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Wednesday, September 7, 2011

स्वयंभू कहारों को न सम्मान मिलता है व नहीं हक

स्वयंभू कहारों को न सम्मान मिलता है व नहीं हक/
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के बहाने/


दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव परिणाम ने आखिरकार कांग्रेस की नाक बचा ली। नाक कटने से सहमें दिल्ली के दिग्गज कांग्रेसी नेताओं को इस बार अण्णा फेक्टर के प्रभाव से आशंकित थे। अण्णा फेक्टर के बाबजूद दिल्ली विश्व विद्यालय चुनाव में प्रतिष्ठित अध्यक्ष के पद पर कांग्रेस के अजय चिकारा ने भाजपा छात्र संगठन की प्रत्याशी नेहा सिंह को 2362 मतों से हरा दिया। हालांकि 81 हजार मतदाताओं में से इस बार 31 हजार मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया। कांग्रेस की तो लाज बच गयी पर इस चुनाव में उत्तराखण्डी समाज को भी मंथन करने के लिए मजबूर कर दिया । दिल्ली विश्वविद्यालय में उत्तराखण्डी छात्र बड़ी संख्या में अध्ययनरत है। इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास में जब से भाजपा कांग्रेस ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर अपने बड़े नेताओं को इस चुनाव में प्रचार के लिए उतारना शुरू किया तब से अब तक केवल एक ही समय उत्तराखण्डी छात्र नेता मदन सिंह बिष्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव में भाजपा व कांग्रेस को पटकनी देते हुए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ऐतिहासिक विजय हासिल की। इसके बाद कांग्रेस व भाजपा का रूझान उत्तराखण्डी छात्रों की तरफ गया परन्तु कुछ सालों से उत्तराखण्डी छात्रों को पुरी तरह से नकारा जा रहा है। इससे समाज के लिए समर्पित लोगों में काफी निराशा व आक्रोश भी है।
गत कई सालों की भांति इन चुनावों में समर्पित रहने वाले कांग्रेसी नेता हरीश रावत ने भी अपनी भागेदारी निभाई। दिल्ली विश्वविद्यालय चुनाव में कांग्रेसी छात्र संघ के प्रत्शाशियों के समर्थन के लिए कांग्रेसी दिग्गज ं नेता व केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत ने भी 5 सितम्बर को दिल्ली स्थित अपने सरकारी आवास में उत्तराखण्ड एक उत्तराखण्डी समाज की बैठक की। इस बैठक को देखने में भी वहां उपस्थित था कि मुझे अपने एक दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति में गत एक दशक से जुडे हुए पूर्व कांग्रेसी छात्र नेता का फोन आया‘ ‘ उन्होंने दो टूक बात कही रावत जी कितने उत्तराखण्डियों को कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया जो मंत्री जी समाज से कांग्रेस को मतदान करने का आवाहन कर रहे है। उन्होंने कहा अगर ये नेता जो समाज के ठेकेदार बनते हैं वे दिल्ली विश्वविद्यालय में हजारों की संख्या में अध्ययनरत उत्तराखण्डियों को छात्र संघ का प्रत्याशी बनाने में ईमानदारी से जोर लगाते तो आज दिल्ली विश्व विद्यालय के चुनावों की तस्वीर ही अच्छी होती। मैंने कहा भई आप कह तो सही रहे हो मैं तो पेशे के कारण केवल देखने आया हूॅ, वेसे दिल्ली विश्व विद्यालय में कोई जागरूक छात्र आज की परिस्थितियों में कांग्रेस को वोट देगा यह मेरी समझ से परे है। रही बात उत्तराखण्डियों की तो एक बांत है कि स्वयंभू कहारों को न तो प्रतिनिधित्व मिलता है व नहीं हक। वेसे भी लोकशाही में या तो प्रतिभा का सम्मान हो या भागीदारी का। परन्तु इसका भान न तो आज किसी पार्टी को है व न समाज के स्वयं भू ठेकेदारों को । इन छात्र संघ के समर्थन में आयोजित सभा में आयोजक केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत, सांसद प्रदीप टम्टा, सांसद महाबल मिश्रा तो अण्णा हजारे के जनांदोलन पर कांग्रेसी पक्ष को जायज ठहराते ही रहे, ये नेता भूल गये कि आज देश की जनता ने इनकी सरकार की इन थोथे तर्कों को पुरी तरह से नकार दिया है। वहीं कांग्रेस के जन नेता आस्कर फर्नाडिस ने सटीक बात रखते हुए कांग्रेसी प्रत्याशियों के समर्थन की बात कही। वहंीं दिल्ली के लोगों को अपने कुशासन से खून के आंसू रूलाने वाली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी जब यहां पंहुची तो मेजवान केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत देश पर भ्रष्टाचार का बदनुमा कलंक लगाने वाले कोमनवेल्थ खेलों के आयोजन में शीला दीक्षित की सराहनीय भूमिका का यशोगान करते हुए शायद यह भी भूल गये थे कि देश की जनता अब सब कुछ जानती है। उत्तराखण्डी समाज के सबसे जनाधार वाले नेताओं में अग्रणी हरीश रावत हालांकि समाज के जोडने के लिए आये दिन कोई न कोई आयोजन करके समाज को जोड़ने का सराहनीय कार्य करते हैं परन्तु उनको यह भी याद रखना चाहिए कि अगर वे समाज के समर्थन का आवाहन किसी पार्टी विशेष से करते हैं तो उस पार्टी विशेष से समाज का हक व उचित प्रतिनिधित्व दिलाने का महत्वपूर्ण दायित्व भी उनके कंधों में होता है। दिल्ली के आम उत्तराखण्डियों के सुख दुख का अगर कोई एक नेता दशकों से रहनुमा है तो हरीश रावत, हालांकि अब भाजपा नेता भगतसिंह कोश्यारी भी लोगों के बीच अपनी जगह बना रहे है, इसके अलावा कोई नेता न तो सतपाल महाराज व नहीं विजय बहुगुणा आदि लोगों के दिल्ली के बीच अपना स्थान तक नहीं बना पाये। इसलिए हरीश को समझना होगा कि दलगत राजनीति से उपर उठ कर समग्र समाज को सम्मान व प्रतिनिधित्व दिलाने की आश उत्तराखण्डियों को उनसे ही है। दिल्ली में सांसद के प्रत्याशी के तौर पर किसी एक उत्तराखण्डी को दिलाने का पुरजोर दावा करना तो रहा दूर दिल्ली में यहां की भाजपा व उनकी खुद की कांग्रेस पार्टी भी बगलें झांकने लगती है। भाजपा तो फिर भी नाम लेने के लिए प्रत्याशी बना भी लेती है परन्तु कांग्रेस को लगता हैं शीला व सिब्बल की बिरादरी के अलावा दिल्ली में न तो कोई समाज दिखाई देता व नहीं दिल्ली सरकार में मंत्री तक बनाने की जरूरत महसूस होती। दिल्ली नगर निगम ंमें तक एक दो प्रत्याशी देने तक में कांग्रेसी नेताओं को जरूरत महसूस नहीं होती। ऐसे मेें क्यों इन दलों को जो उत्तराखण्डी समाज या आम लोगों के लिए ठेंगा दिखाने के अलावा दूसरा कुछ नहीं रखते उनका स्वयंभू कहार क्यों बना जाय? यह सवाल आज सबको अपने समाज के ठेकेदारों से करनी चाहिए।

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