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Thursday, June 21, 2012

डिम्पल की तरह निर्विरोध चुनाव जीतने की विजय बहुगुणा की हसरत पर लगा ग्रहण


सितारगंज (प्याउ)। सितारगंज उपचुनाव में अंतिम दिन भाजपा, उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा, किसान मोर्चा व जवान किसान मोेर्चा के प्रत्याशियों सहित कई निर्दलीय प्रत्याशियों के नामांकन पत्र दाखिल करने के कारण सितारगंज उपचुनाव में प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की उप्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव की तरह निर्विरोध ही उप चुनाव जीतने का कीर्तिमान स्थापित करने की हसरत पर ग्रहण ही लग गया। हालांकि मुख्यमंत्री के सिपाहेसलार इस दिशा मेें काफी प्रयास कर रहे थे कि मुख्यमंत्री विजय के खिलाफ कोई राजनैतिक दल अपना प्रत्याशी ही ना उतारें। निर्लदलीयों को उप्र के मुख्यमंत्री डिम्पल यादव के उपचुनाव में उठे निर्दलीय प्रत्याशियों को अपना नामांकन वापस करने के लिए मना लिया जाता। हालांकि इस बात के भी कई गुपचुप प्रयास भी किये गये कि भाजपा सितारगंज विधानसभा उप चुनाव में प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के खिलाफ भी डिम्पल यादव की तरह अपना प्रत्याशी ही चुनाव मैदान में न उतारें। यही अपेक्षा बहुगुणा समर्थकों की अन्य दलों से भी थी। इस दिशा में मुख्यमंत्री खेमें को काफी सफलता भी मिली इस सीट से सबसे मजबूत समझी जाने वाली बसपा ने भी अपना प्रत्याशी चुनावीं दंगल में न उतारा हालांकि उनके दिग्गज नेता नारायण पाल को कांग्रेस ने अपने समर्थन में खडा करके बसपा को प्रदेश में करारा झटका दे कर गठबंधन दलों में सेंध लगाने का कृत्य तक किया था। वहीं सपा के प्रत्याशी का यहां से चुनावी दंगल में न उतरने पर लोगों को किसी प्रकार का आश्चर्य तक नहीं हुआ। क्योंकि मुलायम व बहुगुणा परिवार का काफी घनिष्ट सम्बंध रहा है। वहीं प्रदेश में सपा के नेता के साथ विजय बहुगुणा की करीबी जगजाहिर है। इसके अलावा इस सीट से उक्रांद पी का चुनावी दंगल में न उतरना भले ही गठबंधन की मर्यादा का हवाला दे कर उत्तराखण्ड क्रांतिदल नेतृत्व बहुगुणा के समर्थन में अपना प्रत्याशी न उतार कर लोगों की जुबान बंद कराने की कोशिश कर रहा हो परन्तु जिस प्रकार से स्वयं उक्रांद ने भी विजय बहुगुणा के सितारगंज में शक्ति फार्म के बंगाली लोगों को भूमिधरी के पट्टे का वितरण अपनी चुनावी नैया को पार लगाने के लिए किया उसका उक्रांद ने केवल हवाई विरोध किया। अगर उक्रांद जरा सा भी ईमानदार होती या उसको उत्तराखण्ड के उन हितों की जरा सी भी चिंता होती तो वह चुनावी दंगल में उतरती। यही नहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने भी यहां से अपना प्रत्याशी न उतार कर विजय बहुगुणा समर्थकों की यहां से निर्विरोध विजयी होने की मंशा को पंख अवश्य लगाये।
