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Tuesday, January 22, 2013


प्रधानमंत्री की दावेदारी की राह को आसान करने के लिए किया  आडवाणी ने गडकरी का विरोध !


लोग हैरान है कि लालकृष्ण आडवाणी ने संघ के प्रिय गडकरी को फिर से भाजपा का फिर से अध्यक्ष बनाने का विरोध क्यों किया। इसी के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने अपने पद से इस्तीफा दिया । निशंक को पाक साफ बताने वाले व कई विवादों में घिरे वर्तमान अध्यक्ष गडकरी की ताजपोशी पर लगा ग्रहण।  सुत्रों के अनुसार संघ की पहली पसंद होने व पार्टी में संविधान में संशोधन के बाबजूद लालकृष्ण आडवाणी के विरोध के कारण गडकरी फिर से राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बन पाये। इस प्रकार भाजपा में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का प्रत्याशी बनाने की चर्चाओं के बीच कभी पीएम इन वेटिंग के रूप में असफल रहे कभी भाजपा के लोहपुरूष समझे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी की तरफ मजबूती से एक एक चाल चल रहे है। लोग समझ नहीं पा रहे हें कि आडवाणी ने गडकरी जेसे बेहद कनिष्ट नेता का विरोध क्यों किया? परन्तु आडवाणी संघ के मंसूबों से भयभीत हैं। उनको मालुम है संघ की शक्ति जो प्रदेश स्तर के नेता गडकरी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना सकता है, तो संघ फिर से अध्यक्ष बने गडकरी को प्रधानमंत्री का दावेदार भी बना सकता है। संघ व भाजपा की राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि आडवाणी इसी आशंका से भयभीत हो कर अपने एकसूत्री मिशन ‘गडकरी हटाओ, प्रधानमंत्री बनने की राह आसान करो ’को साकार करने में लग गये।
संघ की वर्तमान नेतृत्व की गडकरी को तमाम विवादों के बाबजूद फिर से राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर आसीन करने के लिए भाजपा के वर्तमान संविधान में संशोधन तक कर दिया गया। आडवाणी संघ व भाजपा में वर्तमान नेताओं में से सबसे अधिक प्रखर नेता है, वे राजनीति के दाव पेच को बखूबी से समझते हैं। नेता प्रतिपक्ष पद से जिस प्रकार से जिन्ना प्रकरण के बाद संघ ने हटने के लिए मजबूर किया और आडवाणी के किसी चेहते को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के बजाय प्रदेश स्तर के नेता नितिन गडकरी को जिस रहस्यमय ढ़ग से संघ ने थोपा गया, संघ के इस दाव का अर्थ चतुर राजनेता आडवाणी बखूबी से समझते है। उनके सीने में आज भी भावी प्रधानमंत्री के पूर्व घोषित दावेदारी से जिस प्रकार आगामी 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए संघ व भाजपा ने उसकी दावेदारी को पुन्न न दोहरा कर उनको गहरा आघात दिया। भले ही वे इस अपमान को किसी से व्यक्त न भी कर पाये परन्तु उन्होंने आगामी लोकसभा चुनाव में अपने प्रधानमंत्री की दावेदारी को मजबूत करने वाले तमाम दाव बहुत ही सोच समझ कर चला रहे है। इसी के तहत उन्होंने फिर से रथ यात्रा का दाव चला कर अपने आप को प्रखर दावेदार के रूप में चर्चाओं में रखा। संघ नेतृत्व की आडवाणी को 2014 के लिए प्रधानमंत्री का दावेदारी का खुला समर्थन न करने तथा संघ विहिप के विरोध के बाबजूद जिस प्रकार से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी तेजी से भाजपा में ही नहीं देश के आम जनमानस के बीच प्रधानमंत्री के सबसे मजबूत उम्मीदवार बन कर उभर रहे है, उससे भी आडवाणी बेहद चिंतित हैं।  परन्तु आडवाणी को मोदी से अधिक खतरा संघ के चेहते बने नितिन गडकरी से लगने लगा था। चतुर राजनीतिज्ञ लालकृष्ण आडवाणी समझते हैं कि मोदी पर तो पार्टी में ही नहीं राजग गठबंधन में एकमत से स्वीकार्यता नहीं है। संघ परिवार में भी एक मजबूत लाबी मोदी की राह में हर संभव कांटे विछाने के लिए कमर कसे हुए है। आडवाणी को अपने प्रधानमंत्री बनने की राह में सबसे अधिक भय अगर किसी से रहा तो वह मोदी नहीं अपितु वह संघ के चेहते गडकरी से था। इसीलिए उन्होंने मजबूती से गडकरी को फिर से अध्यक्ष बनने से रोकने के लिए निर्णायक दाव खेला। उन्हें मालुम था कि अगर आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस चुनाव में पराजित हुई और भाजपा सबसे बडा दल बन कर उभरा तो मोदी को तो प्रधानमंत्री बनने से राजग गठबंधन के साथी दल ही रोक देंगे परन्तु मोदी के नाम का विरोध होने पर संघ गडकरी का नाम आगे कर देगा और गडकरी अपने प्रबंध कौशल से आडवाणी व मोदी के होते हुए भी प्रधानमंत्री का दावेदार बन जायेगा। इसी आशंका को पहले ही भांपते हुए आडवाणी ने गडकरी की फिर से अध्यक्ष पद के राजतिलक पर ग्रहण लगा कर ही दम लिया। क्योंकि आडवाणी जानते हैं कोई दूसरा जो भी अध्यक्ष होगा उसमें आडवाणी की राह रोकने के लिए न तो संघ का उतना प्रबल दवाब होगा व नहीं उतना बडा नाम। दुबारा अध्यक्ष बन कर गडकरी अपने प्रबंध कोशल व संघ के आशीर्वाद से भाजपा के सर्वशक्तिमान दावेदार बन जाते। हालांकि भाजपा मे मोदी, आडवाणी के अलावा सुषमा, जेटली ही नहीं राजनाथसिंह व मुरली मनोहर जोशी भी प्रमुख दावेदारों में शामिल है। परन्तु जो संकट आडवाणी की राह में गडकरी खडा कर सकता था वह कोई अन्य नहीं। इसीलिए आडवाणी ने यह दाव चला गडकरी हटाओ प्रधानमंत्री की राह आसान करो। देखना है आडवाणी का यह दाव कितना कारगर साबित होता है या आत्मघाती। परन्तु फिलहाल उन्होंने गडकरी को अपनी राह से हटाने में सफलता हासिल कर ही ली।

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