काश भाजपा विधायक महाकाल के साथ पटवारी जी के भी दर्शन करते

-काश भाजपा विधायक महाकाल के साथ पटवारी जी के भी दर्शन करते
-महाकाल की नगरी में प्रकट हुए पटवारी


महाकाल की नगरी उज्जैन में अभी इसी पखवाडे भारतीय जनता पार्टी ने अपने सभी विधायकों को महाकाल के दर्शन कराने का भी काम किया था। मुझे पक्का यकीन है कि यहां पर वे महाकाल के ही दर्शन करने गये होगे। उन्होने उज्जैन के पटवारी के दर्शन तो कर ही नहीं पाये होंगे। करते कैसे किसी को इसी भनक तक नहीं लगी होगी। लगती कैसे सबका भला ही शरीर महाकाल की नगरी में था परन्तु मन में तो लड्डू उत्तराखण्ड में सत्ता की मलाई का छिंके पर होगा। काश विजय बहुगुणा के हाथों में आया यह प्रदेश की सत्ता की छिंक्का किसी तरह से छटक कर भाजपा के हाथों में आ जाय। उपर वाले ने भी भाजपा व कांग्रेस को कितना असहाह कर दिया 31 व 32 के चक्कर में फंसा कर। कभी बसपा की आरती करनी पड रही है तो कभी निर्दलीयों की तो कभी उक्रांद की। क्या क्या नजरे इनायत करने में प्रलोभनों की पूरी दुकान सजानी पड़ रही है। काश महाकाल भाजपा को एक और विधायक दे देता। 32 भाजपा को तो 31 कांग्रेस को कर देता तो फिर भी काम बन जाता। परन्तु लगता है महाकाल भाजपा से नाराज था। इसी लिए शायद भाजपा वाले महाकाल की शरण में अपने विधायकों को लाये थे। वैसे मैं इन अफवाओं में कतई विश्वास नहीं करता कि भाजपा का आला नेतृत्व कांग्रेसी मोहपाश से बचाने के लिए अपने विधायकों को एकजूट रख कर उज्जैन ले गये। सुनने में यह आ रहा था कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा किसी भाजपा विधायक पर डोरे डाल रहे है। क्योंकि निर्दलीय सहित कांग्रेसी विधायक तो रहे उनके लिए अपनी सीट छोड़ने वाले। इस लिए वे भाजपाई नेता पर उसी तरह डोरे डाल रहे हैं जिस प्रकार उनके पुफेरे भाई भुवनचंद खंडूडी ने कांग्रेसी विधायक जनरल रावत पर डोरे डाले थे। परन्तु बहुगुणा पहाड़ से चुनाव लड़ने का साहस तो कम से कम कोटद्वार के चुनाव परिणाम के बाद करेंगे नहीं। इसलिए भाजपा के तराई क्षेत्र के विधायक पर ही वे डोरे डालेगे। यह विधायक कौन होगा लोग कायश लगा रहे है। कोई देहरादून का ही बता रहे है। भले ही हम इसे आशंका मान कर बेफ्रिक हो कर सौ रहे हों परन्तु गडकरी जी को नींद कहां आ रही है। खंडूडी के खिलाफ जब से उत्तराखण्ड के कोटद्वार की जनता का फतवा आया कि वे किसी भी रूप में यहां जरूरी नहीं है तब से गड़करी की दिन की नींद भी उड गयी है। हालांकि रात की नींद तो पहले ही कांग्रेसियों के भय से नहीं अपितु अपने आला नेताओं के भीतर घात के कारण उनकी उडी हुई है। शायद उनकी स्थिति देख कर ही भाजपा के उत्तराखण्ड के जनरल खंडूडी व भाजपा के सुशासन के गंगा नहाये हुए नेता निशंक ने एक दूसरे पर भीतरघात का आरोप लगा कर गड़करी के दुखती रग को छूने की कोशिश की।
हाॅं हम यहां बात कर रहे थे भाजपा के नेताओं के उज्जैन दौरे की। वे भक्ति भाव से तो कभी उज्जैन जाते नहीं। क्योंकि उत्तराखण्ड में 33 करोड़ देवी देवता सभी रहते है। खुद मध्य प्रदेश की दिग्गज नेत्री उमा भारती, जिनके भाजपा में पुन्न प्रवेश से भाजपा के कई आला नेताओं का स्वास्थ्य ही खराब हो गया है, उमा भारती पर जब भी राजनैतिक संकट के बादल उमडते तो वे अवश्य देवभूमि उत्तराखण्ड में भगवान शिव के पावन धाम केदारनाथ या मदमहेश्वर में तप करने चले जाती हे।
