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Monday, May 16, 2011

भाजपा -कांग्रेस के बीच नहीं अपितु तिवारी व हरीश रावत के बीच होगा 2012 का विधानसभा चुनाव!

विधानसभा चुनाव से पहले ही हरीश रावत ने चटायी अपने विरोधियों को धूल
-भारी मतों से विजयी होकर हरीश रावत के पुत्र आनन्दसिंह रावत को मिली प्रदेश युवक कांग्रेस अध्यक्ष की कमान
-भाजपा -कांग्रेस के बीच नहीं अपितु तिवारी व हरीश रावत के बीच होगा 2012 का विधानसभा चुनाव!



भले ही दिल्ली में बैठे कांग्रेसी नेता उत्तराखण्ड के दिग्गज कांग्रेसी नेता हरीश रावत को हर समय हाशिये में डालने का काम करे परन्तु हरीश रावत अपने विरोधियों के तमाम षडयंत्रों को नाकाम करते हुए सदा ही अपने विरोधियों पर 21 ही साबित होते है। इन तमाम प्रकरणों से एक बात स्पष्ट हो गयी कि अगर विधानसभा चुनाव तक भाजपा मठाधीश जनभावनाओं को रौंदते हुए अपने निहित स्वार्थ के कारण निशंक को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाये रखते हैं तो आगामी विधानसभा चुनाव का मुकाबला भाजपा कांग्रेस के बीच में न हो कर तिवारी व हरीश रावत के बीच में होना तय है। क्योंकि निशंक के मुख्यमंत्री रहने से भाजपा पहले ही चुनावी दंगल के मैदान से बाहर हो कर दहाई के अंक को छूने के लिए भी मोहताज हो जायेगी।
इसका एक नजारा इस सप्ताह युवक कांग्रेस के चुनाव में देखने को मिला। उत्तराखण्ड में प्रदेश युवक कांग्रेस के चुनाव में साबित हो गया। जहां हरीश रावत के मंझोले बेठे आनन्द सिंह रावत के युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के लिए चुनाव में ताल ठोकते देख कर प्रदेश कांग्रेस के सभी दिग्गजों ने एकजूट हो कर उनको पछाड़ने के लिए कमर कस ली। परन्तु अपनी जमीनी पकड़ व संगठन में उनके दशकों से सीधे पकड़ के महारथ के कौशल का प्रदर्शन करते हुए हरीश रावत ने पर्दे के पीछे रह कर अपने तमाम विरोधियों को चारों खाने चित ही कर दिया। इस चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य, नेता प्रतिपक्ष डा हरकसिंह रावत, मुख्यमंत्री के सबसे मजबूत दावेदारों में से एक सतपाल महाराज ही नहीं अपितु विजय बहुगुणा भी हरीश रावत के विरोध में पर्दे के पिछे एकजूट थे। यह युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव एक प्रकार से हरीश रावत व उनके चिर प्रतिद्वंदि नारायणदत्त तिवारी के बीच में बर्चस्व के संग्राम में तब्दील हो गया। हालांकि तिवारी भले ही पर्दे के पीछे रहे परन्तु उनके करीबी क्षत्रपों ने इसकी कमान संभाल रखी थी। इसके बाबजूद हरीश रावत ने विधानसभा चुनाव से पहले हुए इस सबसे बड़े शक्ति परीक्षण में अपने विरोधियों को संयुक्त रूप से चारों खाने चित ही कर दिया। इससे एक बात साफ हो गयी है कि हरीश रावत आज भी अपने तमाम विरोधियों के मुकाबले प्रदेश के संगठन व आम जनता में पकड़ की दृष्टि से 21 ही हैं।
उल्लेखनीय है कि 16 मई सोमवार को हुए युवक कांग्रेस की प्रांतीय कमेटी के चुनाव में अध्यक्ष पद पर केंद्रीय राज्य मंत्री हरीश रावत के पुत्र आनंद सिंह रावत ने एकतरफा जीत दर्ज की। उन्होंने 556 मत हासिल कर इस कुर्सी पर कब्जा जमाया। उपाध्यक्ष पद पर ज्योति रौतेला विजयी रहीं, उन्हें 115 मत हासिल हुए। संग्राम सिंह पुंडीर(91), ओमप्रकाश सती बब्बन(60) व प्रदीप तिवारी ओपन वर्ग से महासचिव चुने गए। मुख्य चुनाव अधिकारी आबिद खान के मुताबिक चुनाव में 1218 मतदाताओ में से 1150 ने मताधिकार का प्रयोग किया।प्रांतीय कमेटी के लिए सर्वाधिक 556 वोट अर्जित करने पर आनंद सिंह रावत को अध्यक्ष निर्वाचित घोषित किया गया। दूसरे स्थान पर सबसे अधिक वोट पाने वाली ज्योति रौतेला (115) को उपाध्यक्ष घोषित किया गया। ओपन वर्ग में संग्राम सिंह पुंडीर (91), ओमप्रकाश सती बब्बन (60) व प्रदीप तिवारी (52) महासचिव निर्वाचित हुए। वहीं अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षित महासचिव पद पर राजेश नौटियाल (42), अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित महासचिव पद पर तैफ अली खान (39) व ओबीसी को आरक्षित महासचिव पद पर वरुन चैधरी (21) चुने गए। इसके साथ क्षेत्रीय कमेटियों का चुनाव में पौड़ी में हिमांशु बिजल्वाण (73), अल्मोड़ा में भूपेंद्र सिंह (98), हरिद्वार में तेलूराम (105) व टिहरी लोस क्षेत्र कमेटी में जसविंदर पाल सिंह गोग्गी (85) नैनीताल लोस क्षेत्र कमेटी में भुवन चंद्र कापड़ी (79), अध्यक्ष चुने गए। इसके अलावा अन्य पदाधिकारी भी निर्वाचित घोषित किए गए।
