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Monday, December 31, 2012


आइसा से प्रेरणा लें नेताओं की चाटुकारिता छोड़ जनहितों के लिए संघर्ष करें कांग्रेस व भाजपा के छात्र संगठन


दामिनी को श्रद्धांजलि देने के लिए आइसा व अस्मिता ग्रुप का जेएनयू के समीप पार्क में भारी जनजागरण 

दिल्ली में भले ही आज हाड  को कंपकपाने वाली ठण्ड है। देश के हुकमरान जहां नव वर्ष का जश्न मनाने में जुटे होंगे। वहीं जंतर मंतर पर भी आधी रात को लोग दामिनी को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए जुटे रहे। वहीं भाकपा माले की छात्र संगठन आइसा के छात्र व अरविन्द गौड़ की नाट्य मण्डली से जुडे कलाकार जेएनयू के सामने मुनिरिका की तरफ को पढ़ने वाले पार्क में रात के 12 बजे विशाल नाट्य जनजागरण का आयोजन कर रहे है। वे दामिनी के हत्यारों को कड़ी सजा देने की मांग के साथ समाज से नारी के सम्मान करने का आवाहन कर रहे थे।  इसमें हजारों की संख्या में लोग जुटे हुए है। मुनिरिका के समीप रामकृष्ण पुरम में रहने वाले समाजसेवी आजाद खान ने अभी फेस बुक पर चैट करते हुए मुझे बताया कि वहां पर मध्य रात्रि तक पहले आइसा छात्र संगठन का हमे आजादी चाहिए नाटक का मंचन हुआ तथा उसके बाद यहां पर अरविन्द गौड के नाट्य  मंच ‘अस्मिता’ के कलाकारों ने इंडिया गेट पर हुई बरबर लाठी चार्ज का नाट्य मंचन किया।
आज 31 दिसम्बर को भी जब आइसा के सेकडों छात्रों का मार्च जंतर मंतर पर आया तो मेरे कानों  में उनके ‘सुना है साथी लाठी का असर मिठा मिठा होता है’ ढपली के संग सामुहिक गीत गुनगुनाते सुना तो मेरी समझ में आया कि क्यों तमाम राजनैतिक दलों से बढ़कर आइसा का संगठन है। जो समर्पण व तत्परता मुझे भाकपा(माले) के छात्र संगठन आइसा में देखने को मिला वह मुझे न तो 127 वर्ष पुरानी कांग्रेस के एनएसयूआई और राष्ट्रवाद का परचम फेहराने का दंभ भरने वाली भाजपा की छात्र ईकाई अभाविप(एवीबीपी)या अन्य किसी राजनैतिक दल के छात्र संगठन में नहीं दिखाई देता। मैने 1994 के उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन में सक्रिय भागीदारी के बाद अब तक के राष्ट्रीय व स्थानीय  आंदोलनों में मैने देखा आइसा की भागेदारी सब पर 21 है। 1994 में उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के समय में आज भी मुझे आइसा के प्रखर छात्र नेता चन्द्र शेखर के जंतर मंतर पर हमारे मंच पर ओजस्वी भाषण आज भी उनकी शहादत के बाद उनकी बरबस यादें दिलाता है। वहीं उस समय उत्तराखण्ड से गिरजा पाठक जैसे प्रखर छात्र नेता आज माले के नेताओं में जाने जाते हे। वहीं कुछ समय पहले इन्द्रेश मैखूरी की प्रखरता को आज भी उत्तराखण्ड ही नहीं अपितु पूरे देश की उदयमान छात्र नेताओं में जाने जाते रहे। आज भी उत्तराखण्ड में उनकी प्रखरता कहीं न कहीं भाजपा व कांग्रेस के थोपे हुए नेतृत्व को आइना दिखाते है। भले ही माले अपना लोकसभा में अपना प्रभाव चुनावों में उतना व्यापक दर्ज न करा पाया हो परन्तु उसकी छात्र ईकाई स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय मुद्दों पर हमेशा प्रखर व सजग रहती है। आज कांग्रेस व भाजपा का जनता से कटने का कारण मुझे एक यही समझ में आ रहा है कि इनकी छात्र ईकाईयों का जनता से कटे रहना है। भाजपा व कांग्रेस के नेतृत्व को चाहिए कि वह अपनी छात्र ईकाई को आइसा का अनुशरण करने की सीख दें। नहीं तो कांग्रेस व भाजपा में केवल सत्ता के दलालों या तथाकथित आला नेतृत्व की गणेश परिक्रमा करने वालों को महत्वपूर्ण पद मिलता वहीं आइसा में संघर्ष करने वालों को प्राथमिकता मिलती है। आज देश की छात्र ईकाई में केवल आइसा ही ऐसा छात्र संगठन है जो स्थानीय समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय मुद्दों पर प्रखतरा से अपनी छाप छोड़ते अपितु जनता के दमन व हितों के लिए प्रखरता से संघर्ष भी करते। दामिनी प्रकरण में भी आइसा की प्रखर उपस्थिति ने जनता को दिशा ही नहीं अपितु इस जनांदोलन को मजबूती देने की महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वहीं कांग्रेस व भाजपा के छात्र संगठन की भूमिका केवल रस्म अदायगी मात्र की रही।

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