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Thursday, February 2, 2012

धन कुवैरों का खेल बन कर रह गया है चुनावी जंग में उतरना

धन कुवैरों का खेल बन कर रह गया है चुनावी जंग में उतरना
आज देश में कहने को भले ही लोकशाही हो, परन्तु देश के हुक्मरानों ने अब इसे केवल चंगेजशाही में तब्दील करके रख दिया है। आज देश में आम आदमी भले ही अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकता है परन्तु वह जनप्रतिनिधी बनने के लिए चुनावी जंग में उतरना तो रहा दूर अब कल्पना भी नहीं कर सकता है। उत्तराखण्ड व पंजाब की विधानसभा चुनाव में मतदान 30 जनवरी को भले ही शांतिपूर्ण ढ़ंग से सम्पन्न हो गये हों परन्तु इस चुनाव में चुनाव आयोग की तमाम चुनाव में एक प्रत्याशी द्वारा किये जाने वाले खर्च की एक लक्ष्मण रेखा के निर्धारण, चुनाव आचार संहिता व अंकुशों को धत्ता बताते हुए प्रत्याशियों ने इस चुनाव में जिस प्रकार से एक एक मतदाता पर जो खर्च किया अगर उसका आंकलन ईमानदारी से किया जाय तो विधानसभा चुनाव प्रदेश में अब वही लड़ सकता है जिसके पास कम से कम एक करोड़ रूपये खर्च करने की ताकत हो। खासकर उत्तराखण्ड विधानसभा की रूद्रप्रयाग, कोटद्वार, डोईवाला, सहसपुर व सल्ट विधानसभा क्षेत्रों में जिस प्रकार से धन की वर्षा की गयी उससे इन क्षेत्रों के मतदाता भौचंक्के रह गये। इन क्षेत्रों में जिस प्रकार से रूपये, शराब, बाहुबल का जो तांडब मचा, उससे आम आदमी के मुंह से एक ही बात निकल रही है कि अब चुनाव में केवल माफिया किस्म के लोग ही चुनाव लड़ सकते है। क्योंकि काले धन, शराब व ताकत के बीना चुनाव के मैंदान में कूदने की सोचना एक प्रकार की मुर्खता रह गयी हे। खासकर जिस प्रकार से देश प्रदेश में स्वयं घोषित ईमानदारी का तकमा लिये घुमने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र कोटद्वार में पुलिस  प्रशासन की शह पर 108 आपात सेवा की एम्बुलेन्सों में शराब बंटवाने व पुलिस प्रशासन द्वारा घोर पक्षपात दमन की खबरों में अगर एक प्रतिशत सच्चाई है तो यह न केवल खंडूडी के लिए अपितु पूरे प्रदेश के लिए भी शर्मनाक है। यहां पर भी इन तमाम उल्लेखित सीटों की तरह जिस प्रकार से करोड़ों रूपये लुटवाये जा रहे थे, उसको देख कर आम आदमी जो दो जून की रोटी के लिए तरसता है, वह भौचंक्का है। इस प्रकार का खुला पक्षपात व अत्याचार देखकर ही कोटद्वार में लोगों ने थाने पर प्रदर्शन किया, उसी विरोध को देख कर चुनाव आयोग ने तुरंन्तु पक्षपात के आरोपी पुलिस अधिकारी को तत्काल प्रभाव से वहां से हटा दिया। इससे एक बात साफ हो गयी कि अब केवल वे ही लोग जनप्रतिनिधी बनने के चुनाव में उतर कर चुनाव मजबूती से लड़ पायेंगे जो करोड़ों रूपये पानी की तरह बहाने की हिम्मत रखते हो। यह करोड़ों रूपये अधिकांश लोग काला धन के रूप में ही चुनावी दंगल में खर्च करेंगे। इस प्रकार भ्रष्ट लोगों के लिए ही अब देश में विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव के दंगल में उतरने की महत्वपूर्ण योग्यता रह गयी है। जिस आदमी ने ईमानदारी से राजनीति में कदम रखने की सोचनी है तो उसके लिए आज राजनीति के दरवाजे बंद हो चूके है। इसके लिए राजनेता ही नहीं अपितु आम जनता भी काफी हद तक गुनाहगार है, जो प्रदेश के हित, दल की प्रदेश के लिए वर्तमान में किये कार्य व प्रत्याशी का सामाजिक जीवन तथा देश प्रदेश की वर्तमान आवश्यकता को ध्यान में रखने के बजाय केवल जाति, धर्म, क्षेत्र, रूपये, शराब व रिश्तेदारी के चुंगल में फंस कर भ्रष्ट, चरित्रहीन, असामाजिक तथा प्रदेश के मान सम्मान को रौंदने वाले को अपना मत दे कर देश प्रदेश का भाग्यविधाता बनाने का कृत्य करते है। ऐसे में आम मतदाता को चाहिए कि वह अपने संकीर्ण स्वार्थो से उपर उठ कर जनहित में कार्य करने वाले प्रतिनिधियों को ही मतदान करना चाहिए। परन्तु देखा यह जा रहा है कि उन लोगों को राजनीति की टिकट राजनैतिक दल प्रदान करने में जरा सा भी नहीं लज्जाते है। इसी प्रवृति के कारण देश व प्रदेश में लोकशाही आम आदमियों का नहीं अपितु धनुकुवैरों का खेल बन कर रह गया है। जहां विधानसभा की एक सीट पर लड़ने के लिए कम से कम 1 करोड़ रूपये खर्च करने की हिम्मत हो व लोकसभा के लिए 5 करोड़ रूपये खर्च करने की तागत हो।

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