Pages

Sunday, May 22, 2011

अनुदान ने लगाया समाजवाद की प्राणवायु श्रमदान पर ग्रहण

अनुदान ने लगाया समाजवाद की प्राणवायु श्रमदान पर ग्रहण
गैरसैंण राजधानी श्रमदान से बनाने को तैयार हैं उत्तराखण्डी

उत्तराखण्ड की सामाजिक सहभागिता जैसी अनुकरणी परंपरा पर आज सरकारी कोष से मिलने वाले अनुदान ने एक प्रकार से ग्रहण ही लगा दिया है। लम्बे समय से मेरे मन में इस विषय पर एक गहरी टिश थी। इसको हवा दिया उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री राज्य सभा सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने यह कह कर कि अनुदान ने श्रमदान व्यवस्था को समाप्त कर दिया है। ऐसे में किसान व पशुपालक पूरे मनोयोग से दुग्ध क्षेत्र में नई श्वेत क्रांति का सूत्रपात करें। उत्तराखण्ड के जमीनी नेताओं में अग्रणी जननेता श्री कोश्यारी बेतालघाट के ग्राम मझेड़ा में उत्तराखंड सहकारी डेयरी फेडरेशन के तत्वावधान में चार करोड़ की लागत से बनने वाले प्रशिक्षण संस्थान के शिलान्यास समारोह में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए अपनी इस वेदना को भले ही मजाक में कहा हो परन्तु यह हकीकत है कि आज इस सरकारी अनुदान को हड़ने की प्रवृति ने उत्तराखण्ड में शताब्दियों से सच्चे समाजवाद को संचालित करने वाले प्राणवायु श्रमदान को नष्ट कर दिया। इस समारोह में श्री कोश्यारी ने कहा कि गौ पालन के क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। वह स्वयं भी इस कार्य में दुग्ध उत्पादकों को पूरा सहयोग देंगे। श्री कोश्यारी ने चुटकी लेते हुए कहा वह तो गोपाल सिंह के पुत्र हैं तो उनके तो खून में ही गोपाल बसे हैं। उन्होंने फेडरेशन के कार्यालय भवन के निर्माण को सांसद निधि से पांच लाख रुपए देने की घोषणा भी की।
इस अवसर पर फेडरेशन के अध्यक्ष डॉ.मोहन सिंह बिष्ट ने कहा कि डेयरी प्रशिक्षण संस्थान के निर्माण को राज्यसरकार ने पहली किस्त के रूप में एक करोड़ निर्गत किए हैं। यह संस्थान हिमालयी राज्यों में एक खास प्रशिक्षण केंद्र है। इससे क्षेत्रीय युवाओं व पशुपालकों के साथ ही आने वाली पीढ़ी को भी बड़ा लाभ मिलेगा। श्री बिष्ट के इस वक्तव्य को यह संस्थान कहां तक साकार करता है परन्तु एक बात स्पष्ट है कि आज पूरे उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार को आत्मघाति तौर पर दावानल की तरह बढ़ने के कारण अनुदान के कारण श्रमदान परंपरा का ह्रास होना भी है।
प्रदेश के लोग एक दूसरे व सार्वजनिक निर्माण के लिए अनुदान पर नहीं श्रमदान पर विश्वास करते थे। उत्तराखण्ड के महान लोगों ने प्रदेश में अब तक तमाम मार्ग व स्कूल तथा नहरें इत्यादि भी श्रमदान से ही बनायी थी। इसमें चाहे नहर निर्माण हो या किसी आम गरीब आदमी के मकान गौशाला इत्यादि का निर्माण हो। एक दशक पहले तक उत्तराखण्ड में श्रमदान की विलक्षण परमपरा विद्यमान थी। यह केवल पुरूषों में ही नहीं अपितु उत्तराखण्ड की मूल रीढ़ समझी जाने वाली महिलाओं में भी बड़ी स्तर पर विद्यमान थी। पहले गांवों में यह देखने को प्रायः आता था कि किसी की खेत गोडाई या फसल कटाई समय पर अन्य लोगों के साथ नहीं हो पाती तो पूरा गांव की महिलायें उस महिला के साथ निस्वार्थ श्रमदान के रूप में काम पूरा करती थी। यही स्थिति गांव में खेत की जुताई के समय भी होता था। कभी कभार गांव के किसी व्यक्ति का समय पर खेत हल जुताई नहीं होती थी या उसके पास उस समय बेल जोतने के लिए