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Tuesday, June 19, 2012


शंकराचार्य स्वरूपानन्द के गंगा आंदोलन से कांग्रेस सरकार में हडकंप

संसद की चैखट पर उत्तराखण्ड में गंगा में बन रहे अंधाधुंध बांध पर गरजी सुशीला भण्डारी



नई दिल्ली। (प्याउ)। संघ व विश्व हिन्दु परिषद समर्थित भाजपाई नेतृत्व वाले रामजन्म भूमि आंदोलन सहित कई आंदोलनों में कांग्रेस की ढाल बन कर रक्षा करने वाले देश के वयोवृद्ध शंकराचार्य स्वरूपानंद जी महाराज का लगता है कांग्रेसी सरकार से मोह भंग हो गया है। वे गंगा की दुर्दशा को सुधारने के बजाय गंगा पर अनैक बांध बनाने में उतारू कांग्रेसी सरकार से इतने आक्रोशित है कि अपनी बुजुर्ग उम्र व भरी दोपहरी को नजरांदाज करते हुए वे संसद की चैखट जंतर मंतर पर बीच सडक में धरने में बैठ कर आंदोलन का शंखनाद कर गये। शंकराचार्य के इस आक्रोश से सरकार ही नहीं कांग्रेसी नेताओं में हडकंप मचा हुआ है। आजादी के बाद अब तक कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाले देश के वरिष्ठ शंकराचार्य स्वरूपानन्द द्वारा गंगा पर बांध बनाने के लिए उतारू कांग्रेसी सरकार के कार्यो से आक्रोशित हो कर राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर तपती दोपहरी में हजारों साधु संतो व गंगा भक्तों के साथ संसद की चैखट पर धरने पर बैठ गये। स्वयं स्वतंत्रता सैनानी रहे द्वारिका पीठ के शंकराचार्य वयोवृद्ध शंकराचार्य का कांग्रेस में कितना प्रभाव है इसका नजारा धरना स्थल पर साफ दिखाई दिया। जिस मंच पर खुले आम कांग्रेस को भारतीय संस्कृति के मूल प्राण गौ, गंगा व गीता को रौंदने का दोषी बता कर घोर निंदा की जा रही थी उसी मंच पर कांग्रेस के सबसे विवादस्थ दिग्गज नेता दिगविजय सिंह भी शंकराचार्य स्वरूपानन्द के चरणों में मंच में आसीन थे। भले ही उन्होंने इस मंच से कोई सम्बोधन नहीं किया परन्तु उनकी उपस्थिति मात्र ही पूरी कहानी को बयान कर रही थी। इस आंदोलन को गंगा मुक्ति संग्राम बता कर द्वारिका वज्योतिष पीठाधीर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज ने अफसोस जताया कि जब स्वयं पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपनी धर्मपत्नी सोनिया गांधी के साथ कुम्भ में स्नान करने के अवसर पर उनसे गंगा को निर्मल बनाने का वचन दिया था, परन्तु उनकी धर्मपत्नी सोनिया गांधी की सरकार आज राजीव गांधी के संकल्प को भी पूरा नहीं कर रही है। शंकराचार्य की इस टिप्पणी पर उनके चरणों में बेठे कांग्रेसी दिग्गज दिगविजय सिंह निर्विकार निगाहें नीचे करके ही बेठे रहे। शंकराचार्य ने आश्चर्य प्रकट किया कि गंगा उत्तराखंड की ही नहीं अपितु राष्ट्रीय नदी है और गंगा की रक्षा के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में अलग से मंत्रालय बनाना चाहिए, जिसके अंर्तगत गंगा की दिन-रात निगरानी की जानी चाहिए। शंकराचार्य ने कहा कि यदि सरकारी जांच एजेंसी ‘कैग’ की रिपोर्ट देखें तो लगता है गंगा अपने आपातकाल से गुजर रही है। गंगा की इस दशा के लिए प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करने की जरूरत है।  शंकराचार्य ने गंगा बचाने के लिए आंदोलन तेज करने का भी ऐलान किया। इसके अलावा उन्होंने हरिद्वार में संतों के आश्रमों सहित बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री व हेमकुण्ड में जल संसोधन संयंत्र लगा कर गंगा को दुषित होने से बचाने की जरूरत पर भी बल दिया। हालांकि इस आयोजन में भाजपा समर्थित गंगा बचाओं आंदोलन के संत नहीं दिखाई दिये न हीं इसमें गोविन्दाचार्य, गंगा महासभा व इस आंदोलन से जुड़े लोग ही दिखाई दिये। इसके बाबजूद इस आंदोलन के प्रति आम जनता की सहमति को कोई व्यक्ति नहीं नकार सकता है।
