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Wednesday, December 26, 2012


गैंगरेप की पीडि़ता को सिंगापुर में इलाज के लिए भेजा पर दिल्ली में हुआ फिर सामुहिक बलात्कार


23 व 23 दिसम्बर को शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर ढाये पुलिस के अमानवीय कहर पर क्यों मूक हैं मानवाधिकार वाले

नई दिल्ली। एक तरफ सरकार ने दिल्ली में 16 दिसम्बर को सामुहिक बलात्कार की शिकार हुई पीडि़ता को इलाज के लिए सिंगापुर भेजने में जुटी हुई थी उसी दिन वृंदावन का एक गाइड दलिप ने जयपुर से दिल्ली आयी एक महिला से अपने साथियों के साथ सामुहिक बलात्कार करके महिला को को दिल्ली के कालका जी के पास फेंकने की खबर से बलात्कार के मामले पर सरकार के रवैये व पुलिसिया दमन से जनाक्रोश से धधक रही दिल्ली सहित पूरे देश के लोगों की त्योरियां और चढ़ गयी। महिला की शिकायत कालका जी थाने में दर्ज की गयी। एक तरफ सरकार दिल्ली में हो रहे एक के बाद एक बलात्कार को रोकने में असफल रही है वहीं वह बलात्कारियों को कडी सजा देने के लिए न तो अध्यादेश ही ला रही है व नहीं संसद का विशेष सत्र बुला कर जनभावनाओं के अनुरूप कठोर कानून ही बना रही है। उल्टा दोषियों को कड़ी सजा देने व इसके लिए कठोर कानून अविलम्ब बनाने की मांग को लेकर सडकों पर उतर कर न्याय की मांग कर रही शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को लाठियों, व आंसूगैस आदि से प्रहार कर उनके लोकतांत्रिक व मानवाधिकार अधिकारों का गला घोंटने पर लगी है।
जिस प्रकार से 22 व 23 दिसम्बर को इस दुराचार की घटना से आक्रोशित शांतिप्रिय आंदोलनकारियों का आंदोलन कुचलने के लिए पुलिस प्रशासन ने असामाजिक तत्वों की आड़ में 22 दिसम्बर को राष्ट्रपति भवन की चैखट विजय चैक पर व 23 दिसम्बर को इडिया गेट पर आंदोलन को शांतिपूर्ण रूप से नियंत्रण में रखते हुए अण्णा आंदोलन के प्रमुख स्तम्भ व जनांदोलनों के महत्वपूर्ण योद्धा अरविन्द गौड अपने अस्मिता नाटय मंच के नाट्य महिला कलाकारों के साथ जुटे हुए थे। उनको ही नहीं सैकडों महिलाओं की शांतिपूर्ण आंदोलन को दिशा दे रही अस्मिता नाट्य मंच के प्रतिभावान महिला कलाकारों पर जो बर्बरता पूर्ण कहर दिल्ली पुलिस ने ढाया उसको देख कर अरविन्द गौड़ आज भी बेहद आहत है। 25 दिसम्बर को जब वे जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन को देखने आये थे व वहां पर चाय की दुकान पर चाय पी रहे थे तो मेरी उनसे भैंट हो गयी। उन्होंने सारी घटना को विस्तार से बताते हुए दिल्ली पुलिस सहित तमाम उन लोगों का धिक्कारा जो मानवाधिकारों का अमानवीय दमन कर रही पुलिस की 22 व 23 दिसम्बर की बर्बर कार्यवाही को जायज ठहरा रहे हे। जनांदोलनों से सशक्त हस्ताक्षर रहे अरविन्द गौड़ को अपने पूरे वदन पर लाठियों के प्रहारों से ज्यादा पीड़ा नेतृत्व विहिन हजारों की भीड़ को शांतिपूर्ण दिशा दे रही अस्मिता ग्रुप की महिला कलाकारों पर अमानवीय ढ़ग से पुरूष पुलिसवालों का हैवानियत ढ़ग से लाठियों से दमन करने से हो रहा है। उन्होंने मानवाधिाकाारों के लिए घडियाली आंसू बहाने वालों को भी धिक्कारते हुए कहा कि वे अब क्यों मूंह छुपाये हुए है। उनको सरेआम शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों का दमन करने वाली पुलिस प्रशासन का कहर क्यों नहीं दिखायी दे रहा है। श्री गौड ने कहा कि अगर सरकार सहित इस व्यवस्था को जरा भी शर्म होती तो इस दमन के दोषी पुलिस वालों को तत्काल बर्खास्त करके देश से माफी मांगती।
23 दिसम्बर को केवल अरविन्द गौड ही नहीं अपितु भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव जो अपनी बेटियों के साथ इस आंदोलन के समर्थन देने को आये थे उनको भी लाठियों से कहर ढाया। वहीं देश के अग्रणी चिंतक योगेन्द्र यादव पर भी कई पुलिस वालो ंने लाठियों की मार से कहर ढाया। 26 दिसम्बर को जब वे जंतर मंतर पर तेलांगना आंदोलनकारियों व बलात्कारियों को सजा की मांग कर रहे आंदोलनकारियों को समर्थन देने आये थे तो उनसे मेरी भेंट हुई। उन्होंने बताया कि पुलिस की लाठियों से कराह रही महिला को बचाने को गया तो उस पर भी कई पुलिस वालों ने ताडबतोड़ लाठियां बरसा दी। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों, महिलाओं व बच्चों तथा बुजुर्गो पर कहर ढाने वाली पुलिस की कार्यवाही बेहद निदनीय और लोकशाही का गला घोंटने वाली है। वहीं इस प्रकरण में अरविन्द केजरीवाल को ही नहीं दिल्ली पुलिस के कहर से रामदेव व पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह भी नहीं बचे। दिल्ली पुलिस द्वारा देश के पूर्व सेनाध्यक्ष पर लाठी का प्रहार की बात से ही दिल्ली पुलिस व प्रशासन की अदूरदर्शिता व विवेकशून्यता के बारे में क्या कहा जाय। देश के संवेधानिक महत्वपूर्ण पदो ंपर आसीन व्यक्ति पूर्व हो या वर्तमान देश की शान होती है। फिर सेना का मामला बहुत ही संवेदनशील है। इस प्रकरण पर दिल्ली पुलिस के आयुक्त सहित उस स्थान के उच्चाधिकारी तथा दोषी कर्मी को अविलम्ब नौकरी से बर्खास्त करके सरकार को देश से माफी मांगनी चाहिए थी।
दिल्ली पुलिस के जवान की मौत से पूरा देश दुखी है। इस प्रकार की घटनायें नहीं होनी चाहिए। परन्तु जिस प्रकार से चश्मदीद व्यक्ति व चिकित्साधिकारी ने पुलिस के दावों पर सवालिया निशान खडे किये उससे लगता है कि पुलिस दुराग्रह से निर्दोष व्यक्तियों को फंसा कर आंदोलन को रौंदना चाहती है। यह सत्यमेव जयते का आदर्श आत्मसात करने वाली भारत की संस्कृति का अपमान ही नहीं देश के संविधान का अपमान के साथ साथ पुलिसिया शक्तियों का खुला दुरप्रयोग भी है।
 

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