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Thursday, February 23, 2012

उत्तराखण्ड के सरकारी तंत्र की अकर्मण्यता से भौंचंक्के खंडूडी खूब बरसे

उत्तराखण्ड के सरकारी तंत्र की अकर्मण्यता से भौंचंक्के खंडूडी खूब बरसे

‘मैं महिने एक दो बार ही  एक दो दिन के लिए दिल्ली आता हूॅं  इस दौरान भी आप लोग अपनी जिम्मेदारी तक नहीं निभाते, मैं कितनी बार बार बेल बजाने के बाबजूद कोई इस तरफ ध्यान तक नहीं दे रहा है। आप लोग करते क्या यहां?  यहां पर पत्रकार लोग बैठे है आप लोगों ने मुझे बताया तक नहीं?  यह उत्तराखण्ड के सरकारी तंत्र से पीड़ित आम आदमी के शब्द नहीं अपितु उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी के शब्द है। जो वे अपने ही कार्यालय के अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा उनकी उपेक्षा करने से बेहद आहत हो कर इन लापरवाह कर्मियों को बुरी तरह से डपट रहे थे।
 इस प्रकरण का प्रत्यक्ष दर्शी होने के कारण  मैं भी दंग रह गया कि जिस प्रदेश के कर्मचारी मुख्यमंत्री की इतनी उपेक्षा करते हों उस प्रदेश में आम जनता के प्रति नोकरशाही की क्या रवैया होगा। उत्तराखण्ड प्रदेश में 11 सालों में सरकारी अमला कितना अकर्मण्य व उदासीन हो गया है इसका एक छोटा सा नमुना देख कर प्रदेश के मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी भी खुद भौचंक्के रह गये। हुआ यों कि प्रदेश के मुख्यमंत्री 23 फरवरी को दिल्ली पंहुचे। दिल्ली के उत्तराखण्ड निवास में दूसरी मंजिल पर स्थित मुख्यमंत्री सूट में  दिल्ली प्रवास के दौरान निवास करते है। इस मुख्यमंत्री आवास कक्ष के साथ ही उनका कार्यालय भी होता है। मुख्यमंत्री कक्ष के साथ ही बने स्वागत कक्ष में उनसे मिलने वालों को बिठाया जाता। यहां पर आज दोपहर को मैं भी वहां पर पंहुच कर कई समाचार चैनलों के पत्रकारों के साथ चाय पिते हुए बात चीत कर ही रहा था तो तभी वहां पर मुख्यमंत्री से मंत्रणा करके उनके कक्ष से उत्तराखण्ड सरकार के सलाहकार एल के जोशी बाहर आये तो मै अपने अन्य साथी पत्रकारों से उनका परिचय ही करा रहा था कि तभी मेने देखा कि  मुख्यमंत्री खंडूडी यकायक जिस कक्ष में हम थे उसमें आ कर अपने अधिकारियों व कर्मचारियों को डपटने लगे। यकायक हुई इस घटना से वहां पर उपस्थित पत्रकार, अधिकारी सभी सन्न रह गये। प्रदेश के मुख्यमंत्री खंडूडी से मेरे भले ही तमाम उनकी प्रदेश को दिशा देने वाले काम न करने से मतभेद रहे हों परन्तु वे सेना के वरिष्ठ अधिकारी रहने के कारण अनुशासन के पाबंद हैं। उनकी यह हनक सारे कर्मचारियों में थी परन्तु उनका खुद का कार्यालय उनकी कितनी परवाह करता है इसको देख कर वे खुद भौचंक्के रह गये। पर इतना है कि उनके आसपास रहने वाले उनके अधिकारियों का न तो समाज के प्रति मेल जोल रहता है व नहीं वे मुख्यमंत्री को सही सलाह तथा उनको सही जानकारी तक देते है। इसी का कारण रहा खण्डूडी की जनता के समक्ष अपार सही छवि के बाबजूद वे न तो जनता के विश्वास पर खरे उतर सके व नहीं वे जनांकांक्षाओं को ही साकार कर सके। उनके आसपास कितने आत्मघाति रणनीतिकार है जिन्होंने उनको कोटद्वार से चुनावी समर में उतार कर भंवर में फंसाने का काम किया। एक अच्छे नेता को चाटुकारों व अव्यवहारिक लोगों के बजाय अपने आसपास साफ छवि के दूरदर्शी व्यवहारिक लोगों को रखना चाहिए।

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