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Friday, November 23, 2012


प्रगति मैदान व्यापार मेले में 24 नवम्बर को उत्तराखण्ड दिवस पर भी उत्तराखण्डी समाज की उपेक्षा क्यों?

उत्तराखण्ड सरकार की उदासीनता से उपेक्षित है दिल्ली के 30 लाख उत्तराखण्डी

हिमाचल, केरल व आंध्र प्रदेश की तरह दिल्ली में अपने समाज को नहीं जोड़ पायी उत्तराखण्डी सरकार

दिल्ली में 14 नवम्बर से लगे अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले के भव्य आयोजन में जहां उत्तराखण्ड भागीदार राज्य है। इस मेले में प्रत्येक राज्य अपना दिवस मनाता है। 24 नवम्बर को इस मेले में उत्तराखण्ड दिवस मनाया जायेगा। परन्तु दिल्ली में रहने वाला उत्तराखण्ड के 30 लाख से अधिक उत्तराखण्डियों को इसकी भनक तक नहीं है। 12 सालों से मैं इस समारोह में अधिकांश भाग लेता हॅू परन्तु मैने जिस प्रकार से प्रदेश के लाखों रूपये झोंक कर यहां पर उत्तराखण्ड दिवस व उसमें सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाता है, उसमें खाना पूर्ति की भीड़ को देख कर अगर इनके अधिकारी व नेता कभी दिल्ली के उत्तराखण्डी बाहुल्य क्षेत्रों में आयोजित सांस्कृतिक समारोह की तरफ देखते तो उनको खुद अपने इस कृत्य पर शर्म आती। इस समारोह के पास ऐसे लोगों को दिये जाते  है या तो वे इस समारोह में न आते हैं व नहीं उनको उत्तराखण्डी संस्कृति से दूर दूर तक कोई लगाव तक नहीं है। जो समाज अपनी संस्कृति व प्रदेश के विकास के लिए दिलों में स्थान देता है उसको न तो इस समारोह से व नहीं खुद से जोड़ने से सरकार ने कभी ऐसी पहल की जिस प्रकार की पहल हिमालय के प्रथम मुख्यमंत्री यशवंत परमार ने दिल्ली के हिमाचली ही नहीं उत्तराखण्डी समाज को बार बार एकजूट कर प्रेरित करके किया था। आज उन्हीं की बदोलत हिमाचल उत्तराखण्ड को ही नहीं अपितु देश के अधिकांश राज्यों को पछाड़ कर देश का सबसे शांत व विकसित राज्य बन गया है।
दिल्ली में अन्य राज्यों की तरह प्रदेश से वेतन डकारने के लिए यहां उत्तराखण्ड सरकार के कई भवन हैं। इसमें चाणाक्यपुरी में उत्तराखण्ड निवास व उससे कुछ ही दूरी पर बना उत्तराखण्ड सदन। इसके अलावा बाराखम्बा रोड पर उत्तराखण्ड मुख्य स्थानिक आयुक्त, गढ़वाल व कुमायूं मण्डिल विकास निगम का कार्यालय, चाणाक्यपुरी में उत्तराखण्ड सूचना केन्द्र व मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारी, सहित अन्य कार्यालय है। परन्तु 12 साल बाद भी उत्तराखण्डियों को जोडने की दिशा में प्रदेश सरकार व उनके अधिकारियों ने कोई ऐसी पहल तक नहीं की जैसे आंध्र प्रदेश, केरल, आदि राज्यों के इसी प्रकार के विभाग यहां अपने राज्य के समाज को अपने साथ जोड़ने की करते है। राष्ट्रीय धरनास्थल से सटे जंतर मंतर रोड़ पर स्थित केरल भवन में कभी ओणम व कभी अन्य कार्यक्रम से मलयाली समाज यहां पर बडे उत्साह से जुड़ता है। आंध्र प्रदेश व मध्य प्रदेश में भी न केवल इन प्रदेशों के अपितु दूसरे प्रदेशों के लोग भी दूर दूर से जुडते है। परन्तु क्या मजाल है उत्तराखण्ड जैसे देवभूमि की सरकार व वहां के प्रशासन ने राज्य गठन के बाद भी देश विदेश के लोगों को जोड़ने की मजबूत पहल करनी तो रही दूर दिल्ली में रहने वाले 30 लाख जागरूक उत्तराखण्डियों को ही जोड़ने की ईमानदारी से पहल नहीं की। जबकि यहां पर उत्तराखण्ड महोत्सव व स्थाापना दिवस या वहां के प्रसिद्ध विखौती या बग्वाल आदि उत्सवों का भी आयोजन किया जाना चाहिए था। यहां पर उत्तराखण्डी संस्कृति व खान पान आदि का विशेष आयोजन होना चाहिए था। जिस प्रकार से लोग दक्षिण भारतीय खाने के लिए आंध्र प्रदेश भवन दूर दूर से जाते हैं, उसी प्रकार उत्तराखण्डी भोजन के लिए लोग दिल्ली में उत्तराखण्ड निवास में भी आ सकते है। परन्तु न तो यहां के नेताओं व नहीं यहां के नौकरशाहों को इस दिशा में कुछ करने की ललक है व नहीं सुध। उनका ध्यान तो केवल प्रदेश के संसाधनों को कैसे पौंटी जैसे लोगों व उनके प्यादों को लुटवाने में ही लगा रहता।
हालांकि दिल्ली को एक प्रकार से उत्तराखण्ड मय है। यहां दिल्ली में उत्तराखण्डी समाज दिल्ली की कुल आवादी का सातवें हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रमुख समाज है। यहां उत्तराखण्ड के 30 लाख से अधिक लोग राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में निवास करते है। उत्तराखण्ड में उप्र व वर्तमान प्रदेश सरकार द्वारा रोजगार, शिक्षा व चिकित्सा आदि महत्वपूर्ण  क्षेत्रों में की गयी उपेक्षा के कारण यहां से अधिकांश लोग रोजी रोटी व शिक्षा दीक्षा के लिए मजबूरी में यहां पर पलायन का दंश पीढ़ी दर पीढ़ी झेलना पडता है। इन्हीं पलायन के दंश झेले हुए दिल्ली, मुम्बई, लखनऊ सहित देश विदेश में रहने वाले उत्तराखण्डियों ने आपसी सहयोग व शासन प्रशासन पर दवाब डाल कर उत्तराखण्ड में शिक्षा, चिकित्सा, मोटर मार्ग सहित अन्य विकास व व्यापक जनजागरण के कार्य किये। यही नहीं उत्तराखण्ड राज्य गठन में भी उत्तराखण्ड के लोगों ने संसद की चैखट पर निरंतर 6 साल तक निरंतर सफल धरना प्रदर्शन करके देश में राज्य निर्माण के इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित किया। देश में अब तक किसी भी राज्य गठन के लिए देश की राजधानी में इतना लम्बा जीवंत आंदोलन नहीं चलाया गया था। इसके साथ देश विदेश में भी यह आंदोलन के समर्थन में लोगों ने बैठकें, सभायें व रैलियां निकाली। आज राज्य गठन के 12 साल बाद जब यही समाज प्रदेश सरकार व उसके शासन प्रशासन से कोई अपनत्व भरा स्नेह भी नहीं पाते तो उनके दिलों व दिमाग में कैसी पीड़ा व अपमान होता होगा इसका अहसास प्रदेश के हुक्मरानों को कहां?

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