वैसे उन्हें तब तक उन्है महाकाल की नगरी के अदने से इस पटवारी या अन्य भ्रष्टाचारियों की भनक तक नहीं लगी होगी। मैं नहीं समझता कि वे भ्रष्टाचारियों के दर्शन करने गंगा के प्रदेश से यहां आते। उत्तराखण्ड में भी भ्रष्टाचारियों की कोई कमी नहीं। यहां कोई ऐसा संस्थान नहीं जहां इनका साक्षात दर्शन न हो जाता हो। क्या भगवान का धाम होे या श्मसान सभी जगह ये शक्तिमान की तरह विराजमान है। मुझे तो कुछ साल पहले भगवान शिव के पावन धाम केदारनाथ में हुए भ्रष्टाचार के मामले के खुलासे ने चैक्कना कर दिया। मुझे समझ में आ गया कि भगवान की तरह ही भ्रष्टाचार अब इस धरती के कण कण में विद्यमान है। यहां पर किसी को विश्वास नहीं तो ग्राम प्रधान से लेकर यहां के विधायक मंत्री बने नेताओं तथा सरकारी कर्मचारियों की चंद सालों की जन्मपत्री ही खंडाल लिजिये। प्रदेश के अधिकांश नेताओं को चंद सालों मे ंसडक पति से अरबपति जिन आंखों ने देखा होगा वह आंखे हर पल भ्रष्टाचारी देवी के साक्षात दर्शन के लिए तरस रही होगी।
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार की ऐसी गटर बह रहा है, उसमें नेता क्या सरकारी कर्मचारी सहित सभी वर्ग के एक से एक भ्रष्टाचारी अपना एक अलग ही रिकार्ड बना रहे है। महाकाल की नगरी उज्जैन में इस सप्ताह जब भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लोकायुक्त पुलिस ने एक पटवारी पर छापा मारा तो उसकी आंखे भी फट्टी की फट्टी रह गयी।
उज्जैन में ही नहीं मध्य प्रदेश में एक के बाद एक अदने से अधिकारी भी करोड़पति निकल रहे रहे है। कभी कोई लिपिक तो कभी कोई चपरासी, अधिकारियों लोकायुक्त पुलिस ने जिले के तराना तहसील मुख्यालय पर पदस्थ पटवारी के यहां सोमवार 26 मार्च को छापा मारकर आय के ज्ञात स्रेतों से अधिक अब तक लगभग चार करोड़ रुपए की सम्पत्ति का पता लगाया है,। जबकि छापे की कार्रवाई अभी जारी है। लोकायुक्त उज्जैन के पुलिस अधीक्षक अरुण मिश्र ने संवाददाताओं को बताया कि सूचना के आधार पर कार्रवाई करते हुए टीम ने तराना में पटवारी बाबूलाल कामरा के यहां छापा मारा, जिसमें आय के ज्ञात स्रेत से अधिक अब तक लगभग चार करोड़ रुपए की सम्पत्ति का खुलासा हो चुका है, जबकि 25 साल की नौकरी में उसका कुल वेतन 15 लाख रुपए से अधिक नहीं बनता है। उन्होंने बताया कि पटवारी के यहां से अब तक तराना एवं उज्जैन में दो मकान, उसके अपने, पत्नी एवं पुत्र के नाम पर दो गांवों में 22 एकड़ जमीन, चार पहिया दो वाहन, दो पहिया दो वाहन, लगभग 15 लाख रुपए मूल्य के स्वर्ण एवं चांदी के आभूषण, पांच लाख रुपए की जीवन बीमा पालिसियां, आठ बैंक खाते एवं कुछ लाकर शामिल हैं लेकिन लाकर अभी खोले नहीं गए हैं। वैसे महाकाल को नगर का कौतवाल भी कहा जाता है। पटवारी शब्द का प्रयोग भी इसी संदर्भ में फिरगी काल में किया जाता था, तब से यह शब्द भारतीय मानस पटल पर जम गया। पटवारी का किसी जमाने में ऐसा दबदबा था बैसे आज डीएम का दबदबा अपने जनपद में भी नहीं होता है। वेसे अपने मुख्यमंत्री के दादा जी भी शायद पटवारी ही थे। वे तो बहुत ही सज्जन व धार्मिक आदमी थे। वे कभी अन्याय को बर्दास्त नहीं करते। वे अपनों पर अपनों के द्वारा किये गये अन्याय से बहुत ही व्यथित थे। भाजपा के विधायकों व नेताओं को भले भान हो या न हो परन्तु महाकाल को जरूर ख्याल रहा। महाकाल की नगरी में पटवारी जी प्रकट हो गये। परन्तु ये तो भ्रष्ट पटवारी प्रकट हुए। वेसे यह कलयुग है। भारत भी विश्व के भ्रष्टतम देशों में अग्रणी पंक्ति के देश के रूप में उसी प्रकार सिरमोर बना है जिस प्रकार 12 साल के गठन के दौरान ही भारत में सबसे भ्रष्टतम राज्यों में उत्तराखण्ड विराजमान हो गया है। भहाकाल को भैरव के रूप में भी पूजा जाता है। भैरव तत्काल अपने भक्तों की फरियाद सुनता है। लगता है भाजपा भी उत्तराखण्ड की सत्ता को फिर से प्राप्त करने के लिए लालायित है। उसमें सब्र नहीं रह गया। इसी लिए महाकाल की शरण में गये। परन्तु जब महाकाल के प्रसाद से यहां की सत्ता हासिल की तो तब महाकाल के बजाय वे खण्डूडी के राग गाने लगे, शायद इसी कारण महाकाल इनके कारनामों को देख कर नाराज हो गया। उन्हीं को मनाने के लिए शायद भाजपा वाले उज्जैन गये परन्तु वहां पटवारी प्रकट हो गये। अब देखना है पटवारी के प्रकट होने का क्या प्रभाव उत्तराखण्ड सहित देश की राजनीति में पडता है।

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