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Saturday, February 11, 2012

संघ पर ग्रहण लग गया है नेतृत्व का सत्तालोलुपु सजातीयता नेताओं से अंध मोह

-संघ पर ग्रहण लग गया है नेतृत्व का सत्तालोलुपु सजातीयता नेताओं से अंध मोह
 -खंडूडी व निषंक की खुली जंग ने गुनाहगार है संघ व भाजपा आला नेतृत्व
गुटवाजी से अधिक खतरनाक भाजपा में चल रही जातिवादी प्रवृति को क्यों नजरांदोज कर रहा है संघ
प्यारा उत्तराखण्ड।

सुना है कि इन दिनो उत्तराखण्ड में खंडूडी व निषंक गुटों में हो रही आत्मघाति सियासी जंग के कारण प्रदेष विधानसभा चुनाव में डूबचूकी भाजपा की नौका की आषंका से भयभीत हो कर भाजपा की मातृ संगठन संघ के कर्णधारों की कुम्भकर्णी नींद टूट गयी है। संघ ने अपने विष्वस्थ स्वयंसेवकों को प्रदेष की गुटवाजी से त्रस्त पार्टी को फिर पटरी पर लाने के लिए विषेश अभियान षुरू करा ही दिया है। परन्तु प्रदेष भाजपा की वर्तमान षर्मनाक स्थिति को देख कर इसके षर्मनाक पतन पर करीब से नजर रखने वाले इसके लिए प्रदेष भाजपा के बौने नेतृत्व से अधिक खुद संघ व भाजपा के केन्द्रीय नेत्त्व को जिम्मेदार मान रहे है। अगर समय पर संघ व भाजपा नेतृत्व प्रदेष में जातिवादी मानसिकता के बौने नेतृत्व को स्थापित करने व उनकी इस जातिवादी मानसिकता पर अंकुष लगाता तो आज भाजपा पर ऐसा कलंक नहीं लगता। सवाल यह है कि जब भाजपा का प्रदेष नेतृत्व वहां के साफ छवि के जमीनी संघ समर्पित अनुभवी नेताओं को एक एक करके नकारते हुए उपेक्षा कर रहा था तो उस समय संघ व भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व क्यों कानों में अंगूुली डाल कर धृतराश्ट की तरह मूक बना हआ था। क्यों अधिकांष विधायकों के जनसमर्थन के बाबजूद साफ छवि के जनप्रिय वरिश्ट नेता भगतसिंह कोष्यारी को प्रदेष का मुख्यमंत्री बनाने के बजाय खंडूडी को केन्द्र से उठा कर प्रदेष में थोपा गया। फिर जब खंडूडी की अलोकषाही व जातिवादी प्रवृति के खिलाफ उसके अधिकांष मंत्रिमण्डल व संगठन ने आवाज उठायी तो क्यों फिर उन्हीं की पसंद सजातिय व्यक्ति निषंक को प्रदेष की कमान सोंपी गयी। क्या प्रदेष पर संघ व भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को जातिवाद के मोह में इतना संकीर्ण बना दिया था कि उनको प्रदेष में भगतसिंह कोष्यारी, केदारसिंह फोनिया, मोहनसिंह ग्रामवासी जैसे वरिश्ट व त्रिवेन्द्रसिंह रावत जैसे संघ निश्ट नेता कहीं दिखाई नहीं दिये। क्या संघ व भाजपा नेताओं की आंखों के तारे निषंक जैसे स्वनाम धन्य नेता केसे बन गये? अब विधानसभा चुनाव में भी इसी प्रवृति को देख कर जहां भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व कुषवाह जेसे बसपा नेताओं को भाजपा में स्वागत करते हैं परन्तु उनके पास केदारसिंह फोनिया जैसे साफ छवि के वरिश्ट जनजाति नेता को टिकट देने के लिए जीगर तक नहीं रहा। वहीं जिस