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Sunday, June 17, 2012



जंगली जानवरों द्वारा मारे जाने पर मिले कम से कम 5 लाख का मुआवजा

डीडीहाट क्षेत्र में मनखी बाघ द्वारा मारे गये व्यक्ति को दी केवल 5 हजार सहायता

पिथौरागढ़ (प्याउ)। सीमान्त जनपद पिथोरागढ़ में इस सप्ताह 35 वर्षीय एक व्यक्ति को मनखी बाघ ने अपना निवाला बना लिया और दो अन्य लोगों को घायल कर दिया। इस प्रकरण पर सरकार ने संवेदनहीनता दिखाते हुए केवल 5 हजार का मुआवजा दिया। इसी प्रकार की दुर्घटना से आये दिन उत्तराखण्ड के हर पर्वतीय जनपद के लागों को दो चार होना पड़ता है। परन्तु क्या मजाल सरकार को अपने दायित्व का जरा सा भी बोध हो। सरकार की इस संवदेनहीनता यहां के प्रबुद्ध लोगों को झकझोर कर रख दिया है। क्या आम उत्तराखण्डी की कीमत केवल 5 हजार रूपये ही हे। सरकार ने अभी तक प्रदेश में भले सड़क दुर्घटना या अन्य आपदाओं में काल कल्वित होने वाले लोगों को मुआवजे का एक समान नियम कानून नहीं बनाया है। परन्तु फिर भी सड़क दुर्घटना में एक डेढ़ लाख से 50 हजार तक मुआवजा की घोषणा सरकार करती नजर आती है। परन्तु जंगली जानवरों द्वारा मारे गये लोगों या घायल लोगों या इन जानवरों के निवाला बने पालतु पशुओं के मुआवजे के बारे में सरकार ने न तो अभी तक कोई नियम बनाया व नहीं अभी तक कोई सम्मानजनक मुआवजा का ही ऐलान किया। बिना नियम बनाये सरकार ने यहां के आम जनजीवन को बाघों, रीछो, हाथियों, जंगली सुअरों व अब बंदरों के रहमोकरम पर छोड़ दिया है। इन जीवों ने न केवल पर्वतीय जनों का जीवन पर ग्रहण लगा दिया है अपितु यहां की खेती व पालतु पशुओं को भी तबाह करके रख दिया है।
 भले ही उत्तराखण्ड राज्य गठन हुए 12 साल गुजर गये हैं परन्तु प्रदेश में अब तक की कांग्रेस व भाजपा की किसी भी सरकार ने यहां के ग्रामीणों के जीवन पर सरकार द्वारा संरक्षित हिंसक वन जीवों से आम आदमी को सुरक्षा देने के लिए कोई ठोस नियम नहीं बनाये है।  प्रदेश में आये दिन किसी न किसी जगह आम आदमी कहीं मनखी बाघ तो कंहीं जंगली सुअर, रीछ व हाथी आदि के हमले का शिकार हो कर दम तोड़ता रहता है। परन्तु क्या मजाल है प्रदेश की सरकार इस मामले में कोई ठोस नीति बनाये। नीति या नियम बनाना तो रहा दूर इस दिशा में अभी तक किसी भी सरकार ने ईमानदारी से सोचने तक की कोशिश तक नहीं की। सरकार यहां पर वन जीव संरक्षण कानून का सोटा तो बेशर्मी से  बेझिझक हो कर यहां के पीड़ित लोगो ंपर चलाती है परन्तु कभी यहां पर सत्तासीन सरकार ने इस दिशा में सोचने की पहल तक नहीं की कि अगर आम आदमियों को सरकार द्वारा संरक्षित वन जीव हमला करता है या मौत के घात उतारता है तो उसको इसका मुआवजा भी सम्मानजनक देने के साथ इस दुर्घटना के लिए जिम्मेदार उस रेंज के जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या दण्ड दिया जाय।  प्रदेश पहले उत्तर प्रदेश जेसे विशाल प्रदेश का एक अंग था। उत्तर प्रदेश की सरकारों पर तो उत्तराखण्ड की जनसमस्याओं को ना समझ पाने का आरोप यहां के राजनेता ही नहीं प्रबुद्ध जन लगाते रहे। परन्तु राज्य गठन के बाद भी प्रदेश की सरकारों ने इस दिशा में सोचने तक की कोशिश तक नहीं की। केवल उत्तर प्रदेश के कानूनों का सोंटा ही उत्तराखण्ड में भी चलाते रहे।
सीमान्त जनपद पिथोरागढ़ के डीडीहाट तहसील के ग्रामीण क्षेत्रों में मनखी बाघ द्वारा एक 35 वर्षीय को खाने व दो पर हमला करने की घटना से लोग सहमे हुए है। वहीं वन विभाग ने इस घटना के बाद उपजे आक्रोश को शांत करने के लिए इस बाघ को पकड़ने के लिए पिंजरा लगाने का आदेश दे दिया है। सुत्रो ंके अनुसार घिंगतड़ गांव के तोक चलमोड़ी निवासी टीकाराम  सड़क निर्माण कार्य में मजदूरी कर 16 जून की सायं घर वापस जा रहा तो गांव के समीप ही स्थित नौलागाड़ पहुंचा तो मनखी बाघ ने उस पर अचानक हमला करके उसे अपना निवाला बना दिया। उसका आधा खाया हुआ शव बाद में लोगो ंको जंगल में मिला। इसके बाद इस बाघ ने इसी क्षेत्र में घर की छत पर पर सो रहे मजदूरों पर हमला बोल कर एक मजदूरों पर हमला किया जिसमे ंएक बांघ ने घायल कर दिया वहीं दूसरा भयभीत हो कर छत से ही गिर कर घायल हो गया। पीड़ितो का शोर सुन कर बाघ तो भाग गया परन्तु ग्रामीणों में आक्रोश फेल गया। दोनों घायलों को जिला अस्पताल में उपचार के लिए भर्ती कराया गया है।
 एक तरफ क्षेत्र में मनखी बाघ का आतंक से लोग सहमे हुए हैं वही इस मुद्दे पर सरकार की संवेदनहीनता पर जनता बेहद आक्रोशित है। जनता का आक्रोशित होने का मुख्य कारण है कि वन विभाग ने इस घटना में मारे गये व्यक्ति के परिजनों को तत्काल 5 हजार की आर्थिक सहायता दे कर उनके जख्मों में नमक डालने का कृत्य करना।  लोग सरकार की इस संवदेनहीन कृत्य पर प्रश्न कर रहे हैं कि क्या आम आदमी की कीमत केवल सरकार 5 हजार ही समझती है।  सरकार द्वारा संरक्षित जंगली हिंसक जानवरों के हमलों में मारे गये लोगों के लिए जहां सरकार को एक ठोस नीति बनाते हुए इसका कम से कम 5 लाख रूपये तक का सम्मानजनक मुआवजा होना चाहिए और जिस रेंज में जंगली जानवर आम जनता के जीवन को नुकसान पंहुचाता हो उस रेंज के वनाधिकारियों को इसके लिए जिम्मेदार मान कर दण्उित किया जाना चाहिए। हालांकि इस मनखी बाघ के हमले पर घायल हुए दोनों ग्रामीणों में दहशत व्याप्त है। परन्तु सरकार व उनके कारिदों के पास इन पीड़ितों का दुख दर्द सुनने व देखने के लिए समय तक नहीं है। आखिर कब आयेगी उत्तराखण्ड की सरकार को अपने इस दायित्व को निर्वाह करने की सुध।

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