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Monday, May 2, 2011

अफगानिस्तान पर रूसी हमले ने बनाया ओबामा को खुंखार जैहादी

मरे हुए ओसमा से भी सहमा अमेरिका
अफगानिस्तान पर रूसी हमले ने बनाया ओबामा को खुंखार जैहादी

ओसमा बिन लादेन अपने जीते जी तक अमेरिका के अमन शांति पर ग्रहण लगाता रहा परन्तु मरने के बाद भी उसके खोप से अमेरिकी हुक्मरान भयभीत रहे। इसका जीता जागता प्रमाण ओसमा के शव को इस्लामी तरीके से धरती के किसी कोने में दफनाने के बजाय अमेरिका ने उसे आनन फानन में अज्ञात समुद्र में दफनाने का ऐलान किया। अमेरिकी हुक्मरानों को इस बात का खौप है कि लादेन की कब्र भी अमेरिकियों के अमन चैन पर ग्रहण लगाने वालों के लिए प्रेरणा की पूंज बन सकती है। इसी भय से ओसमा के शव को अमेरिकी हुक्मरान धरती पर दफनाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाये।
विश्व में सबसे खौपनाक आतंकी के रूप में कुख्यात ओसमा बिन लादेन जन्म सऊदी अरब के धन कुबैर व निर्माण उद्यमी मुहम्मद अवाद बिन लादेन के 52 बच्चों में 17 वें नम्बर की संतान थी। बहुत ही शान व शौकत में बचपन व युवा जीवन जीने वाला ओसमा बचपन से धार्मिक प्रवृति का था। उसके जीवन पर सोवियत संघ द्वारा अफगानिस्तान पर आक्रमण ने आमूल प्रभाव डाला। इस आक्रमण ने उसकी जीवन की दिशा ही नहीं अपितु विश्व इतिहास की दिशा भी बदल डाली। धर्मभीरू ओसमा को खुंखार मुजाहिदीन बनाने में अमेरिका का बहुत ही शर्मनाक संरक्षण रहा। अमेरिका ने उसकी धर्मभीरूता को न केवल हवा दिया अपितु उसको संरक्षण भी दिया जो बाद में अमेरिका के लिए ही नासूर साबित हुआ। अमेरिकी धरती पर अब तक के सबसे भीषण आतंकवादी हमले का सूत्रधार बना लादेन 1979 में मुजाहिदीन नाम से पहचाने जाने वाले लड़ाकों की मदद के लिए अफगानिस्तान गया। लादेन एक गुट का मुख्य आर्थिक मददगार बन गया, जो बाद में अल कायदा कहलाया।
1989रू अफगानिस्तान में सोवियत संघ के हटने के बाद लादेन परिवार की निर्माण कंपनी के लिए काम करने के उद्देश्य से सउदी अरब लौट गया। यहां उसने अफगान युद्ध में मदद के उद्देश्य से अपने साथियों से कोष जुटाना शुरू कर दिया। उसकी कट्टरपंथी व सरकार विरोधी गतिविधियों को देखकर 1991 में लादेन को सऊदी अरब से निष्कासित किया गया। सऊदी अरब ने उसकी और उसके परिवार की नागरिकता को वापस ले लिया। उसने सूडान में शरण ली। परन्तु 1993 वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर बम धमाका हुआ उसमें छह की मौत हुई व सैकड़ों घायल हुए। अमेरिकी अधिकारियों ने इसके लिए छह मुस्लिम कट्टरपंथी दोषी ठहराए जिनका संबंध लादेन से था। उसके बाद1995 में नैरोबी और तंजानिया के दार-ए-सलाम में अमेरिकी दूतावासों के बाहर बम विस्फोट में 224 की मौत हुई। 1996 अमेरिकी दबाव के कारण सूडान ने भी लादेन को निष्कासित किया। लादेन अपने 10 बच्चों और तीन बीवियों को लेकर अफगानिस्तान पहुंचा। यहां से उसने अमेरिकी बलों के खिलाफ खुले जिहाद की घोषणा की। 1998 अमेरिका की एक अदालत ने दूतावासों पर बमबारी के आरोप में लादेन को दोषी ठहराया। उसके सिर पर 50 लाख डॉलर का इनाम रखा गया। उसके बाद सन् 2000 यमन में हुए एक आत्मघाती हमले में 17 अमेरिकी नाविकों की मौत का जिम्मेदार भी लादेन को ही माना गया। परन्तु सबसे खौपनाक मंजर दुनिया को तब देखने में आया जब 11 सितंबर 2001 को अमेरिका की वल्र्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टॉवर्स और पेंटागन पर हवाई जहाजों से आत्मघाति हमला किया गया, इस हमले में 3,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और अमेरिका ने इसके लिए बिन लादेन के नेतृत्व वाले अलकायदा को जिम्मेदार मानते हुए अफगानिस्तान के तत्कालीन