प्रदेष के मुख्यमंत्री होते हुए खंडूडी ने प्रदेष की जनांकांक्षाओं व प्रदेष के हितों पर अपने व अपने चेहते निषंक के कार्यकाल में कुठाराघात कराया उसी खंडूडी की कोटद्वार से हो रही षर्मनाक हार से बचाने के लिए प्रदेष में ‘खंडूडी है जरूरी का षर्मनाक राग अलाप कर अपने घोर जातिवादी मानसिकता को ही उजागर कर प्रदेष की लोकषाही का एक षर्मनाक ढ़ग से मजाक ही उठाया। जहां तक प्रदेष के हितों पर कांग्रेसी मुख्यमंत्री तिवारी की तरह  ही खंडूडी ने जनसंख्या पर आधारित परिसीमन थोपकर, प्रदेष मे बाहर से लाये गये नौकरषाह का तांडव मचा कर, प्रदेष की जनांकांक्षाओं व विकास के प्रतीक राजधानी गैरसेंण न बनाने, मुजफरनगर काण्ड के अभियुक्तों को दण्डित न करा कर तथा प्रदेष में जातिवादी, क्षेत्रवादी व भ्रश्टाचारी त्रन्त्र पर अंकुष न लगा कर लोगों के विष्वास के साथ छलावा किया। रही सही कसर उन्होंने निषंक को प्रदेष का मुख्यमंत्री बनाने में लगा कर पूरी कर दी। दुबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद खंडूडी ने जिस प्रकार से भ्रश्ट जनप्रतिनिधियों व एनजीओ को बचाने वाले प्रवधान वाला लोकायुक्त बना कर फिर प्रदेष की जनता को छला। ऐसे व्यक्ति को उत्तराखण्ड में जरूरी बता कर संघ पोशित भाजपा ने प्रदेष की लोकषाही के साथ षर्मनाक खिलवाड़ किया। जब संघ पोशित सरकार में देवभूमि उत्तराखण्ड में षराब व षिक्षा दोनो मंत्रालय हरि की नगरी के विधायक के पास ही एक साथ सोंप दी गयी थी तब संघ की यह मूच्र्छा क्यों नहीं टूटी? जब प्रदेष में मातृ सदन के योगी ने गंगा बचाने के लिए अपने प्राण बलिदान दे दिये तब संघ की अपनत्व के मोह की खूमार क्यों नहीं टूटी? प्रदेष में केसे दागदारों को महत्वपूर्ण दायित्व व साफ छवि के नेताओं की उपेक्षा हुई तब संघ क्यों नहीं जागा? जब प्रदेष से राज्य सभा का सांसद तरूण विजय जैसे यष्वषी बनाये जा रहे थे तब संघ ने षेशादिचारी के नाम पर क्यों नहीं जागा? जब भगवान राम को धोखा दिया गया, जब इंडिया इंज राइजिंग का राग छेडा गया, जब पंजाब विधानसभा में खालिस्तानी नेता को श्रद्वाजलि देने में भाजपाई सम्मलित रहे तब क्यों संघ का विवेक नहीं जागा। तब संघ को क्यों अपने जनदायित्व का विष्वास नहीं हुआ जब अटल-आडवाणी व प्रमोद की तिकड़ी के षासन में देष की लाभकारी वाल्कों जेसी कम्पनियों को कोडियों के भाव बेचा गया। जब क्यों सघ नहीं जागा जब पाक के गुर्गो द्वारा संसद पर हुए हमले के बाद अमेरिका की गीडद भभकी पर अटल बिहारी मूक   बने रहे? जब भाजपा में लाखों लोगों का कत्लेआम का अपराधी जीना की आरती उतारी जा रही थी तब संघ क्यों नहीं जागा? दूसरों को अनुषासन का पाठ पढ़ाने वालों को खुद अपने जीवन में भी इनका पालन करना चाहिए।
 गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव 2009 में प्रदेष भाजपा के षासन के बाबजूद 5 में से 5 लोकसभा सीटों से भाजपा के सफाया होने के बाद संघ पोशित भाजपा में जिस षर्मनाक ढ़ग से रमेष पोखरियाल निषंक को सत्तासीन किया गया, उससे साफ हो गया था कि भाजपा का सुषासन, रामराज्य व राश्ट्रवाद केवल हवाई नारे हैं असल में भाजपा केवल जातिवादी संकीर्ण मानसिकता की ही ध्वजवाहक है। जिस षर्मनाक जातिवादी, क्षेत्रवादी व भ्रश्टाचारी कुषासन से प्रदेष की आम जनता नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्रित्व वाले कुषासन से त्रस्त थे, उससे बदतर कुषासन भाजपा ने प्रदेष की जनता को सुषासन देने के नाम पर खंडूडी व निषंक के मुख्यमंत्रित्व में प्रदेष की जनता को दिया।  खंडूडी व निषंक के कार्यकाल में भी प्रदेष के अधिकांष महत्वपूर्ण मंत्रालय ही नहीं षासन प्रषासन के अधिकांष प्रभावकारी पदों पर जातिविषेश के लोगों को ही आसीन किया गया। प्रदेष के प्रतिभाषाली लोगों की षर्मनाक उपेक्षा करके बाहर के लोगों को प्रदेष के षासन प्रषासन पर काबिज किया गया। प्रदेष सरकार के मंत्रीमण्डल से लेकर दायितवधारी, न्यायपालिका से लेकर षासन प्रषासन में जो घोर जातिवाद का तांडव मचाया गया उससे प्रदेष की जनता व उसके भविश्य के साथ एक जबरदस्त खिलवाड किया गया। प्रदेष में  भगतसिंह कोष्यारी, केदारसिंह फोनिया, मोहनसिंह ग्रामवासी,, ले.जनरल तेजपालसिंह रावत, मुन्नासिंह चैहान आदि बहुसंख्यक समाज व प्रतिभावान नेताओं की ऐसी षर्मनाक उपेक्षा की गयी, उससे प्रदेष की जनता में एक बात घर बना गयी कि भाजपा में राश्ट्रवाद व सुषासन के नाम पर केवल जातिवाद का ही सम्राज्य स्थापित होता है। इस अविष्वास को बनाये रखने के लिए न केवल प्रदेष भाजपा के खंडूडी व निषंक जैसे प्यादे ही नहीं अपितु भाजपा का ऐसा मुखौटे को बेनकाब करता हुआ  इसी कारण आज प्रदेष में जमीनी व साफ छवि के उपेक्षित बहुसंख्यक समाज के स्वाभिमानी नेता एक एक कर भाजपा का दामन छोड़ रहे हैं। इसके कारण भाजपा का कांग्रेस से निकृश्ठतम संकीण जातिवादी सोच का स्थापित करना है। काष भाजपा अपने घोशित राश्ट्रवाद, सुषासन व रामराज्य पर ही कायम रहती। लोग कांग्रेस के कुषासन व भ्रश्ट तंत्र से आहत हैं परन्तु भाजपा का घोर जातिवादी पोशण के कारण यहां पर न केवल उत्तराखण्ण्ड में बहुसंख्यक समाज के सदचरित्र व पार्टी के अनुभवी वरिश्ठ केदारसिंह फोनिया, मोहनसिंह ग्रामवासी, रतनसिंह गुनसोला, ले. जनरल तेजपाल सिंह रावत, मुन्ना सिंह चैहान जैसे कद्दावर नेता या तो गुमनामी में पार्टी में रह कर अपमान झेल रहे हैं तथा फोनिया, जनरल रावत व मुन्ना सिंह चैहान ने तो पार्टी को तिल्लाजलि ही दे दी है। यह केवल देवभूमि उत्तराखण्ड में ही नहीं अपितु राश्ट्रीय स्तर पर है भाजपा के अन्य उपेक्षित समाज के नेता कल्याणसिंह, उमा भारती, गोविन्दाचार्य के साथ क्या सलूक किया गया। सुशमा, जैसे नेत्रियों को आज नेता प्रतिपक्ष तक बना दिया गया। देष में सबसे बडे सामाजिक व राजनैतिक