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Friday, May 17, 2013


भारतीय भाषाओं को सर्वोच्च न्यायालय व संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में स्थापित करने के सा

 

देश में लोकशाही की असली जंग है संसद की चैखट जंतर मंतर पर जारी भाषा आंदोलन


नई दिल्ली। ’ न्यायालय व संघ लोकसेवा आयोग में भारतीय भाषाओं को स्थापित करने की निर्णायक जंग में आगे आयें देश के साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार ,राजनेता व सभी देशभक्त । ’ यह आवाहन संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर चल रहे भारतीय भाषा आंदोलन में 16 मई को आयोजित हुई एक बैठक में देश के अग्रणी साहित्यकार, पत्रकार व भाषा आंदोलनकारियों ने संयुक्त रूप से भारतीय भाषाओं की शर्मनाक स्थिति को देख कर किया। इस बैठक में भारतीय भाषा आंदोलन के संयोजक पुष्पेन्द्र चैहान, महासचिव देवसिंह रावत, अग्रणी पत्रकार ज्ञानेन्द्रसिंह, समाजवादी नेता सुलतान कुरैशी, इंजीनियर जगदीश भ्ीाट्ट, पत्रकार नीरज जोशी, डा. आर एन सिंह, रामकृष्ण परमहंस, मोहम्मद आजाद, गौरव त्यागी, भगवत स्वरूप मिश्रा, कौशलेन्द्रकुमार, सुनील कुमार सिंह, चन्द्रवीर, सरदार महेन्द्रसिंह, वीपी सिंह, व दलीप कुमार सिंह, आदि ने भाग लिया। इस बैठक की अध्यक्षता, भारतीय भाषा आंदोलन के अध्यक्ष साहित्यकार डा. बलदेव बंशी ने किया। इस अवसर पर डा. बलदेव बंशी ने अपनी संत साहित्य से जुड़ी कविताओं का भी पाठ किया।
आंदोलनकारी इस बात से भी हैरान है कि आजादी के 65 साल बाद भी देश की उच्च न्यायालयों में व देश की उच्च सेवाओं में नियुक्ति की तमाम परीक्षाओं में ही नहीं अपितु देश मे शिक्षा व सम्मान में आज भी उसी फिरंगी भाषा अंग्रेजी का एकाधिकार है जिससे मुक्ति के लिए शताब्दियों का संघर्ष करके इस देश के लाखों लोगों ने अपना सर्वस्व बलिदान करके देश को आजादी दिलाई थी। आज जहां देश में अंग्रेजी भाषा शासन प्रशासन की प्राण बनी हुई हैं वहीं हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को शर्मनाक उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है। इससे देश अपनी संस्कृति व इतिहास से जहां कट गया है वहीं देश अपना आत्मसम्मान भी खो चूका है। पूरे देश में भ्रष्टाचार, व्यभिचार व आतंक रूपि कुशासन का तांडव मचा हुआ है। भारतीय हुक्मरान जिस प्रकार से न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में भी न्याय दिलाने की मांग के अग्रणी न्याय आंदोलनकारी श्याम रूद्र पाठक एवं साथियों के 4 दिसम्बर 2012 से 24 अकबर रोड़ के समक्ष चल रहे धरने की शर्मनाक उपेक्षा कर रहे हैं, इससे आहत हो कर और देश को इस शर्मनाक स्थिति से उबारने के लिए व लोकशाही को स्थापित करने के लिए ही संसद की चैखट जंतर मंतर पर निर्णायक भारतीय भाषा जनांदोलन छेड ा गया है।
गौरतलब है कि संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता व भारतीय भाषाओं की शर्मनाक उपेक्षा से खिन्न हो कर भारतीय भाषाओं को सम्मलित करने की मांग को लेकर 1988 से 14 साल तक अखण्ड धरना दिया।थां इसमें पूर्व राष्टपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व वीपीसिंह सहित देश के तमाम अग्रणी आंदोलनकाररी सम्मलित हुए। परन्तु जब इस ऐतिहासिक आंदोलन के बाद भी सरकार की तंद्रा नहीं टूटी तो भ्भारतीय भाषा आंदोलन ने पुष्पेन्द्र चैहान के नेतृत्व में 21 अप्रैल 2013 से संसद की चैखट पर उपरोक्त मांगों को लेकर फिर आंदोलन का श्री गणेश कर दिया। इसी आंदोलन में अब निरंतर देश भर के अग्रणी भारतीय भाषा आंदोलनकारी पंहुच कर अपना समर्थन दे रहे है। यही नहीं यहां हर दिन देश की वर्तमान शर्मनाक पतन पर गहरा चिंतन मंथन होता रहता है। उल्लेखनीय है कि पुष्पेन्द्र चैहान व स्व. राजकरण सिंह के नेतृत्व में चलाये गये भारतीय भाषा आंदोलन के प्रथम चरण के आंदोलन में 1988 के बाद इस आंदोलन में जहां ज्ञानी जेल सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, वीपीसिंह, आडवाणी, चतुरानन्द मिश्र सहित चार दर्जन से अधिक देश के वरिष्ठ नेता भाग लेते थे वहीं इसमें