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Monday, February 20, 2012

टीपीएस ने लगायी भाजपा व कांग्रेस की सत्तालोलुपु आशाओं पर ग्रहण

टीपीएस ने लगायी भाजपा व कांग्रेस की सत्तालोलुपु आशाओं पर ग्रहण
देहरादून(प्याउ)। भले ही उत्तराखण्ड की राजनीति में कई राष्ट्रीय दिग्गज भाजपा व कांग्रेस में दशकों से राजनीति कर रहे हों परन्तु दोनों स्थापित दलों में अपने चंद समय की राजनीति में सेना से ले. जनरल के उच्च पद से सेवानिवृत के बाद राजनीति में आये तेजपाल सिंह रावत ने जो अपनी उपस्थिति जमायी, उससे आज भाजपा व कांग्रेस दोनों की सत्तालोलुपु आशाओं पर एक प्रकार का ग्रहण सा लग गया है। आज चुनाव परिणाम 6 मार्च को आयेगे परन्तु टीपीएस को अपने पाले में लेने के लिए जहां कांग्रेस में खुली जंग नेताओं में छिडी हुई हैं वहीं भाजपा में भी अंदर खाने में टीपीएस को फिर से भाजपा के समर्थन में खडे होने के लिए लामबंदी चल रही है।
    भले ही चुनाव परिणाम 6 मार्च को आयेगे परन्तु भाजपा की तरह अब कांग्रेस में भी मुख्यमंत्री के संभावित दावेदार अपने ही दल के संभावित विरोधी पर सीधे व परोक्ष रूप से वार करने से कतई हिचकिचा नहीं रहे है।  हालांकि भाजपा में तो चुनावी जंग में एक दूसरे को मुख्यरूप से खंडूडी व निशंक खेमे ने एक दूसरे की लुटिया डुबाने मे क्या कारनामे किये इसको प्रदेश के दिग्गज सहित भाजपा के आला नेताओं में भी एक दूसरे की कारस्तानी के पुलिंदा ये दोनों पंहुचा चूके है। इनके चुनाव परिणाम आने से पहले ही एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप से हेरान आला कमान ने दोनो को दिल्ली बुला कर जो डपट लगाई की इन कागची शेरों की हवाई उडी हुई है।
वहीं अब कांग्रेस में लग रहा है सरकार उनकी बनेगी। एक दूसरे को चुनावी समर में ही पता साफ करने की रणनीति पर भले कांग्रेसी भाजपाईयों से पीछे केसे रहते तो उन्होंने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। यही नहीं राहुल गांधी के उतारे गये अपने प्रत्याशियों के विरूद्ध भी कांग्रेस के बड़े नेताओं ने जिस प्रकार से विद्रोही उम्मीदवारों को खुली साहयता दी उससे आला कमाल काफी नाराज हे। यह नाराजगी इनको अपने मुख्यमंत्री बनने के मंसूबों पर ग्रहण लगाने वाला लग सकता हे। अब चुनाव परिणाम आने को एक पखवाड़ा ही रह गया तो सभी गोटियां बिठाने की रणनीति पर लगे हुए है। अपने संभावित समर्थक बन सकते निर्दलीयों से सम्पर्क साधा ही नहीं जा रहा है उनके समर्थन व विरोध में बयान बाजी भी की जा रही है। सबसे चैकाने वाला बयान उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा व कांग्रेस को क्षेत्रीय ताकत बन कर नींद हराम करने वाले उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा के सभावित विजय होने वाले प्रत्याशियों को ले कर हो रही है। रक्षा मोर्चा अध्यक्ष रिटार्यड लेफ्टिनेंट जनरल टीपीएस रावत को कांग्रेस के पाले में खड़ा करने को लेकर जहां केंद्रीय राज्य मंत्री हरीश रावत तमाम तरह के बयान दे रहे हैं वहीं सतपाल महाराज उन्हें किसी तरह कांग्रेस में दोबारा शामिल करने के पक्ष में नहीं हैं।
इसी सप्ताह हरीश रावत ने टीपीएस रावत के पक्ष में बयान देकर टीपीएस को लेकर उठे बवाल को और भड़का किया है। जानकार जानते हैं कि समय बदलते केसे राजनेताओं का चेहरा व पसंद बदल जाती है। पहले टीपीएस महाराज के ही सिपाहे सलार थे, तिवारी सरकार के कबीना मंत्री थे, अपने ही मंत्री के खिलाफ सदन में जब हरीश रावत समर्थक लाबी ने बबाल खडा किया तो पूरे प्रदेश में कांग्रेस की आपसी लड़ाई जग जाहिर हो गयी। उसके बाद तिवारी व सोनिया की पहली पसंद टीपीएस को भांपते हुए सतपाल महाराज ही नहीं प्रदेश के अधिकांश कांग्रेसी नेताओं से टीपीएस के सम्बंध काफी दूर हो गये। हालत यह हो गयी कि उनको बड़ी मुश्किल से अपनी विधायकी सीट पर जीत हाशिल हुई। नेता प्रतिपक्ष के मुद्दे पर उन्होंनेे जिस प्रकार से हरकसिंह रावत को आसीन करने का दो टूक विरोध सोनिया गांधी से किया, जब सोनिया गांधी ने उनके विरोध को दर किनारे करते हुए हरकसिंह रावत को ही नेता प्रतिपक्ष बनाया तो विरोध स्वरूप टीपीएस रावत ने 2007 में कांग्रेस का विधायक होने के बावजूद उन्होंने धुमाकोट सीट भाजपा के मौजूदा मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी के लिए खाली कर दी और भाजपा का दामन थामा। सुत्रों का मानना है भाजपा खेमे में कोश्यारी गुट के प्रभाव में व खंडूडी को केन्द्र द्वारा थोपे जाने के कारण कोई भी भाजपा विधायक अपनी सीट छोड़ना नहीं चाहता था, इस कारण खंडूडी को छह माह के अंदर विधानसभा में विधायक निर्वाचित होने की समय सीमा खत्म होने पर जिस संकट से टीपीएस ने उबारा उसी का ईनाम भाजपा ने उनको 2009 में लोकसभा के उप चुनाव में उतारा। हालांकि टीपीएस सतपाल महाराज से पराजित हो गए। उसके बाद जब भाजपा में निशंक सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा नेतृत्व ने शर्मनाक मौन रखा हुआ था, खंडूडी व कोश्यारी को निशंक ने आला नेतृत्व को वशीकरण करके अपने मोह में ले लेने के बाद पार्टी व सरकार में पूरी तरह से अलग थलग फेक दिया था, ऐसे समय में फिर स्टार्जिया व जल विधुत घोटाले में घिरी भाजपा सरकार को कटघरे में खडा करते हुए टीपीएस ने अपने सिपाहे सलार राजेन्द्र भण्डारी व रघुवीर सिंह बिष्ट को लेकर जो जनांदोलन उत्तराखण्ड के अग्रणी लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी व पूर्व प्रशासनिक अधिकारी सुरेन्द्रसिंह पांगती तथा जनरल रावत, काला व बहुगुणा सहित अनैक बुद्धिजीवियों को लेकर चलाया उससे भाजपा नेतृत्व घबरा गया। भाजपा नेतृत्व को इस बात से खंडूडी खेमे ने गुमराह किया कि ये सब खंडूडी के लोग है। अगर खंडूडी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो प्रदेश से भाजपा का लोकसभा की तरह सफाया हो जायेगा।  अगर उस समय मुख्यमंत्री नहीं बदला जाता तो प्रदेश में भाजपा की संभावित शर्मनाक स्थिति शायद बच जाती। परन्तु उत्तराखण्ड की लोकशाही निशंक के प्रहारों से मर्माहित हो जाती।
इसी कारण भाजपा ने आनन फानन में विधानसभा के देहरी में खडे उत्तराखण्ड में अपना मुख्यमंत्री बदल कर न केवल प्रदेश की जनता को अपितु देश को भी चैंका दिया। वहीं निशंक को नेपेथ्य में डालने के बजाय निशंक को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे ही बनाया टीपीएस के पास उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा । इसी को लेकर टीपीएस ने पूरे प्रदेश में ऐसा झंझावत खडा किया कि उसकी आंधी में भाजपा कांग्रेस ही नहीं उक्रांद भी भयभीत हो गयी। चुनाव परिणाम भले ही कुछ रहे परन्तु टीपीएस ने एक संदेश प्रदेश में दे दिया कि केवल वही एक नेता है जो भाजपा व कांगे्रस की शिंकजे से जकडे उत्तराखण्ड को बचा सकता है।  लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने खंडूड़ी की जगह निशंक को सीएम बनाया। इसके बाद भाजपा में टीपीएस को अहमियत मिलनी बंद हो गई। उसी समय टीपीएस ने भाजपा से अलग होकर रक्षा मोर्चा का गठन किया।
आज जहां सतपाल महाराज को इस बात का अफसोस है कि उत्तराखण्ड की राजनीति में टीपीएस को खडा करने व मंत्री बनाने के बाबजूद टीपीएस ने उनसे विश्वासघात किया। यही नहीं सतपाल महाराज को इस बात का भी काफी गुस्सा है कि हरीश रावत व टीपीएस रावत दोनों उनके परिवारिक मनमुटाव को हवा देने की राजनीति कर रहे है। उनका साफ मानना है कि एक दूसरे के परिवारिक विवाद को हवा देना किसी भी अर्थ में नैतिक नहीं है। वहीं हरीश रावत खेमे को इस बात की संतुष्टि है कि मुख्यमंत्री पद पर बनने के उनके प्रबल विरोधी सतपाल महाराज का एक मजबूत विरोधी को वे कांग्रेस में ला कर अपनी स्थिति मजबूत कर सकते हे। दोनों गुटों के बीच में अभी चुनाव परिणाम है। चुनाव परिणाम भले कुछ भी रहे परन्तु टीपीएस आज प्रदेश की राजनीति का ऐसा नाम हो गया है जिसके कारण भाजपा व कांग्रेस दोनों ही परेशान है। वहीं उत्तराखण्ड की जनता को टीपीएस के नेतृत्व में प्रदेश में एक ऐसा शसक्त मोर्चा देने की आश है जो भाजपा व कांग्रेस के शिकंजे से उत्तराखण्ड को मुक्ति दिला कर शहीदों के सपनों का उत्तराखण्ड बना सकते है। आज कांग्रेस में ही नहीं भाजपा में भी जनरल रावत के विद्रोह के मुद्दों को आज उनके तत्कालीन विरोधी भी सही ठहरा रहे है। जो विकल्प उक्रांद कई दशक बाद भी नहीं दे सका वही विकल्प रक्षा मोर्चा ने छह माह में उत्तराखण्ड के लोगों में आशा जागृत कर दी।

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