परन्तु विजय बहुगुणा खेमे को उस समय काफी करारा झटका लगा जब यहां से तमाम कोशिशों के बाबजूद भाजपा ने यहां पर अपना प्रत्याशी प्रकाश पंत के रूप में सितारगंज उप चुनाव में उतार दिया। वहीं सितारगंज विधानसभा में भारी संख्या में रहने वाला मुस्लिम समाज व कांग्रेस को समर्थन दे चूके नारायण पाल के सिपाहे सलार रहे किसान मुस्लिम नेता मजहर अहमद उर्फ मुन्ना भाई ने उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के प्रत्याशी के रूप में पर्चा दाखिल किया। इसके अलावा निर्दलीय प्रत्याशी मोहम्मद असलम व मोबीन अली,जवान किसान मोर्चा के राजू मौर्य व उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के दीवान सिंह आदि ने पर्चा दाखिल कर विजय बहुगुणा समर्थकों की यहां से विजय बहुगुणा की निर्विरोध निर्वाचित होने आशाओं पर एक प्रकार से बज्रपात ही कर दिया। खासकर जिस उत्साह व जनसमर्थकों के साथ भाजपा प्रत्याशी वरिष्ठ भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भगतसिंह कोश्यारी सहित तमाम वरिष्ठ नेता उपस्थित थे। हालांकि इस पर्दा दाखिली के अवसर पर भाजपाई प्रत्याशी प्रकाश पंत व कार्यकत्र्ताओं को मनोबल ऊंचा करने के लिए विधानसभा चुनाव में भाजपा के सुपर स्टार के रूप में प्रचारित किये गये पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी नजर नहीं आये। गौरतलब है कि कांग्रेसी नेता विजय बहुगुणा व भाजपा नेता भुवनचंद खण्डूडी भले ही एक दूसरे के विरोधी दलों के नेता हों परन्तु उनके बीच ममेरे भाई का रिश्ता प्रदेश की राजनीति में एक नये ही समीकरण को हवा देने वाला अदृश्य गठबंधन कई चुनावों से देखने में आ रहा है। परन्तु इस बार जिस प्रकार से विजय बहुगुणा ने भाजपा के विधायक को तोड़ कर ही भाजपा को खुली चुनौती दी उसके बाद केन्द्रीय नेतृत्व के साथ प्रदेश भाजपा की भृकुटी तननी स्वाभाविक थी। इसी के कारण प्रदेश के तमाम कार्यकत्ताओं की पुरजोर मांग थी कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के खिलाफ हो रहे उपचुनाव में चाहे मुख्यमंत्री जिस सीट पर से ही लडे वहां से भाजपा नेता भुवनचंद खण्डूडी को चुनावी मैदान में उतर कर भाजपा में सेंघ लगाने का विजय बहुगुणा को सबक सिखाना चाहिए था। परन्तु गलता है कि कोटद्वार में मिली खंडूडी को करारी हार के सदमें से अभी भाजपा नेतृत्व नहीं उबर पाया है। नहीं खंडूडी ही इतना साहस ही जुटा पाये कि वे बिजय बहुगुणा के खिलाफ चुनावी दंगल में उतर कर भाजपा में सेंघ मारने की कांग्रेस के कृत्य का मुंहतोड़ जवाब तक दे पाये। हालांकि इन सबके बाबजूद आज के दिन ऐसा लग रहा है कि यहां पर चुनावी जंग में विजय बहुगुणा ही विजय होंगे परन्तु उनके रणनीतिकारों की निर्विरोध चुनाव जीतने की हसरत पर इस सीट से तमाम कोशिशों के बाबजूद कई उम्मीदवारों का चुनावी दंगल में उतरने से ग्रहण लग ही गया। हो सकता है इनमें कुछ प्रत्याशियों का नामांकन रद्द हो या कुछ को बहुगुणा के समर्थन में बिठाने में बहुगुणा के समर्थक सफल रहे परन्तु जिस प्रकार से एक दर्जन से अधिक प्रत्याशियों ने विजय बहुगुणा के समर्थन में अपना नामांकन किया उसके बाद भले ही चुनाव परिणाम में कोई बडा उलट फेर होने की संभावना न भी दिखाई दे परन्तु कांग्रेसी प्रत्याशी की तरफ एक तरफा चुनावी दंगल के बाबजूद कांग्रेस के नेताओं की एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए चल रहे घात प्रतिघात भरी राजनीति विधानसभा चुनाव की तरह इस चुनाव में भी चैकांने वाले परिणाम भी ले आये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। परन्तु एक बात साफ हे कि इस सीट से निर्विरोध चुनाव जीतने की हसरत पूरी न होने का मलाल स्वयं मुख्यमंत्री व उनके समर्थकों को रहेगा

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