देश के अग्रणी सम्पादक राजेन्द्र माथुर, प्रभात जोशी, अच्युतानन्द मिश्र, राम बहादुर राय, राहुल देव व गोविन्द सिंह सहित हबीब अख्तर, ओम प्रकाश तपस, रामहित नन्दन सहित अनैक विख्यात पत्रकार भाग लेते रहे। इस आंदोलन के महत्वपूर्ण स्तम्भों में ओम प्रकाश हाथपसारिया, यशवंत निकोसे, विनोद गौतम, रविन्द्र धामी,, ओमवीर तोमर, विजय गुप्त, राजेन्द्रसिंह, स्व. सतवीर, हरपाल राणा व ईश्वर भारद्वाज सहित अनैक प्रमुख आंदोलनकारी अग्रणी रहे। वर्तमान में श्याम जी भट्ट, सतीश मुखिया, बी आर चैहान, प्रदीप नागर, भगतजी , सुलतान कुरैशी, नवीन कुमार सोलंकी, वीड़ी दिवाकर, पत्रकार विजयेन्द्र, जगदीश भट्ट, आशीष व अर्जुन आदि प्रमुख है।
आंदोलनकारी इस बात से भी हैरान है कि आजादी के 65 साल बाद भी देश की उच्च न्यायालयों में व देश की उच्च सेवाओं में नियुक्ति की तमाम परीक्षाओं में ही नहीं अपितु देश मे शिक्षा व सम्मान में आज भी उसी फिरंगी भाषा अंग्रेजी का एकाधिकार है जिससे मुक्ति के लिए शताब्दियों का संघर्ष करके इस देश के लाखों लोगों ने अपना सर्वस्व बलिदान करके देश को आजादी दिलाई थी। आज जहां देश में अंग्रेजी भाषा शासन प्रशासन की प्राण बनी हुई हैं वहीं हिन्दी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को शर्मनाक उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है। इससे देश अपनी संस्कृति व इतिहास से जहां कट गया है वहीं देश अपना आत्मसम्मान भी खो चूका है। पूरे देश में भ्रष्टाचार, व्यभिचार व आतंक रूपि कुशासन का तांडव मचा हुआ है। भारतीय हुक्मरान जिस प्रकार से न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में भी न्याय दिलाने की मांग के अग्रणी न्याय आंदोलनकारी श्याम रूद्र पाठक एवं साथियों के 4 दिसम्बर 2012 से 24 अकबर रोड़ के समक्ष चल रहे धरने की शर्मनाक उपेक्षा कर रहे हैं, इससे आहत हो कर और देश को इस शर्मनाक स्थिति से उबारने के लिए व लोकशाही को स्थापित करने के लिए ही संसद की चैखट जंतर मंतर पर निर्णायक भारतीय भाषा जनांदोलन छेड ा गया है।गौरतलब है कि संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता व भारतीय भाषाओं की शर्मनाक उपेक्षा से खिन्न हो कर भारतीय भाषाओं को सम्मलित करने की मांग को लेकर 1988 से 14 साल तक अखण्ड धरना दिया।थां इसमें पूर्व राष्टपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व वीपीसिंह सहित देश के तमाम अग्रणी आंदोलनकाररी सम्मलित हुए। परन्तु जब इस ऐतिहासिक आंदोलन के बाद भी सरकार की तंद्रा नहीं टूटी तो भ्भारतीय भाषा आंदोलन ने पुष्पेन्द्र चैहान के नेतृत्व में 21 अप्रैल 2013 से संसद की चैखट पर उपरोक्त मांगों को लेकर फिर आंदोलन का श्री गणेश कर दिया। इसी आंदोलन में अब निरंतर देश भर के अग्रणी भारतीय भाषा आंदोलनकारी पंहुच कर अपना समर्थन दे रहे है। यही नहीं यहां हर दिन देश की वर्तमान शर्मनाक पतन पर गहरा चिंतन मंथन होता रहता है। उल्लेखनीय है कि पुष्पेन्द्र चैहान व स्व. राजकरण सिंह के नेतृत्व में चलाये गये भारतीय भाषा आंदोलन के प्रथम चरण के आंदोलन में 1988 के बाद इस आंदोलन में जहां ज्ञानी जेल सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, वीपीसिंह, आडवाणी, चतुरानन्द मिश्र सहित चार दर्जन से अधिक देश के वरिष्ठ नेता भाग लेते थे वहीं इसमें देश के अग्रणी सम्पादक राजेन्द्र माथुर, प्रभात जोशी, अच्युतानन्द मिश्र, राम बहादुर राय, राहुल देव व गोविन्द सिंह सहित हबीब अख्तर, ओम प्रकाश तपस, रामहित नन्दन सहित अनैक विख्यात पत्रकार भाग लेते रहे। इस आंदोलन के महत्वपूर्ण स्तम्भों में ओम प्रकाश हाथपसारिया, यशवंत निकोसे, विनोद गौतम, रविन्द्र धामी,, ओमवीर तोमर, विजय गुप्त, राजेन्द्रसिंह, स्व. सतवीर, हरपाल राणा व ईश्वर भारद्वाज सहित अनैक प्रमुख आंदोलनकारी अग्रणी रहे। वर्तमान में श्याम जी भट्ट, सतीश मुखिया, बी आर चैहान, प्रदीप नागर, भगतजी , सुलतान कुरैशी, नवीन कुमार सोलंकी, वीड़ी दिवाकर, पत्रकार विजयेन्द्र, जगदीश भट्ट, आशीष व अर्जुन आदि प्रमुख है।

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