चिंतक व जमीनी नेता गोविन्दाचार्य को इसी कारण भाजपा व संघ ने बनवास दिया है क्योंकि वे भाजपा में देष के सभी समाज को स्थापित करना चाहते थे। इसी से आहत हो कर संघ व भाजपा नेतृत्व ने उनको राजनीति से दूर करके देष के भविश्य को संवारने वाला एक बडे नेता को दूर करने का अक्षम्य अपराध किया। भाजपा व संघ नेतृत्व को एक बात का भान होना चाहिए कि देष, विष्व या हिन्दुत्व तभी मजबूत होगा जब यहां जातिवाद-क्षेत्रवाद को दरकिनारे करके देष के सभी समाजों को गले लगा कर प्रतिभावन सदचरित्र लोगों को देष व समाज की बाडगोर दी जाय। देष का इतिहास साक्षी है कि जाति, क्षेत्र, रंग, नस्ल, लिग के नाम पर किया गया भेदभावी षोशण ही अपने सहित अपने कत्र्ता के नाष का मूल कारण बना। इसलिए संघ अगर वास्तव में देष व भारतीय संस्कृति का ध्वज वाहक बनाना चाहता है तो उसे अपनी इस धृतराश्ट्री भूल को सुधारते हुए प्रतिभावान सभी समाज के लोगों को बिना जातिवादी संकीर्णता से आगे बढाना चाहिए। इसके साथ इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि देष किसी कांग्रेस, भाजपा या संघ की बैषाखियों का मोहताज नहीं, इस देष में भारतीय संस्कृति हजारों सालों से  अपने जीवंत मूल्यों के कारण आज भी तमाम झंझावतों को झेलते हुए कालजयी बनी हुई है। भीश्म पितामह, कर्ण व दोर्णाचार्य आदि के पतन से एक बात ही सबको सीख लेनी चाहिए कि असत व अधर्म के मार्ग पर रह कर हम चाहे कितने भी बली व नेक क्यों न हो हमें हार का ही सामना करना पडेगा। इसलिए देष के हित में सर्व भूतहिते रता व सत्य न्याय के पथ के अनुगामी ही बनना चाहिए। भारतीय संस्कृति कभी स्व व पर के द्वंद की इजाजत नहीं देती अपितु हमेषा सत्य व असत के द्वंद का रणघोश की इजाजत देती है। संघ को इस बात भी भान होना चाहिए कि उनके स्वयंसेवकों द्वारा किये गये विष्वासघात से आज भी देष की जनता मर्माहित है। देष की जनता को कांग्रेस ने तो ठगा ही परन्तु भाजपा का विष्वासघात असहनीय है। देष की जनता कथनी से करनी पर विष्वास करती है वरियता देती है। इससे साफ हो गया कि संघ व भाजपा से भी देष के समाज का अब मोह भंग कांग्रेस की तरह ही हो गया। इसके लिए संघ नेतृत्व का धृतराश्ट्र की तरह अपनत्व के मोह में मूक समर्थन करना ही रहा। अगर संघ आज भी अपनी भूलों को सुधारने का निर्णय लेने के लिए तैयार है तो हो सकता है आहत समाज का विष्वास वह फिर से अर्जित करे। नहीं तो लाखों लोगों के बलिदान व संघर्श का यह संघ रूपि तेज भाजपा के निहित स्वार्थी व जातिवादी नेताओं की उदर पूर्ति की भैंट चढ़ कर नश्ट हो जायेगा। फेसला संघ को करना है कि उनको देष समाज व भारतीयता से प्यार करना है या केवल जातीयता के मोह में बंघ संकीर्ण सतांधों की उदरपूर्ति। षेश श्रीकृश्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्।     

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