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Tuesday, May 31, 2011

-काश ममता बनर्जी से सबक लेते देश को बर्बाद करने वाले राजनेता

-काश ममता बनर्जी से सबक लेते देश को बर्बाद करने वाले राजनेता/
-कार्यालय के नवीनीकरण की लागत चुकायी खुद ममता ने/

‘मेरे कक्ष और बगल के कई कमरों में चित्र लगाने, आंतरिक साज-सज्जा तथा फर्नीचर खरीदने पर लगभग दो लाख रुपये खर्च आए। मैंने निजी खाते से इस राशि के चेक राज्य के मुख्य सचिव (समर घोष) को सौंप दिए हैं। राज्य चूंकि गंभीर वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है, इसलिए मैं नहीं चाहती कि मेरे कक्ष के नवीनीकरण पर आया खर्च सरकार वहन करे। यह दो टूक अनुकरणीय बात तीन दषक से अधिक समय पर बंगाल की सत्ता पर काबिज वाम मोर्चा सरकार को अपदस्थ करने वाली ममता बर्नजी ने मुख्यमंत्री बनने के 10 दिन बाद बनर्जी 30 मई को सोमवार को पहली बार अपने नवीनीगत कक्ष में बैठने पर कही। हालांकि इस कक्ष के नवीनकरण का कार्य पिछले कई दिनों से चल रहा था और आधिकारिक तौर पर नवीनीकरण कार्य कराने की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग की है। इसके बाबजूद ममता बनर्जी ने ऐसा कार्य करके देष के संसाधनों को अपने निवास व कार्यालय के लिए पानी की तरह बहा कर बर्बाद करने वाले नेताओं के लिए एक करारा जवाब दिया। मैने दिल्ली में मंत्रियों व सांसदों के निवास व कार्यालयों का नवीनीकरण व साज सज्जा पर नाहक ही करोड़ा रूपया बर्बाद होते देखा है, उस समय इस बर्बादी को देख कर मुझे बड़ा दुख होता । खासकर भारत जैसे देष में जहां करोड़ बच्चे धनाभाव में अपनी षिक्षा दीक्षा से बंचित रहते हैं, करोड़ों लोग धनाभाव के कारण चिकित्सा से वंचित रहते हों तथा यहां करोड़ों लोग धनाभाव के कारण निवास सुविधाओं से वंचित रहते हैं ऐसे देष के जनसेवा में उतरे हुए तथाकथित जनसेवकों को अपने निवास व कार्यालय में देष के विकास का करोड़ों धन इस तरह लुटाने में जरा सी भी षर्म नहीं आती है।
बेवजह इन सांसदों व मंत्रियों के घर में लगा हुआ कुछ ही समय पहले लगा फर्नीचर व साज सज्जा को कबाड़ कीं तरह वहां से हटा कर नयी बहुकीमती फर्नीचर इत्यादि से सजाया जाता है। इन जनसेवकों की आत्मा षायद मर गयी होती। अच्छे भले घरों व कार्यालयों को नाहक ही तोड़ फोड़ करके सार्वजनिक निर्माण विभाग नये सिरे से इसका निर्माण व साजसज्जा करने में देष का करोड़ों रूपया बर्बाद करती है। यही नहीं दिल्ली की सड़कों खासकर नई दिल्ली की सड़कों पर बहुकीमती टायलें व पत्थर चंद सालों बाद ही बेवजह उखाड़ फैंका जाता है। उसकी जगह पर नई टाइलें लगायी जाती। ऐसे ही कारनामें देष में अन्य कार्यों में किये जाते हैं।
