Pages

Saturday, June 23, 2012


मोंटेक को वित्तमंत्री बनाने के षडयंत्र को साकार कर पायेगा क्या अमेरिकी 


तमाम आलोचनाओं को दरकिनारे करके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के करीबी मित्र व अमेरिका तथा विश्व बैंक के आंखों के तारे मोंटेक सिंह आलूवालियों को प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने के बाद रिक्त हुए वित्त मंत्री के पद पर आसीन किया जाने का तानाबाना बुना जा रहा है। सुत्रों के अनुसार तमाम कोशिशों के बाबजूद कांग्रेस नेतृत्व जनता व कांग्रेसी कार्यकत्र्ताओं की नजरों में उतर चूके मंहगाई, आतंकवाद, भ्रष्टाचार रूपि कुशासन के जिम्मेदार राजग सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आलुवालिया को ही नहीं बदल पा रही है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व मोंटेकसिंह आलूवालिया दोनों भारतीय राजनीति में अमेरिका की पहली पसंद है। अमेरिका वर्तमान में भी किसी भी तरह नेहरू परिवार के हाथों भारत की सत्ता देखना नहीं चाहता है। क्अमेरिका के रणनीतिकार मानते है कि जब भी भारत में नेहरू परिवार के हाथों में सत्ता की बागडोर रही वह मजबूती से विकास करने के साथ अमेरिका से आंखे दिखाने का ही काम करता है। नेहरू परिवार के हुक्मरानों से वह अपने ऐजेन्डे भारत में लागू नहीं करा पाया। अमेरिका के लाख कोशिशों के बाबजूद अमेरिका खुफिया ऐजेन्सी एफबीआई को भारत में अपना दिल्ली में पांव जमाने की इजाजत एनडीए की वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में ही हासिल कर पायी। वहीं अमेरिका की सलाह पर ही कारगिल के गुनाहगारों जिनको भारतीय सेना ने चारों तरफ से कारगिल क्षेत्र में घेर लिया था, वाजपेयी सरकार ने सुरक्षित पाक जाने की इजाजत दी थी। यही नहीं अमेरिका के इशारे पर ही कंधार विमान अपहरण का शर्मनाक समर्पण किया गया और संसद हमले के दोषी पाक को सबक सिखाने के लिए सीमा पर महिनों तक खडे जांबाज सैनिकों को भारत के सम्मान को अमेरिका के लिए कुर्वान करने वाले वाजपेयी सरकार की नपुंसकता के कारण वापस अपने बेरकों में लोटना पडा। इसके साथ ही इसके बाद केन्द्र की सत्ता में अमेरिका के पसंद पर सत्तासीन हुए कांग्रेस गठबंधन वाले सप्रंग सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने न केवल अमेरिका के दम तोड़ रहे परमाणु कारखानो ंव संयंत्रों को भारत में खपा कर उसकी अर्थवयवस्था को मजबूत करने के नाम पर भारत से परमाणु संधि करने के लिए उतारू अमेरिका की मंशा को पूरी करने के लिए कितनी मेहनत की। यही नहीं मनमोहन सिंह ने कश्मीर के आतंकवाद को शक्ति से कुचलने व मुम्बई में आतंकी हमले करने के दोषी पाक को करारा सबक सिखाने का काम करने के बजाय कश्मीर से अलगाववाद की मानसिकता के समर्थकों को ही वार्ताकार बना कर कश्मीर पर अमेरिकी ऐजेन्डे को लागू करने का काम किया जा रहा है। इसके अलावा जिस प्रकार से मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत आर्थिक ही नहीं सामरिक व राजनैतिक दृष्टि से कमजोर हुआ उससे अमेरिका प्रसन्न है। वह अब किसी भी सूरत पर न तो प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन को बदलना चाहता है व प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने की संभावनाओं को देखते हुए मोंटेक को वित्त मंत्री के पद पर आसीन होते देखना चाहता है।

No comments:

Post a Comment