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Friday, November 9, 2012


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दावत ने हजारों लोगों को रूलाया

देश के हुक्मरानों के कदमों तले दम तोड़ती भारत की लोकशाही


9 नवम्बर की सांय को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आवास पर दी गयी दावत ने रेसरोड़ व उसके आसपास से जुडे तमाम रोड़ों पर लम्बे
 समय पर जाम में फंसा कर बहुत ही बेदर्दी से रूलाया। अपने घर के अन्दर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनको अपने समर्थन की बैशाखियों का सहारा देने वाले मुलायम व अन्य दावत का आनन्द ले रहे होगें वही उनके घर के आस पास मीलों तक उनकी इस दावत के कारण जाम में फंसे हजारों देश के आम नागरिक अपनी बेबसी पर भारतीय लोकशाही का कहर सह रहे थे। मनमोहन सिंह व उसकी सरकार के बद इंतजामी व अलोकतांत्रिक मनोवृति के कारण इस जाम में फंस कर भारतीय लोकतंत्र के इस नीरो के लिए आम आदमी की बेबसी के आंसू को पीने वाला मैं अकेला नहीं मेरे जैसे हजारों लोग रेस कोर्स रोड़ से लेकर उसके आस पास मीलों दूर तक फंसे हुए थे । हालांकि मुझे सुबह से भनक थी कि 9 नवम्बर की रात को प्रधानमंत्री अपनी सरकार को अपने समर्थन की बैशाखियों का सहारा देने वाले मुलायम सिंह यादव, उनके सुपुत्र यानी उप्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, मुलायम के भाई रामगोपाल सहित मंत्री सांसद के रूप में विराजने वाले उनके पूरे कुनबै को दावत दे रहे हैं। खुफिया ऐजेन्सी भी इस खबर की पुष्टि के लिए इधर उधर अंधेरे में हाथ मार रही थी।
मैं अग्रणी समाजसेवी महेश चन्द्रा के साथ एक कार में 7 रेसकोर्स रोड़ पर 7 बजे से आठ बजे के करीब प्रधानमंत्री के घर के आसपास 200 मीटर की इस रोड़ पर जाम में इस पार्टी के कारण फंसे रहे। परन्तु उन आम आदमियों की चिंता न तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हुई, न उनके मंत्रियों व नहीं उनकी जनविरोधी सरकार को अपने निहित स्वार्थो के कारण समर्थन दे रहे मुलायम सिंह यादव जैसे समर्थक दलों को होगी। देश के भ्रष्टतम शासन प्रशासन को आम आदमी के इस लाचारी का कभी भान ही नहीं रहा। लगता है मनमोहन जैसे जनता पर अपने कुशासन का कहर ढालने वाले प्रधानमंत्री व उनके प्रशासन को जनता को कभी मंहगाई व कभी भ्रष्टाचार आदि से बेहाल करने के बाद इस प्रकार से रूलाने में अपार आनन्द मिलता है। अगर मनमोहन सिंह व उनके शासन प्रशासन को जनता का जरा सा भी ख्याल रहता तो वे कभी जनता को इस प्रकार से कभी परेशान नहीं करते। क्या प्रशासन को जनता को बेवजह परेशान करने में आंनन्द आता है। क्या यही भारत का लोकतंत्र है ? क्या आम जनता को ऐसे जनप्रतिनिधि चुनने का यही दण्ड यह तंत्र देता है। यह सवाल केवल कांग्रेस या भाजपा या अन्य दल का नहीं है। इस देश में सरकार किसी की रहे, उसकी नजर में आम आदमी को कोई इज्जत नहीं। देश के इन हुक्मरानों के आने जाने व दावतों में इस प्रकार से हर दिन यत्र तत्र लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है। प्रधानमंत्री व उनका प्रशासन आजादी के 65 साल बाद भी इस प्रकार के अलोकतांत्रिक समस्या का समाधान तक नहीं खोज पाये। या खोजने की सुध तक भी इन्हें नहीं रही। अगर इन हुक्मरानों को आम आदमी से इतना ही भय है तो ये क्यों लोकशाही में जनप्रतिनिधी बनते हैं। इनको यह देश छोड़ कर अमेरिका या इनका कार्यालय या आवास किसी निर्जन द्वीप में बना देना चाहिए जहां ये जहाज या हेलीकप्टर से जा कर वहां अपनी बैठक या दावत वहीं होनी चाहिए। जिससे आम आदमियों को किसी प्रकार की परेशानी इनके आने, जाने या दावत आदि से नहीं होगी। संसार में सबसे बडे लोकतांत्रिक देश होने का दम भरने वाले भारत में लोकशाही की हकीकत यही है कि यहां आज भी राजशाही से बदतर घिनौना चेहरा, देश के तथाकथित जनप्रतिनिधी व नौकरशाह, देश की मालिक आम जनता को हुक्मरान बन कर कैसे अपने कदमों तले रूलाती है यह इनके आने जाने व दावत आदि कार्यो के कारण घण्टों जाम में फंसे हुए बेबश आम आदमी से बेहतर कौन जान सकता है।
 

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