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Thursday, January 31, 2013


राजनाथ सिंह अध्यक्ष बनने से उत्तराखण्ड में निशंक के सुधरेंगे दिन


फरवरी में बन जायेगा नया प्रदेश अध्यक्ष 

अभी चीन से मेरे मित्र राजेन्द्र रतूडी  ने मुझसे फेसबुक पर पूछा कि भाई एक बात बताओं कि उत्तराखण्ड का अध्यक्ष कौन बनेगा? मेने उनको तुरंत बताया कि राजनाथ के बनने से उत्तराखण्ड में अध्यक्ष कौन बनेगा परन्तु जो भी बनेगा वह निशंक की सहमति से ही बनेगा। क्योंकि राजनाथ सिंह भले ही सिद्धांत के कितनी ही बातें कहें परन्तु वे गांधीवादी नेताओं में देश में जाने जाते है। उत्तराखण्ड में भले ही प्रदेश के आम जनता ही नहीं  भारतीय संस्कृति के स्वयं भू ध्वजवाहक और सुशासन व रामराज्य लाने के सूरमाओं ने जैसे ही खण्डूडी जी के कहने पर उत्तराखण्ड का भाग्य विधाता  निशंक को मुख्यमंत्री के रूप बनाया था तो  देश के प्रबुध जनता की आंखे फटी की फटी रह गयी थी। पुत्र मोह में जनमांध धृष्टराष्ट को ही नहीं बडे बडे धर्मात्माओं व सिद्धांतवादियों को भी बेनकाब किया था। राजनाथ सिंह तो बडी मुश्किल से कल्याण के न होने के कारण ताजपोशी का शौभाग्य पा गये। निशंक ने अपने शासन में संघ से लेकर राजनाथसिंह सहित भाजपा के तमाम बडे नेताओं के साथ सभी उन लोगों का ख्याल रखा जो उनकी सत्ता पर ग्रहण लगा सकते थे । उन्होंन सत्तासीन होते ही अपने राजतिलक करवाने वाले खण्डूडी जी को जो सम्मान दिया उससे न केवल खण्डूडी जी अपितु खण्डूडी जरूरी का तोता राग जपने वालों को यदि आज भी उन दिनों का स्मरण हो जाये तो उनके इस सर्दी में भी पसीने छूटने लग जायें तो किसी को अश्चर्य नहीं होगा। भला हो ले. जनरल तेजपालसिंह रावत का जिन्होंने एक बार फिर खण्डूडी के तारणहार बन कर अपने भ्रष्टाचार विरोध की ज्वाला से प्रदेश में आसीन निशंक की सरकार को पदच्युत करने में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को मजबूर करके खण्डूडी जी की ताजपोशी की। नहीं तो निशंक अगर बने रहते तो खण्डूडी व कोश्यारी को ही नहीं अपितु भाजपा में तमाम समर्पित बडे नेताओं को वनवास भोगना पडता और प्रदेश में पूरी तरह से भाजपा निशंकमय हो जाती।
इन दिनों फिर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष पद के चुनाव में प्रदेश भाजपा के नेताओं के बीच एक प्रकार का घमासान मचा हुआ है। चतुर निंशक ने जिस प्रकार से खण्डूडी के साथ मिल कर कोश्यारी समर्थकों को अध्यक्ष के पद पर घेराबंदी की उससे लोग हैरान है कि यह खण्डूडी की राजनैतिक तिकडम है या निशंक का। परन्तु दोनों के मेलजोल से प्रदेश में अध्यक्ष पद पर केन्द्रीय नेतृत्व अपना पसंदीदा नेता को आसीन नहीं कर पाया। अब फरवरी माह में प्रदेश अध्यक्ष की ताजपोशी होनी निश्चित है। भाजपा के केन्द्रीय अध्यक्ष के रूप में राजनाथ सिंह की ताजपोशी का असर अब प्रदेश की राजनीति में क्या होगा यह तो कुछ समय बाद भाजपा के संरक्षक संघ को पता चलेगा परन्तु उत्तराखण्ड में राजनाथ सिंह की ताजपोशी होते ही निंशंक व उनके समर्थकों के चेहरे में फेली मुस्कान एक ही बात का संकेत दे रही है कि अब निशंक का बनवास दूर होगा। इसी की आशंका से भाजपा के समर्पित नेताओं के चेहरों पर छायी रहने वाली मुस्कान इन दिनों गायब देख कर सहज ही समझी जा सकती है। अब निशंक के बल्ले बल्ले है।  या तो उनका चेहता अध्यक्ष बनेगा या निशंक नेता प्रतिपक्ष। यानी अब भाजपा में आयेगा उत्तराखण्ड में निशंक राज...। प्रदेश में अब नहीं लगता कि जमीन से जुडे, साफ छवि के अनुभवी मोहनसिंह ग्रामवासी जैसे समर्पित नेताओं का पार्टी की कमान दे कर भाजपा को गुटबाजी से बचाने के लिए भाजपा के दिल्ली के आका निर्णय ले पायेंगे। लगता है दिल्ली में आसीन संघ व भाजपा नेतृत्व की याददास्त कमजोर पड रही है या वे आज भी कुम्भ में निशंक के कौशल, स्टर्जिया व जलविद्युत परियोजनाओं प्रकरण से निपटने के महारथ से गडकरी की तरह गदगद है। उनको आज भी याद आ रही है  खण्डूडी द्वारा निशंक की ताजपोशी के तराने। इससे सहज अंदाज लगाया जा सकता है इन नेताओं को देश प्रदेश व जनता की कितनी चिंता है। ये कुर्सी के लिए प्रदेा देश व जनता को कितनी वरियता देते है। इनको विधानसभा क्षेत्र के परिसीमन, राजधानी गैरसैंण, मुजफरनगरकाण्ड, प्रदेश के जल, जंगल व जमीन पर काबिज हो रहे माफियाओं तथा प्रदेश को भ्रष्टाचार का मच रहा तांडव कहीं दिखाई नहीं दिया। इनको दिखाई दे रही है तो केवल अपनी कुर्सी? इनको चिंता है तो केवल अपनी कुर्सी की। इसके लिए वे कब किसका विरोध करदे व कब किसका साथ खडे हो जायें इसको कोई नहीं जान सकता। आज ऐसे तोते भी हैं जिनको सबकुछ रौद चूके नेता जरूरी लगते हैं प्रदेश की जनांकांक्षाओं को साकार करना जरूरी नहीं लगता।

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