इस चुनाव से एक बात भी साफ हो गयी है कि भले ही कांग्रेसी नेता व प्रभारी चोधरी वीरेन्द्र सिंह लाख घोषणायें कांग्रेसी एकजूटता के कर लें परन्तु आगामी विधानसभा चुनाव में प्रदेश क्षत्रपों की मुख्यमंत्री बनने की अंधी लालशा के चलते कांग्रेसी नेता एकजूट हो कर प्रदेश में भाजपा को चुनाव में परास्त करने के बजाय एक दूसरे को ही हराने में जुटे रहेंगे। इसी कारण कांग्रेस गत विधानसभा चुनाव में बहुमत के करीब नहीं पंहुच पायी व आगामी विधानसभा चुनाव में भी यही पुनरावृति हो जाय तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। जिस प्रकार से तिवारी के सबसे करीबी सहायक रहे आरेन्द्र शर्मा ने डोईवाला विधानसभा चुनाव से ताल ठोकी है उससे एक बात स्पष्ट हो गयी कि आगामी विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद अगर कांग्रेस सत्तासीन होती है तो तिवारी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद के लिए विजय बहुगुणा को अपना आर्शीवाद दे दिया है। क्योंकि डोईवाला विधानसभा सीट पर बिजय बहुगुणा की संसदीय सीट का हिस्सा होने के साथ साथ उनकी तिवारी से निकटता जग जाहिर है। प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य तो सदैव तिवारी के ही कृपा पात्र रहे, वे तिवारी की इच्छा के खिलाफ एक कदम भी उठाने की जरूरत भी नहीं कर सकते है। सतपाल महाराज ही नहीं हरक सिंह रावत भी तिवारी से आज के दिन भी दूरियां नहीं बना सकते है। इस लिए आगामी विधानसभा चुनाव भले ही कहने को भाजपा व कांग्रेस के बीच होगा असल में यह चुनाव तिवारी व हरीश रावत के बीच में ही खेला जायेगा। इन चुनाव में एक यही महत्वपूर्ण बदलाव हुआ कि तिवारी की कभी दाहिना हाथ समझी जाने वाली इंदिरा हृदेश आज हरीश रावत की प्रमुख सिपाहे सलार बनी हुई है।
गत विधानसभा चुनाव में भी जब हरीश रावत ने प्रदेश में कांग्रेस सरकार के गठन के लिए जरूरी विधायकों का प्रबंध कर लिया था वे अपने समर्थक विधायकों को लेकर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाने के लिए अगले ही दिन राज्यपाल के समक्ष विधायकों की परेड़ भी कराने ही वाले थे कि तभी तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी व उनके दिल्ली में मठाधीश बने बंद कमरों के मठाधीशों ने कांग्रेस आलाकमान को गुमराह कर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने से रोक दिया। इसी कारण प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी। तिवारी व उनके दिल्ली बैठे नेताओं को प्रदेश में भाजपा की सरकार मंजूर थी परन्तु किसी भी हालत में वे प्रदेश में हरीश रावत को मुख्यमंत्री के पद पर बेठे हुए देखना किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं था। कांग्रेसी मठाधीशों के इस दाव का कांग्रेस ने पूरे देश में खमियाजा भुगतना पड़ा। इसके बाद यहीं पर नहीं रूका। केन्द्र में कांग्रेस सरकार बनने के बाद भी देश के अग्रणी जननेताओं में विख्यात वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हरीश रावत को दरकिनारे करके उनको राज्यमंत्री के पद पर आसीन कर श्रम मंत्रालय में आसीन किया गया। जबकि उनसे कहीं कनिष्ठ व जनता से कटे हुए लोगों को कबिना मंत्री व स्वतंत्र प्रभार के महत्वपूर्ण मंत्रालयों में आसीन किया गया। यही नहीं हरीश रावत की पूरे देश की आम जनता व संगठन में पकड़ को देखते हुए उनको संगठन व सरकार में महत्वपूर्ण दायित्व सोंप कर कांग्रेस को मजबूत किया जाना चाहिए था। परन्तु दिल्ली में आसीन जातिवादी व बंद कमरों के सूरमाओं को ऐसा कोई नेता फूटी आंखों से नहीं सुहाता जो जनता में मजबूत पकड़ रखता हो। इसी कारण प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर हरीश रावत को इस तथ्य के बाद भी दूर रखा गया कि प्रदेश में आसीन भाजपा सरकार को उखाड़ फैंकने में अगर कोई आम कांग्रेसी कार्यकत्र्ताओं के साथ जनता को भी लामबद करने में हरीश रावत वर्तमान में मुख्यमंत्री के दावेदार बने सभी नेताओं पर 21 ही साबित होते है। इन तमाम तथ्यों को सामने रखते हुए अगर आलाकमान आगामी विधानसभा चुनाव की कमान साफ रूप से हरीश रावत के हाथों में नहीं सौंपती है तो आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की गत विधानसभा जैसी दुर्गति हो जाय तो राजनीति के किसी भी समीक्षकों को आश्चर्य नहीं होगा।

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