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Monday, March 12, 2012

एक साल पहले से ले लिया गया था बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने का निणर्य


एक साल पहले से ले लिया गया था बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने का निणर्य
भले ही कांग्रेस आला कमान ने सांसद विजय बहुगुणा को उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान 12 मार्च 2012 की सांय 6.3 बजे के बाद किया हो परन्तु  विजय बहुगुणा को ही मुख्यमंत्री बनाने का फेसला कांग्रेस आला नेतृत्व के सबसे ताकतबर नेताओं ने एक साल पहले ही ले लिया था। इस रणनीति का खुलाषा प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र में मैने पहले भी किया था कि तिवारी के सबसे करीबी सलाहकार रहे आर्येन्द्र षर्मा को इसी रणनीति के तहत सहसपुर से कांग्रेसी टिकट का दावेदार बनाया गया। आर्येन्द्र षर्मा व विजय बहुगुणा की जुगलबंदी का मुख्य कथा ही मुख्यमंत्री का पद विजय बहुगुणा बनाने के लिए रची गयी। आर्येन्द्र को इसी आधार पर विजय बहुगुणा ने अपनी संसदीय सीट से विधानसभा का प्रत्याषी बनाया कि तिवारी जी की पकड़ का इस्तेमाल वे विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने के लिए करेंगे। नहीं तो आर्येन्द्र ने तो प्रदेष का मूल निवासी ही है व नहीं कांग्रेस का नेता ही रहा।  विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने की व्यूह रचना के तहत कांग्रेसी नेता विजय बहुगुणा की संसदीय सीट के अन्तर्गत आने वाली सहसपुर विधानसभा से कांग्रेसी नेताओं को दरकिनारे करके टिकट नवाजा गया। इस अभियान में प्रदेष प्रभारी व केन्द्रीय महासचिव चैधरी बीरेन्द्रसिंह का पूरी सहभागिता रही। इसी के तहत न केवल सहसपुर अपितु रायपुर की सीट भी कांग्रेसी वरिश्ट नेता की यहां से टिकट यहां से काट कर दिया गया। इसके साथ कांग्रेस के खिलाफ तिवारी के विद्रोह का भय दिखा कर तिवारी के कहने पर 4 टिकटें उनके भतीजे व समर्थकों को दी गयी।  तिवारी के समर्थकों को दी गयी अधिकांष सीटों पर कांग्रेस को मुंह की खानी पडी। परन्तु कांग्रेसी अन्य दिग्गजों को इस शडयंत्र का प्यारा उत्तराखण्ड द्वारा खुलाषा किये जाने के बाद भी तनिक सा भी भान नहीं लिया। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राहुल गांधी से लेकर अधिकांष नेताओं की सभायें भी इसी क्षेत्र में कराई गयी। जबकि प्रदेष के मुख्यमंत्री खंडूडी के खिलाफ कोटद्वार से चुनाव लड़ रहे कांग्रेसी प्रत्याषी की तमाम मांग के बाद बडे नेताओं को इस क्षेत्र में सभा करने के लिए नहीं लाया गया। गौरतलब है कि भुवनचंद खंडूडी , विजय बहुगुणा के पुफेरे भाई है। सहसपुर कांग्रेस की सबसे सरल सीट थी। दलित व मुस्लिम मतदाताओं की भारी संख्या के बाबजूद लोगों ने कांग्रेसी प्रत्याषी को नक्कार दिया।  कांग्रेसी नेता हरीष रावत, सतपाल महाराज, यषपाल आर्य व हरक सिंह रावत को चुनाव परिणाम आने के बाद भी मुख्यमंत्री बनाने की छदम् प्रतियोगिता में आपस में जानबुझ कर एक दूसरे से उलझाया गया।
कांग्रेसी नेताओं को भरमाया गया कि मुख्यमंत्री सांसदों में से नहीं बनाया जायेगा। एक दूसरे के विरोध कराने का काम कांग्रेस के आला नेतृत्व के करीबी सलाहकारों ने किया। पूरे 5 दिन तक इस प्रक्रिया में जहां विजय बहुगुणा के नाम के साथ आष्चर्यजनक से इंदिरा हेदेष का नाम भी चर्चा में चलाये रखा। जबकि विजय बहुगुणा अपने संसदीय सीट में आधे विधायक भी नहीं जीता पाये। वहीं इंदिरा हृदेष के समर्थन में तीन विधायक भी नहीं रहे। वहीं दूसरी तरफ 18 विधायकों के समर्थन हाषिल करने वाले हरीष रावत व 11 में से 10 विधायकों को विजयी बनाने वाले सतपाल महाराज को जानबुझ कर एक दूसरे से उलझाये रखा। उनको एक दूसरे के विरोध का हवाला देकर विजय बहुगुणा के करीब लाने का प्रयाष किया गया।
सोनिया गांधी के संकीर्ण पदलोलुपु दिल्ली दरवार के मठाधीषों ने प्रदेष में कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीष रावत व सतपाल महाराज को दर किनारे करके विजय बहुगुणा को बनाने के लिए कांग्रेस के जड़ों में मटठा डालने का काम किया। उसका भान सोनिया गांधी को समय रहते न लगा यही उनकी असफलता का मूल कारण है। कांग्रेस आला नेतृत्व को अपने इन सलाहकारों को तलब करके पूछना चाहिए कि क्यों इस शडयंत्र का ताना बाना बुन कर कांग्रेस की जड़ों में मटठा डाला गया।

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