मै गत षनिवार को देहरादून गया। वहां पर मैने रविवार को एक समारोह में देहरादून के परेड़ ग्राउंड स्थित हिन्दी भवन सभागार में सम्मलित होने का अवसर मिला। उसकी जीर्ण षीर्ण हालत देख कर मुझ बड़ा दुख हुआ कि एक मुख्यमंत्री अपने आवास व कार्यालय के साज सज्जा पर करोड़ों रूपये खर्च कर सकता है। परन्तु उसे प्रदेष की महत्वपूर्ण भवनों की जीर्ण षीर्ण हालत को देखने व सुधारने की एक पल की फुर्सरत भी नहीं है। हालांकि अभी प्रदेष की राजधानी का विधिवत घोशणा भी नहीं हुई परन्तु जनभावनाओं व नैतिकता को दर किनारे करके देहरादून में जबरन मुख्यमंत्री का निवास बनाने में 16 करोड़ रूपये खर्च करने से साफ हो गया कि प्रदेष के हुक्मरानों को कहीं दूर-दूर तक जनभावनाओं व लोकषाही की कोई इज्जत तक नहीं है। ऐसे में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का यह निर्णय देष के तमाम हुकमरानों को एक सबक ही होगा । ममता बनर्जी ने इसके अलावा पहले ही अपनी गाड़ी के लिए कहीं पर भी यातायात न रोकने का आदेष जारी कर चूकी है। ऐसा ही उन्होंने कई नेक काम किये। कई बार सांसद व केन्द्रीय मंत्री बनने के बाबजूद उनके पास आज भी वही दो कमरों वाला मकान है। वहीं साधारण धोती व वही रबड़ की चप्पल। यही है सादगी का पर्याय। जनता से जुड़ी व माॅ माटी व मानुश के लिए हर पल संघर्शरत नेताओं की पहचान। जो नेता व प्रबुद्व लोग आम जनता के साथ जुडने व जमीन पर साथ बैठने पर कतराते हों ऐसे लोग क्या लोकषाही का सम्मान करेंगे व क्या वे लोकभावनाओं का सम्मान करेंगे।
उत्तराखण्ड जैसे नव गठित प्रदेष की माली हालत भी दयनीय है परन्तु यहां के अधिकांष नेता व नौकरषाह चंद षालों में करोड़पति व अकूत सम्पति के मालिक बन गये है। चंद सालों में बिना किसी उद्यम के इन पर हुइ्र कुबैर के खजाने की बरसा को देख कर प्रदेष में भ्रश्टाचार इस तेजी से पनपा की आज उत्तराखण्ड देष के सबसे भ्रश्टत्तम प्रदेषों में जाना जाने लगा है। परन्तु यहां के नेताओं व नोकरषाहों की फिजूलखर्ची का कोई जवाब नहीं। मुख्यमंत्री व उनके मंत्री आदि दिल्ली का दौरा ऐसा करते हैं जेसे दिल्ली ही उत्तराखण्ड की राजधानी हो। मुख्यमंत्री का होलीकप्टर से क्षेत्र का भ्रमण तो समझा जाता। परन्तु बहाना बना कर अपने प्यादों के निजी समारोहों में उत्तराखण्ड से भारत के अन्य कोनों में जाना प्रदेष के खजाने पर कितना भार डालता है षायद इसका उनको कहीं दूर दूर तक भान भी नहीं होगा। जनहितों की पूर्ति या जनसेवा के लिए समर्पित रहने के बजाय इन नेताओं को अपनी सम्पति व वेषभूशा का ही एक मात्र ख्याल रहता है। इनके पहनावे से साफ हो जाता है कि इनका कहीं दूर-दूर तक जनता से कोई सरोकार नहीं है। नहीं इनके दिल में जनसेवा के लिए कहीं दूर दूर तक कोई सम्मान है। यही नहीं ममता बनर्जी ने अपने चित्रों की प्रदर्षनी लगा कर उसकी विक्री से अर्जित 1 करोड़ रूपये को भी वह राजकोश में दान कर चूकी है। ऐसी प्रवृति अगर देष के नेताओं में होती तो देष की आज ऐसी दुर्गति नहीं होती।
षेश श्री कृश्ण ।
श्रीकृश्णाय् नमो। हरि ओम तत्सत्।

1 comment:

  1. Bahut he sundar bate kahi hai aapne! Desh k sabhi log ek jese nhi hai...hume acche logo k chehre bhi janta ko dikhane chahiya taki un logo ka manobal bade or apna jameer bech chuke netao ko sabak mile...Thanks a lot

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