Pages

Monday, December 10, 2012


21 दिसम्बर 2012 को नही होगी महाप्रलय

माया संस्कृति की कालगणना से आशंकित हैं पश्चिमी दुनिया 

भले ही अमेरिका सहित पश्चिमी दुनिया के लोग माया सभ्यता की काल गणना के अनुसार 21 दिसम्बर को 2012 महाप्रलय होने की आशंका से भयभीत है। परन्तु हजारों सालों से विश्व को ज्ञान व सभ्यता के दिव्य ज्ञान से आलौकित करने वाली सनातनी संस्कृति के ध्वजवाहक भारतीय पश्चिमी दुनिया के आधे अधूरे ज्ञान को देख कर इनकी मूर्खता पर हंस रहे है।उन्हें मालूम हैं कि अभी निकट भविष्य में भी कहीं सृष्टि में प्रलय नहीं आ रही है। उसका एक निश्चित समय है और वह समय अभी हजारों हजार साल दूर है।  भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से कालगणना का एक ऐसा दिव्य ज्ञान रहा है जिसके आगे वर्तमान विज्ञान भी नतमस्तक है।यहां सृष्टि के लय व प्रलय के साथ साथ दिन महिने साल आदि का बहुत ही वैज्ञानिक विधान हजारों सालों से विद्यमान है। जिस समय पश्चिमी दुनिया सहित पूरा विश्व अज्ञानता के अंधियारे में खानाबदोशी जीवन जी रहे थे उस समय भी भारतीय समाज अपने ज्ञान विज्ञान के आलौक में जी रहा था। समर्पित पत्रकार इमरान देशभक्त द्वारा प्रेषित इस आशय की एक विज्ञप्ति प्यारा उत्तराखण्ड मिली। इसमें रूड़की प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं0 रमेश  सेमवाल ने माया संस्कृति की 21 दिसम्बर को होने वाली प्रलय की अवधारणा का सिरे से नकारते हुए कहा कि माया सभ्यता के कालगणना के कलेन्डर के अनुसार आगामी 21 दिसम्बर 2012 को महाप्रलय का दिन नही होगा। पं0 सेमवाल ने इस दिन की महाप्रलय की भविष्यवाणी को ज्योतिषीय आधार पर नकारते हुए कहा कि इस दिन शनि तुला में राहु वृश्चिक में, सूर्य धनु में, गुरू वृषभ में और मंगल मकर राशि में होगा।  यह ग्रह स्थिति किसी महाप्रलय का संकेत तो नही देती, अलबत्ता अगामी कुछ वर्षाे में बड़ी आपदाओं जैसी ज्वालामुखी,आग्नि काण्ड इत्यादि जैसी जनहानि की आशंका अवश्य बनती है। उन्होने स्पष्ट किया कि भविष्यवाणी को पौराणिक अधार पर 21 दिसम्बर 2012 को महाप्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न होने की आशंका लेशमात्र भी नहीं है। 
ज्योतिषाचार्य श्री सेमवाल ने कहा कि पुराणों में पृथ्वी पर प्रलय का समय एक मन्वन्तर की समाप्ति पर माना जाता हैं। एक मन्वन्तर महायुगों का होता है। और एक महायुग में 71-71 सतयुग, त्रेतायुग,द्वापरयुग और कलयुग होते हैं। पं0 सेमवाल ने बताया कि वर्तमान कलयुग का समय पांच हजार सालों का समय ही बीता हुआ है। इस हिसाब से अभी कलयुग के खत्म होने में लाखों वर्ष बाकी हैं। फिर कुल 71 महायुगों के पूरे होने में और भी अधिक समय लगेगा। उन्होने कहा कि ज्योतिष अनुसंधान के अनुसार विश्व में कोई प्रलय कि सम्भावना नही है। भारतीय ज्योतिष विज्ञान हजारों वर्ष प्राचीन है। पं0 सेमवाल ने कहा कि पश्चिमी सभ्यता के वैज्ञानिक भी लोंगों को भ्रमित करतें है। जबकि भारतीय ज्योतिषी सबकी मंगल कामना करतें है। उनको डराते नहीं।
जहां तक मनुष्य सहित तमाम जीव जन्तुओं में हर पल मौत का भय व्याप्त होता है। यह सब अज्ञानता के कारण। क्योंकि भारतीय संस्कृति हर पल मृत्य को शास्वत सत्य मानती है। हर सांस को जीवन व मृत्यु मानती है। मौत जीवन का ही एक अभिन्न स्वरूप है। जन्म के बाद जीव हर पल मौत के मुंह में ही होता है। हमारे जीवन का निश्चित समय का जो पल हम जी चूके हैं उतना हम मर ही तो गये। मौत की प्रक्रिया सनातन प्रक्रिया है। जीव जीवन व मृत्यु दोनों को साथ साथ भोगता है। जीतने पल हम जीते हैं उतने पल मरते भी है। इसे शिव संहिता में विन्दुपात कहते है। जीवन की तरह मृत्यु शास्वत सत्य व दिव्य स्वरूप में लय का नाम है। केवल अज्ञानी जीव ही मृत्यु से भयभीत रहता है। इस सकल ब्रह्माण्ड का भी एक जीव की तरह अपना भी इसी प्रकार जीवन व मृत्यु का चक्र है। जिसे लय व प्रलय के नाम से जानते हे। इस रहस्यमय ब्रह्माण्ड के नियंता परंब्रह्म को जानने व समझने का अपना एक दिव्य विधान है। जब प्राणी अपने छुद्र मैं से परम ब्रह्माण्ड के नियंता मैं में जुड़ता है तभी उसको दिव्य सृष्टि व दिव्य ज्ञान का बोध होता है। इससे पहले जीव अज्ञानता के भंवर में फंस कर जन्म मृत्यु व प्रलय के द्वंद में फंस कर दुखी ही रहता है।  


No comments:

Post a Comment