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Tuesday, May 17, 2011

काश उत्तराखण्ड में भी होती माॅ, माटी व मानुष के लिए संघर्ष करने वाली ममता

काश उत्तराखण्ड में भी होती माॅ, माटी व मानुष के लिए संघर्ष करने वाली ममता
काश उत्तराखण्ड में भी एक ममता बनर्जी होती जो प्रदेश की जनांकाक्षाओं का सम्मान करते हुए यहां के ‘मां, माटी, मानुष‘के हितों को निर्ममता से रौंद रहे दिल्ली दरवार के प्यादा बने कांग्रेस व भाजपा के सत्तालोलुप बौनी मानसिकता के नेताओं के चुंगल फंसे उत्तराखण्ड की रक्षा करती। ममता बनर्जी ने 34 साल से बंगाल की सत्ता में काबिज हुए वामदलों की निरंकुश व जनविरोधी सत्ता को जिस अदम्य साहस व संघर्ष की बदोलत उखाड़ फैंका उसके लिए उत्तराखण्ड की जनता की तरफ से मैं उनको शतः शतः नमन् करता हूॅ। इसके साथ पूरे देश में भ्रष्टाचार व परिवारवाद के प्रतीक बन चूके करूणानिधी के नेतृत्व वाले द्रुमुक कुशासन को दो तिहाई से अधिक बहुमत से भारी विजय हाशिल करने वाली अन्नाद्रुमुक की प्रमुख जय ललिता को भी पूरे देश की जनता हार्दिक बधाई देती है। असम में तरूण गोगई के नेतृत्व में कांग्रेस ने अपनी सत्ता को बरकरार रख कर देश के चुनावी समीक्षकों को भी हैरान कर दिया है। वहीं केरल में वाम गठबंधन को सत्ताच्युत कर कांग्रेसी गठबंधन को
ऐतिहासिक सफलता मिली। चुनाव में हार जीत तो दशकों से होती रहती। परन्तु ंिजस तरह से संघर्ष के दम पर ममता बर्नजी ने बंगाल में 34 साल से सत्ता पर जूंक की तरह चिपके वामदलों को सत्ताच्युत किया उसको देख कर पूरे देश के लोगों की नजर में वह एक महानायिका बन गयी है।
ऐसे ऐतिहासिक समय में मुझे लगता कि काश उत्तराखण्ड में भी एक ममता बनर्जी होती। जो दिल्ली दरवार के आकाओं के हाथों का मोहरा न हो हर यहां के माॅं माटी व मानुष के लिए राजनीति करती। नहीं तो उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य यह रहा कि यहां पर अब तक जो नेतृत्व मिला उसने चंगैज से बदतर उत्तराखण्डी हितों व जनांकांक्षाओं को निर्ममता से रौंदा। आज प्रदेश राज्य गठन के 11 साल बाद भी अपनी स्थाई राजधानी गैरसैंण के लिए तरस रहा है। जनभावनाओं का सम्मान न करते हुए नौकरशाहों से मिल कर यहां के जनविरोधी सरकारें जबरन देहरादून में ही स्थाई राजधानी थोपने का षडयंत्र कर रही है। प्रदेश के आत्म सम्मान को 1994 में राज्य गठन आंदोलन के दौरान मुजफरनगर काण्ड-94 में रौंदने वालों को दण्डित करने में यहां की सरकारें पूरी तरह विफल ही नहीं निश्क्रिय भी रही। यही नहीं यहां पर उत्तराखण्डियों की राजनैतिक भविष्य को सदा के लिए दफन करने के लिए हुए ‘जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन’ पर यहां के सत्तासीनों ने शर्मनाक मौन रखकर उत्तराखण्ड के साथ अक्षम्य अपराध किया। यही नहीं उत्तराखण्ड के हितों को दर किनारे रख कर यहां के संसाधनों की बंदरबांट की जा रही है। प्रदेश में सुशासन के बजाय संकीर्ण राजनैतिक हितों का साधने के लिए जातिवाद व क्षेत्रवाद की घृर्णित राजनीति की जा रही है। यही नहीं भ्रष्टाचार को यहां पर शिष्टाचार बना कर स्थापित किया गया है। आज यहां के निर्वाचित मुख्यमंत्री रहे नेताओं की कारगुजारी पर नजर दौडायें तो इस बात का दुख होता कि तिवारी, खंडूडी व निशंक जैसे नेताओं ने उत्तराखण्ड को किया भ्रष्टाचार, जातिवाद,क्षेत्रवाद में बुरी तरह से तबाह किया। तो एक टिस सी उठती है कि काश उत्तराखण्ड में होती एक ममता जैसी नेता जो बचाती देवभूमि को। स्वतंत्रता सेनानी प्रोमिलेश्वर बनर्जी की बेटी ममता ने अपने जुझारू स्वभाव के जरिए सचमुच कमाल कर दिया और अकेले दम पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा का किला ढहा दिया। इंदिरा गांधी की कट्टर समर्थक ममता बनर्जी का जन्म 5 जनवरी, 1955 को कोलकाता के एक मध्यम वर्गीय परिवार में पैदा हुआ। ममता छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय हो गई थीं। 