न हो, या अन्य किसी कारण से किसी के खेत हल लगाने से रह जाते थे तो पूरे गांव के लोग अपने अपने घर से खाना खा कर अपने बेलों को लेकर उसके खेतों को जोत देते थे। कहीं कहीं तो देखने में यह भी आता था कि लोग अपने ही घर से जब किसी के पास बीज न हो तो बीज को लेकर उसके खेतों को आबाद करते थे। यही सहभागिता हर सुख दुख में होती थी। गांव के लोगों का सुख दुख सांझा होता था। पहले जमाने में भले ही वहां के लोगों में अशिक्षा व धनाभाव हो परन्तु उनमें सामाजिकता व मानवीयता कूट-कूट कर भरी होती थी। चाहे गरीब प्रतिभाशाली बच्चे को पढ़ाना हो या किसी गरीब बेटी की शादी करनी हो सब मिल कर करते थे। सहयोग से करते थे। एक की बेटी सबकी बेटी होती थी। बिना बोले ही सब उस कार्य को हर हाल में सम्पन्न कराने में लगे रहते थे। लोगों का चुल्हा सांझा था। एक घर में आग जलती तो उससे पूरे गांव में आग बांटी जाती थी। किसी के घर में बनी सब्जी से दूसरे के घर की रोटियां भी मिल बांट कर खाई जाती थी। एक दूसरे को खाने के लिए पूछने की एक आदर्श परंपरा थी। यहां खाना ही नहीं नमक तक मिल जुल कर बांट कर खाने की आदर्श परंपरा थी।
अगर आज हमने एक बार फिर उत्तराखण्ड सहित भारतीय समाज को एक आदर्श समाज बनाना है तो हमें सरकारी अनुदान पर बंदरबांट करने के बजाय समाज में श्रमदान की पद्वति को दुबारा से पुन्न स्थापित करनी होगी। सहभागिता के बिना समाज का निर्माण हो ही नहीं सकता। इसी श्रेष्ठ परंपरा को सिख धर्म में आज भी अंगीकार कर रखा है। आज भी सिख पंथ में जो भी बड़े काम होते हैं वहां हर आदमी कार सेवा यानी श्रमदान करने में अपना बड़ा सौभाग्य समझता है। सरकारी अनुदान की बैशाखियों ने हमें अपाहिज ही नहीं अपितु भ्रष्ट बना दिया है। समाज को चाहिए कि वह श्रमदान की पद्वति को बढ़ावा दें। हमारे पूर्वजों ने अपनी स्कूले, मंदिर, नहरे, सड़क ही नहीं पंचायती घर से लेकर चिकित्सालय तक श्रमदान से बनाया था। अगर उत्तराखण्ड सरकार में जरा सी भी प्रदेश से लगाव होता तो वह गैरसैंण में राजधानी बनाने के लिए लोगों को श्रमदान के लिए आवाहन करती तो पूरे प्रदेश के लोग ही नहीं देश विदेश के उत्तराखण्डी भी यहां पर श्रमदान करने के लिए अपना बड़ा सौभाग्य समझते। आज अनुदान की बैशाखियों ने हमें भ्रष्ट व जमीन से काट दिया है। जिस देव भूमि में पहले जो खायेगा पंच अंश वो होगा निवंश जैसे आदर्श को सिरोधार्य करके समाजसेवा करते थे वहां आज विकास के संसाधनों को दोहन व बंदरबांट करने के लिए समाजसेवा में लोग आ रहे है। फिरंगी व चंगैजों से बदतर ये समाजसेवी व नेता नोकरशाहों की जमात भले ही शिक्षित हों परन्तु वे हकीकत में हमारे उन पूर्वजों जो भले ही निरक्षर हों उनके समक्ष कहीं नहीं टिकते हैं। आज की इस शिक्षा ने हमें सच में एक प्रकार से इन्सान से हैवान ही बना कर रख दिया है। आज जरूरत है युवाओं को अपनी सोच व दिशा पर एक बार फिर से गंभीरता से विचार करने की। नहीं तो यह देखने में आ रहा है कि आज का युवा जमीन ही नहीं समाज से पूरी तरह से कट कर केवल आत्म केन्द्रीत हो गया है। यह समाज व देश के लिए ही नहीं मानवता के लिए काफी दुखदाई प्रवृति है। इसके लिए हमारे विद्यालयों से लेकर समाज में श्रमदान को एक बार फिर से बढावा देना होगा, अंगीकार करना होगा तभी हमारा समाज फिर अपनी श्रेष्ठ दिशा पर चल पायेगा। शेष श्री कृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

No comments:

Post a Comment