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Monday, January 7, 2013


जाबाज आंदोलनकारियों के जज्बे को सलाम 

ठण्ड का कहर व पुलिसिया दमन भी नहीं तोड़  पाया जाबाज आंदोलनकारियों का जज्बा




इन दिनों जब दिल्ली में आम लोग अपने घरों में भी ठण्ड के प्रकोप से विस्तर से बाहर आने को डर रहे हैं उस समय इस कडकडाती ठण्ड में पुलिसिया दमन के बाबजूद सैकडों आंदोलनकारी संसद की चैखट जंतर मंतर पर बलात्कारियों को कड़ी सजा देने के लिए ठोस कानून बनाने की मांग को लेकर दिन रात खुले आसमान के नीचे आंदोलन कर रहे है। उनके इस जज्बे को लोकशाही पर विश्वास करने वाले करोड़ों लोगों का सलाम। वहीं सरकार इस मामले पर कुम्भकर्णी नींद में सोयी हुई है और देश विदेश में सरकार की इस उदासीनता की कड़ी भत्र्सना हो रही है।
दिल्ली में सोमवार 7 जनवरी को न्यूनत्तम तापमान 1 डिग्री रहा। जो कि सामान्य तापमान से छह डिग्री कम है। आज सुबह 4.30 बजे के तापमान ने दिल्ली में सर्दी का सालों का रिकार्ड तोडा। पूरा उत्तरभारत ठण्ड से कांप रहा है। उप्र में ठण्ड से 155आदमी बेमौत मर गये हैं। हरिद्वार में 32 लोग इस ठण्ड से मारे गये है। इस ठण्ड से पूरा जन जीवन अस्तव्यस्त हो गया है। गौरतलब है कि जनवरी 2006 में राजधानी का न्यूनतम तापमान 0.2 डिग्री तक जा पहुंचा था। जबकि दिल्ली में अब तक का न्यूनतम तापमान माइनस 0.6 डिग्री तक गिरा है। ये रिकॉर्ड न्यूनतम तापमान 77 साल पहले 10 जनवरी 1935 को दर्ज किया गया था। ठण्ड से आम आदमियों का जीना दूश्वार है। वहीं जंतर मंतर पर जब मैं कल सुबह 6 जनवरी की दोपहर को पंहुचा था तो उस समय वहां पर भारी ठण्ड के बाबजूद आंदोलनकारी न्याय के लिए अपना संघर्ष जारी रखे हुए थे। अनशनकारी राजेश गंगवार व बाबू सिंह दोनों अनशन पर डटे हुए थे। कुरूक्षेत्र से आयी हुई महिला आंदोलनकारी हवन करने में जुटी हुई थी। छात्रायें-नोजवान व समर्पित आंदोलनकारियों ने न्याय की गुहार लगाने वाला अपना मोर्चा जारी रखा हुआ था। इस कंपकंपाती ठण्ड में जब मैं सांय सात बजे फिर जंतर मंतर पर पंहुचा तो वहां पर 13 दिनों से अनशनकारी साथी राजेश गंगवार को न देखा तो आंदोलनकारी साथी डी के गुप्ता ने बताया कि उनकी हालत बिगडने से प्रशासन ने उन्हें राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कर दिया है। वहीं दूसरे साथी बाबू सिंह अभी अनशन पर डटे हुए थे। रात को मैने देखा की बंगला साहिब से सिख संगत के समर्पित लोग वहां पर जांबाज आंदोलनकारियों के उत्साह बर्धन के लिए कड़ी-चांवल व रोटी का प्रसाद का वितरण कर रहे है। इसके साथ कुछ युवा साथी जो साउथ दिल्ली से कई दिनों से आन्दोलनकारियों को सांय को चाय विस्कुट को पूरी श्रद्धा से पीला कर अपना योगदान इस आंदोलन में दे रहे है। इस आंदोलन में पूर्ण भागीदारी निभाने वाले समाजसेवी मोहन सिंह रावत के अनुसार रात 9 बजे के करीब काफी युवा व लोग विभिन्न जगहों से यहां पर अपना समर्थन देने को पूरे जोश व खरोस के साथ पंहुच कर अपनी भागेदारी निभाते है। इससे हाड कंपकपा देने वाली सर्दी में भी इस आंदोलन के जांबाज सिपाहियों का मनोबल और ऊंचा हो जाता हैं। जब से ये आंदोलन हुआ मैने देखा कि फरिदाबाद का युवा आंदोलनकारी राधेश्याम सोनी अपने घर वापस ही नहीं गया। एक कमीज कई दिनों तक सर्दी में ठिठुरने पर जब मैने पूछा घर क्यों नहीं गये कपडे लेने तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया भाई जी घर गया तो घरवाले मुझे यहां नहीं आने देंगे। मैं आंदोलन की बात सुन कर चुपचाप घर से चले आया। रास्ते से घरवालों को फोन करके बताया। मेने राधेश्याम सोनी को अण्णा हजारे के आंदोलन से अब तक पूरी तरह से समर्पित आंदोलनकारी की तरह जुटे हुए देखा। अब किसी आंदोलनकारी ने उनको गरम कपड़े पहनने के लिए दिये है। वहीं गाजियाबाद के मनीत त्यागी, विकास शर्मा, संतोष, कुंनाल, संदीप, विकास, डी के गुप्ता, पी एस वालिया, मयंक, रीतू, मो.वासी, गौरव, राज, संदीप सहित अनैक आंदोलनकारी यहां जुटे हुए है। यहां पर मोहिन्द्र सिंह भी समर्पित था, कुछ दिनों से सुना है अपने घर पंजाब चले गया। इस आंदोलन के तैवरों को देख कर यहां पर लगायी गये सैकडों पुलिस, रेपिड़ एक्सन के जवानोें को भी दिन रात मुस्तैद रहना पड रहा है। इस हाड़ कंपा देने वाली सर्दी में जब विरोध के नाम पर राजनैतिक दल या तथाकथित देश व्यापी आंदोलनकारी सप्ताह में केवल चंद घण्टे यहां पर अपना बेनर झण्डे लाकर फोटों खिचा कर अपने घरों में चले जाते हैं। वहीं इस रिकार्ड तोड़ सर्दी में भी दिन रात अधिकांश समय खुले आसमान के नीचे सड़क पर आंदोलन की अखल जगाये हुए है। उनके इस जज्बे को सलाम। अब सवाल यह है कि जब इस काण्ड के होने के बाद अनेक बच्चियों, युवतियों को बलात्कार शिकार लगातार अपराधी बना रहे हों तो क्यों सरकार क्यों बलात्कार पर अंकुश लगाने के लिए जनता की प्रबल मांग पर कानून में शीघ्र संशोधन करते हुए मृत्यु दण्ड का प्रावधान वाला कानून नहीं बना रही है? आखिर सरकार क्यों सोयी हुई है? पूरे देश की जागरूक जनता सडकों पर कडा कानून बनाने की मांग कर रही है और विदेश में भी भारत की छवि लगातार तार तार हो रही है। इसके बाबजूद सरकार इस पर गंभीर पहल नहीं कर रही है?
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