हालांकि इस मंच पर रामजन्म भूमि की सबसे दिग्गज भाजपा नेत्री उमा भारती  ने भी अपना सम्बोधन किया। उनके साथ भाजपा नेता विजय कुमार मल्होत्रा ने भी इस अभियान को अपना पूरा समर्थन दिया। हालांकि न तो उस समय शकराचार्य स्वरूपानन्द जी ही उपस्थित थे व नहीं दिगविजय ही । दोनों 4 बजे के बाद मंच पर उपस्थित हुए। वहीं इस मंच पर जहां उदघोषक व हर वक्ता गंगा की धारा को अविरल, निर्मल तथा आचमन लायक बनाने की मांग कर रहा था । वहीं इस अभियान में का शुभारंभ गांधी की समाधि का जलाभिषेक करने व सर्वधर्म सभा करने के बाद, यहां से 6 किमी दूर जंतर मंतर तक पदयात्रा करके हुई। इसमें लोग ‘अविरल गंगा, निर्मल गंगा हमें चाहिए कल-कल गंगा.’ का नारा लगा कर गंगा की जय जय कार हर हर गंगे करके कर रहे थे।  राजघाट से जंतर मंतर तक साढ़े छह किलोमीटर की दूरी तय करने के दौरान संतों को लोगों का भारी समर्थन मिला। इस सभा में जहां सभी धर्मो के आचार्य थे वहीं इस सभा में कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी पार्टी, भारतीय किसान यूनियन के नेता भी गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए संतों के साथ मंच पर आए। वक्ताओं में सबसे ज्यादा लोग भीष्म पितामह के किरदार मुकेश खन्ना के डायलोगों पर ताली बजाते देखे गये। इस सभा में जहां भजन गायक  संगीतकार लखविंदर सिंह लक्खा ने अपने गंगा भजनों से समारोह की समा ही बांध दी। वहीं  बाबा रामदेव के आंदोलन में प्रमुख भागेदारी निभाने वाले भाषा के पूर्व सम्पादक वेद प्रताप वैदिक ने इस आंदोलन को देश का सबसे बडा आंदोलन बताया। वहीं इस आंदोलन में उत्तराखण्ड में बांधों के विरोध में केदारघाटी बचाओं आंदोलन में 65 दिन की जेल की सजा काट कर आयी उत्तराखण्ड को बांधों से मुक्त करने के संकल्प के लिए समर्पित गोरा देवी के तुल्य ‘सुशीला भण्डारी ने अपने औजस्वी भाषण में जहां उत्तराखण्ड में बांध बनाये जाने से यहां के जन जीवन में हो रही भारी तबाही को बयान करते हुए उत्तराखण्ड व भारत को बचाने के लिए इस इन विनाशकारी बांधों पर रोक लगाने का आवाहन किया।  मंच का संचालन शंकराचार्य के आगमन से पूर्व आंदोलन के प्रमुख सुत्र धार जल विरादरी के राजेन्द्रसिंह, प्रमोद कृष्णन् जी महाराज, व हिन्दू महासभा के चक्रपाणी महाराज ने संयुक्त संचालन किया।  वहीं शंकराचार्य की आगमन के बाद मंच का संचालन शंकराचार्य के शिष्य ने ही किया। इसमें अपने उदबोधन करने वालों में परमार्थ आश्रम के प्रमुख, कालिकापीठ के महामण्डलेश्वर
महंत सुरेन्द्र, ओलिया के मजार से आये मुस्लिम सुफी संत, बनारस से आये हिन्दु मुस्लिम गंगा भक्त, भाजपा विधायक महेश शर्मा, कांग्रेसी नेता किशोर उपाध्याय आदि प्रमुख थे। इसमें बड़ी संख्या में गंगा भक्तों ने भाग लिया। इसमें प्रमुख लोगों में उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन के प्रमुख संगठन उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के देवसिंह रावत, महासचिव जगदीश भट्ट, अग्रणी पत्रकार विजेन्द्रसिंह रावत, समाजसेवी ओमवीर तोमर सहित सेकडों की संख्या में महिलाये भी सम्मलित थी।

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