तालिबानी शासक से लादेन सहित अलकायदा के वरिष्ठ आतंकियों को उसे सौंपने की दो टूक चेतावनी दी। जिस पर अनकुल प्रत्युतर न मिलने पर अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर वहां कब्जा कर दिया। अमेरिकी सुरक्षा बल अफगानिस्तान स्थित तोरा-बोरा की पहाड़ियों में छिपे लादेन को मारने में असफल रहे। यहां पर लडाई में अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो सेनाओं ने भी हजारों सैनिक को खाने के बाबजूद लादेन व अलकायदा के वरिष्ठ कमांण्डर ही मार पाये व नहीं तालिबानी शासकों को ही मार पाये। हाॅं अमेरिका के हमले में हजारों नागरिक सहित सैकड़ों आतंकी भी मारे गये। 2002 अमेरिका नीत सैन्य अभियान तेज हुआ। गठबंधन बलों ने मैदानी सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ाई। लादेन पर्दे के पीछे रहा। लेकिन कुछ समय बाद अल-जजीरा ने उसकी आवाज वाले दो ऑडियो टेप प्रसारित किए। 2003 में ओसामा ने दुनिया भर के मुसलमानों से अपने मतभेद दूर करके जिहाद में भाग लेनें की मार्मिक अपील की। 2004 चार जनवरी को, अल-जजीरा ने दोबारा लादेन के टेप जारी किए। 2004 मार्च में अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने अफ-पाक सीमा के पास लादेन के लिए खोज अभियान और तेज किया। वहीं 2009 में अमेरिकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स ने कहा कि अधिकारियों के पास कई सालों से लादेन के पते के बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी नहीं है। इसके बाद अगस्त 2010 से विशेष लादेन के सफाये हेतु चलाये गये अभियान के तहत उस समय सफलता मिली जब अमेरिका के ‘शील’ नाम के 40 विशेष कमांडो युक्त टुकड़ी ने पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 60 किमी दूरी पर 8 लाख आबादी वाले एबटाबाद शहर में 2 मई की प्रातः 12.30 बजे चार सैन्य हेलीकप्टरों से युक्त हमले में लादेन को सदा के लिए मौत की नींद सुला दिया। इस मिशन को मुकाम परपंहुचने के लिए अमेरिका ने लादेन के उस विशेष भरोसेमंद दूत की जासूसी की जो इस मकान में लादेन का संदेशवाहक बना हुआ था। इस घर की गतिविधियों पर सीआईए के विशेषज्ञों ने सेटलाइट से भी निगरानी की। लादेन की जरूरत से ज्यादा सावधानी भी उस पर अमेरिकी खुपिया ऐजेन्सियों का ध्यान केन्द्रीत करने में सहायक हुई। पाकिस्तानी सैन्य अकादमी के समीप वाले क्षेत्र में आलीशान कालोनी में 2005 में बने इस भव्य मकान में बिजली, टेलीफोन व इंटरनेट सहित कोई भी अत्याधुनिक सुविधाओं से वंचित रखने की ओसमा की सावधानी से यह हवेली अमेरिकी खुफिया ऐजेन्सियों की नजर में चढ़ गयी। यहां से आवाजाही ना के बराबर थी। जब खुफिया ऐजेन्सियों को इस बात का यकीन हो गया कि इसमें ओसमा लादेन अपनी दो बेगमों व 7 बच्चों के साथ रहता है तो उन्होंने यहां पर हमला करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति से आज्ञा मांगी, जिसको राष्ट्रपति ओबामा ने बिना समय गंवाये तुरंत दे दी। इस हमले में उसके साथ उसका बड़ा बेटा भी मारा गया।सुत्रों के अनुसार वह विगत 5 सालों से इसी मकान में आराम से रह रहा था। इसके साथ ही उसकी दो बीवियों तथा 6 बच्चों को गिरफ्तार कर लिया।
ओसमा बिन लादेन का खौप मरने के बाद भी अमेरिकी हुक्मरानों के जेहन से कम नहीं हुआ। अमेरिकी हुक्मरान इस बात से भी भयभीत थे कि अगर ओसमा का दुनिया के किसी भी भूभाग में दफना दिया गया तो उसकी कब्र भी उसके समर्थकों के लिए अमेरिका को तबाह करने की प्रेरणा देती रहेगी। इसी आशंका से भयभीत अमेरिका ने गुपचुप तरीके से ओसमा बिन लादेन के शव को डीएनए परीक्षण की पुष्टि के बाद समुद्र में दफना देने की घोषणा की।




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