया। इसी भारी दवाब से मजबूर आला नेतृत्व ने रहा सहा जनाधार बचाने के खातिर खंडूडी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने का मन बनाया। इस पर निर्णय चंद मिनटों या दिनों बाद इस फेसले का ऐलान कर सकते है। परन्तु सवाल प्रदेश की उस जनता का है जिसने खंडूडी के अलोकशाही वृति के कारण लोकसभा चुनाव में प्रदेश से भाजपा का सफाया कराया था। प्रदेश की जनता जो प्रदेश के हितों पर खंडूडी द्वारा निशंक को प्रदेश का भाग्य विधाता बनाये जाने से बेहद आहत हैं, वे इस बात से हैंरान थे कि खंडूडी ने जातिवाद व क्षेत्रवाद में धृतराष्ट्र बन कर निशंक को प्रदेश के मुख्यमंत्री की ताजपोशी की थी। जब निशंक ने अपना असली चेहरा खंडूडी को ही दिखाया तो खंडूडी को तब अपनी भूल का अहसास हुआ। परन्तु उनमें इतना नैतिक साहस भी नहीं रहा कि वे प्रदेश की जनता से अपने कृत्य के लिए माफी मांगते हुए निशंक के कुशासन से मुक्ति दिलाने की अपनी तमाम गुहारों को नजरांदाज कर रहे आला नेतृत्व से अपने सीनियर जनरल टीपीएस की तरह दलगत निहित स्वार्थों से उपर उठ कर उत्तराखण्ड की रक्षा के लिए एक वीर सैनिक की तरह खुल कर मैंदान में उतरने का साहस दिखाते। अपनी पदलोलुपता व दलीय स्वार्थो के लिए अपने मुख्यमंत्री काल में भी परिसीमन के दंश से उत्तराखण्डी की रक्षा करने, मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित कराने, प्रदेश की राजधानी गैरसैंण बनाने आदि महत्वपूर्ण मुद्दो पर शर्मनाक मूक रहे। अब निशंक द्वारा प्रदेश की राजसत्ता से दूर किये जाने पर उनकी जो छटपटाहट दिखी वह केवल पदलोलुपता के लिए। इसमें भ्रष्टाचार का कहीं दूर दूर तक रिस्ता नहीं। अगर वे इतने संवेदनशील होते तो अपने शासनकाल में उन्होंने न तो कांग्रेस शासन काल में हुए 52 घोटालों की जांच के लिए कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लिया। यहीं नहीं वे सारंगी के मोह में मूक रहे। केवल उनको एक ही बात का अहसास हुआ होगा कि सत्ता रहते हुए जनता को अपनी जनरली हनक नहीं दिखानी चाहिए। अबस सवाल यह है कि क्या भाजपा नेतृत्व का राष्ट्रवाद केवल जातिवाद ही है। क्या उनको जाति विशेष के अलावा अन्य जाति के लोगों की प्रतिभा पर विश्वास नहीं है। प्रदेश की जनता उनसे एक ही सवाल कर रही है क्या भाजपा सदियों से एक परिवार की तरह आपस मे मिल जुल कर रहने वाले उत्तराखण्डी समाज में जातिवाद का घिनौना जहर अपने संकीर्ण दलीय व जातिवादी संकीर्णता के खातिर घोल रही है। प्रदेश की जनता जनहितों के लिए समर्पित रहे स्व. बहादूर राम टम्टा जेसे नेतृत्व को सहज ही स्वीकार करती रही परन्तु वह कभी उत्तराखण्ड विरोधी रहे तिवारी व संकीर्ण अलोकशाही प्रवृति के भुवनचंद खंडूडी को कतई स्वीकार नहीं कर सकती। निशंक को तो प्रदेश का आम आदमी भी नेतृत्व की बागडोर सोंपने के भाजपा नेतृत्व के निर्णय को अभी तक दिल से स्वीकार नहीं कर पाया। कुल मिला कर भााजपा नेतृत्व का राष्ट्रवाद व भ्रष्टाचार विरोधी असली चेहरा देख कर भौचंक्के ही रह गये है ।
एक बात भाजपा नेतृत्व को समझ लेना चाहिए कि प्रदेश की जनता किसी को भी प्रदेश में भ्रष्टाचार, जातिवाद व क्षेत्रवाद का कलंक लगाने के कृत्य को सहन करने के लिए कभी तैयार नहीं है। प्रदेश में जनता न तो बहुसंख्यकों पर आधारित अंधजातिवाद ही स्वीकार करेगी व नहीं प्रतिभाहीन व जनहितों के विरोधी किसी जातिविशेष का राज ही स्वीकार करेगी। प्रदेश में जाति, क्षेत्र, धर्म व भाई भतीजावाद से आधार पर पक्षपात वाला शासन एक पल के लिए स्वीकार नहीं करेगी। जिन लोगों के दामन भ्रष्टाचार, उत्तराखण्ड राज्य गठन की मूल अवधारणा के खिलाफ कार्य करने व दुराचार से दुषित हो उसे किसी भी कीमत पर प्रदेश का नेतृत्व करने की भाजपा कांग्रेस सहित तमाम राजनैतिक दलों की थोपशाही का पुरजोर विरोध किया जायेगा। खासकर उत्तराखण्डी सदैव स्वाभिमानी हैं उसको धन व पद की धौंस से खरीदने का दीवास्वप्न देखने वालों को सदैव मुंह की ही खानी पड़ेगी। आशा है खंडूडी जी को निशंक प्रकरण से सबक सीखने के बाद अब अपने दूसरे कार्यकाल में पूर्व कार्यकाल में लगे तमाम आरोपों को झुटलाते हुए प्रदेश के हितों की रक्षा के लिए समर्पित हो कर कार्य करेंगे। उनसे प्रदेश की जनता आशा कर रही है कि वे कार्यभार संभालने के एक पखवाड़े के अंदर निशंक सरकार के कार्यकाल में हुए तमाम घोटालों की सार्वजनिक जांच कराते हुए निशंक को मधु कोडा की तरह शिकंजें में जकड़ना चाहिए। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय नमो।

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