70 के दशक में वह कांग्रेस (इंदिरा) से जुड़ीं। अपने समर्थकों के बीच दीदी के नाम से मशहूर ममता पहली बार उस समय सुर्खियों में आई, जब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ कोलकाता में रैली करने आए लोकनायक जयप्रकाश नारायण के काफिले के आगे लेट कर उसे आगे बढ़ने से रोक दिया था। जेपी अपने संपूर्ण क्रांति आंदोलन के सिलसिले में पश्चिम बंगाल के दौरे पर थे। तब से अब तक तृणमूल सुप्रीमो का राजनीतिक जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। उन्होंने पिछले तीन दशकों के अपने राजनीतिक सफर के दौरान कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। बंगाल की अग्निकन्या के नाम से मशहूर ममता के ‘मां, माटी, मानुष‘के नारे ने पिछले लोकसभा चुनाव में तो रंग दिखाया ही था। इस बार भी इसी नारे ने उन्हें राज्य की सत्ता तक पहुंचा दिया है। संघर्ष और आंदोलन की पर्याय मानी जाने वाली ममता पिछले 23 वर्षो से वाममोर्चा सरकार के खिलाफ सतत संघर्ष कर रही थीं जिसका अब उन्हें फल मिला है।
- कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में 1970 राजनीतिक जीवन शुरू करने वाली मामता बर्नजी, ने 1984 माकपा के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी को जादबपुर सीट से हराकर देश के सबसे युवा सांसदों में एक बनीं। इसी साल वह आल इंडिया युवा कांग्रेस की महासचिव भी निर्वाचित हुईं।1989 जादबपुर सीट से लोकसभा चुनाव हार गईं लेकिन 1991 में दक्षिण कोलकाता सीट से निर्वाचित होकर नरसिम्हा राव सरकार में मानव संसाधन विकास, खेल व युवा मामलों की राज्य मंत्री बनीं। वह बंगाल में वामदलों के कुशासन से मुक्ति के लिए संघर्ष करना चाहती परन्तु कांग्रेस पार्टी अपने दलीय स्वार्थों के लिए उसे इसकी पूरी इजाजत नहीं देती। इसी से आहत हो कर उसने 1997 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और 1998 एक जनवरी को आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की।
1999 भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार में शामिल हुईं, जिसमें उन्हें रेलमंत्री का पदभार सौंपा गया। सन्2001 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वाममोर्चा सरकार से लोहा लेने के लिए राजग से नाता तोड़ कांग्रेस से गठबंधन किया। लेकिन गठबंधन को मुंह की खानी पड़ी और सिर्फ 86 सीटें ही मिल पाईं।2004 लोकसभा चुनाव में निर्वाचित होकर संसद पहुंचने वाली तृणमूल की एकमात्र सांसद बनीं।
2006 बंगाल में बांग्लादेशियों की घुसपैठ पर उनके स्थगन प्रस्ताव को अनुमति नहीं दिए जाने पर लोकसभा के तत्कालीन डिप्टी स्पीकर चरणजीत सिंह अटवाल की तरफ अपना त्यागपत्र फेंका। सबसे अधिक उनके राजनैतिक जीवन के संघर्ष में निर्णायक संघर्ष 2007 पूर्व मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम में केमिकल हब के निर्माण के प्रस्ताव के विरोध में आंदोलन का शुभारंभ रहा। इसी आंदोलन के क्रम में नंदीग्राम में 14 मार्च को पुलिस फायरिंग की घटना हुई जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई।2008: पंचायत चुनाव में तृणमूल ने काफी अच्छा प्रदर्शन करते हुए दो जिला परिषद पर जीत हासिल की। हुगली के सिंगूर में टाटा के नैनो कारखाने के लिए किसानों से जबरन उनकी जमीन लिए जाने के विरोध में आंदोलन शुरू किया।
2009: लोकसभा चुनाव में कांगे्रस से गठबंधन कर तृणमूल ने बंगाल में वामदुर्ग की जड़ें हिला दी और 19 सीटों पर कब्जा जमाया। संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल में ममता बनर्जी दूसरी बार रेलमंत्री बनीं।
2011: तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस के साथ एक बार फिर गठबंधन कर विधानसभा चुनाव लड़ा और बहुमत हासिल कर बंगाल में वाममोर्चा शासन का सफाया कर दिया। ऐसे संघर्षों से निकल कर प्रदेश की सत्ता को संभालने वाली सादगी व संघर्ष की प्रतीक तथा भ्रष्आचार के खिलाफ सदैव आवाज उठाने वाली ममता बनर्जी को एक बार फिर ‘मां, माटी, मानुष‘ के प्रति उनके अद्म्य प्रेम व समर्पण के लिए शतः शतः नमन्
करते हैं।

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